रामायण के बाद अंगद का क्या हुआ?

रामायण का युद्ध समाप्त हो गया था। लंका जल चुकी थी। रावण का अंत हो चुका था। भगवान श्रीराम, माता सीता को लेकर पुष्पक विमान में अयोध्या की ओर उड़ चले थे। हनुमान जी की जय-जयकार हो रही थी। सुग्रीव किष्किंधा के महाराज बन चुके थे। परंतु... एक प्रश्न है जो पुराणों के पन्नों में कहीं दबा रह गया। वही अंगद — जिसने रावण की सभा के बीचोंबीच अपना पैर जमाकर समस्त लंका को चुनौती दी थी। जिसके पैर को रावण के एक-एक महारथी ने हिलाने का प्रयास किया और असफल रहे। जिसने बिना श्रीराम की आज्ञा लिए, अपने प्रभु के नाम पर वचन दे दिया था कि यदि कोई मेरा पैर हिला सके, तो हम वापस लौट जाएंगे। आज इस डॉक्यूमेंट्री में हम उसी अंगद के रामायण के बाद के जीवन की खोज करेंगे — वाल्मीकि रामायण, आनंद रामायण, पद्मपुराण और लोकश्रुतियों के आधार पर। वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में अंगद का परिचय इस प्रकार आता है — वे राजा बाली और पंचकन्याओं में से एक तारा के पुत्र थे। इंद्र के पौत्र थे अंगद। किष्किंधा के युवराज। बाली — जिसका नाम सुनते ही देवता भी कंपित हो जाते थे। जो अपने शत्रु का आधा बल अपने भीतर खींच लेता था — वही बाली अंगद के पिता थे। ऐसे पिता की संतान का बल तो असाधारण होगा ही। परंतु अंगद की यात्रा केवल बल की नहीं है। यह यात्रा है एक ऐसे युवा की, जिसने अपने पिता को श्रीराम के हाथों मरते देखा। जिसके मन में — स्वाभाविक रूप से — भगवान राम के प्रति संशय और पीड़ा दोनों थीं। किष्किंधा कांड के अंतिम भाग में उल्लेख मिलता है कि अंगद ने समुद्र के किनारे कहा था — 'मैं समुद्र को लांग तो जाऊंगा, परंतु वहां से लौट पाऊंगा या नहीं — यह संशय मेरे मन में है।' (वाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड) यह संशय केवल समुद्र का नहीं था। यह संशय था उस व्यक्ति का जो उन राम पर विश्वास करने की कोशिश कर रहा था, जिन्होंने उसके पिता को वृक्ष की आड़ से बाण मारकर वध किया था। अंगद उस समय मात्र 18-19 वर्ष के रहे होंगे। श्रीराम ने अंगद को रावण के पास दूत बनाकर भेजा — यह निर्णय स्वयं में अद्भुत था। एक युवा वानर राजकुमार को, जिसके पिता की मृत्यु का संबंध राम से था, उसे दूत चुना गया। यह राम का विश्वास था अंगद पर। वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड के अनुसार, जब अंगद रावण की सभा में पहुंचे, तो उन्होंने पहले सीता माता को लौटाने का प्रस्ताव रखा। शांतिपूर्वक, कूटनीतिक रूप से। परंतु रावण अड़ा रहा।
उन्होंने रावण की सभा के मध्य में अपना पैर जमा दिया और घोषणा की — 'रावण! यदि तुम्हारे दरबार में कोई भी योद्धा मेरे इस पैर को हिला सके, तो मैं अपने प्रभु श्रीराम की ओर से वचन देता हूं कि हम बिना युद्ध के लौट जाएंगे।' (युद्ध कांड, वाल्मीकि रामायण) एक के बाद एक — महापराक्रमी राक्षस आए। इंद्रजीत के योद्धा आए। कुंभ, निकुंभ, प्रहस्त के सैनिक आए। रावण के दरबारी आए। और अंत में स्वयं रावण ने भी अंगद का पैर हिलाने का प्रयास किया। रावण का मुकुट नीचे गिर गया — परंतु अंगद का पैर नहीं हिला। यह केवल शारीरिक बल का प्रदर्शन नहीं था। यह था उस निष्ठा की शक्ति जो उस दिन जागृत हुई थी। जो बालक अपने पिता की मृत्यु पर संशय में था, वही आज अपने प्रभु के नाम पर पूरी लंका को चुनौती दे रहा था। युद्ध कांड में उल्लेख है कि अंगद ने रावण के पुत्र देवांतक का वध किया, नरान्तक का वध किया, और इंद्रजीत के रथ को भी नष्ट किया। वाल्मीकि रामायण युद्ध कांड, सर्ग 69 में अंगद और नरान्तक के बीच का युद्ध विस्तार से वर्णित है। रावण का अंत हुआ। विभीषण को लंका का राज्य मिला। श्रीराम पुष्पक विमान में बैठे। उन्होंने अंगद को गले लगाया। सुग्रीव को किष्किंधा की राजगद्दी पर बैठाया। और अयोध्या उड़ चले। वाल्मीकि रामायण का उत्तर कांड श्रीराम के राज्याभिषेक और उनके शासन पर केंद्रित हो जाता है। और अंगद का नाम... धीरे-धीरे पन्नों से ओझल होने लगता है। 'रावण वध के पश्चात अंगद श्रीराम के साथ उनका राज्याभिषेक देखने अयोध्या गए और कुछ दिनों पश्चात पुनः किष्किंधा लौट आए। सोचिए — उस अंगद की मनोस्थिति क्या रही होगी, जब वे किष्किंधा लौटे?
पिता बाली — नहीं रहे। माता तारा — जनश्रुतियों के अनुसार हिमाचल प्रदेश के नारकंडा की ओर चली गईं, जहां आज हाटू माता मंदिर के नाम से उनकी पूजा होती है। चाचा सुग्रीव — किष्किंधा के राजा बन गए। और प्रभु श्रीराम — अयोध्या लौट गए। वह युवा, जिसकी पूरी पहचान राम की सेवा में थी — अब किस उद्देश्य से जीता? किष्किंधा में राजकुमार का पद था, परंतु वह उद्देश्य, वह युद्ध, वह निष्ठा — सब पूरे हो गए थे। पद्मपुराण में एक संक्षिप्त उल्लेख मिलता है जिसमें कहा गया है कि अंगद ने सुग्रीव के शासनकाल में युवराज के रूप में कुछ वर्ष किष्किंधा में व्यतीत किए। परंतु उनके मन में वैराग्य का भाव बढ़ता जा रहा था। आनंद रामायण — जो वाल्मीकि रामायण का एक परवर्ती विस्तार है — उसमें भी अंगद का उल्लेख मुख्यतः युद्धकाल तक ही सीमित है। उसके बाद का जीवन एक रहस्य बनकर रह जाता है। दक्षिण-पूर्व एशिया में रामायण की परंपरा अत्यंत प्राचीन और गहरी है। थाईलैंड में 'रामकियेन', कंबोडिया में 'रामकेर', इंडोनेशिया में 'काकाविन रामायण', लाओस में 'फ्र लक फ्र लाम' — ये सभी रामायण के स्थानीय संस्करण हैं। इन ग्रंथों में और इन देशों के मंदिरों की दीवारों पर — एक वानर राजकुमार का विशेष उल्लेख मिलता है। अंगकोर वाट (कंबोडिया) की भित्तिचित्रों में एक वानर योद्धा को विशेष स्थान दिया गया है। कुछ विद्वानों का मत है कि रामायण युद्ध के पश्चात वानर सेना के कई योद्धा — जो मूलतः वानद्वीप (दक्षिण-पूर्व एशिया) से आए थे — वापस अपनी भूमि पर लौट गए। और अंगद, जिनका किष्किंधा में अब वह उद्देश्य नहीं बचा था, संभव है वे भी इसी मार्ग पर निकल पड़े। थाई रामायण 'रामकियेन' में एक पात्र 'ओंगकोट' का उल्लेख है, जो वाल्मीकि रामायण के अंगद से अत्यंत मिलता-जुलता है। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि यही अंगद हैं — जिन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी नई राह खोजी। दूसरी प्रमुख लोकश्रुति यह है कि अंगद हिमालय की ओर चले गए। यह विचार अतार्किक नहीं है — रामायण और महाभारत दोनों में कई महापुरुषों ने अपना अंतिम समय हिमालय में बिताया। जिस व्यक्ति के हृदय में श्रीराम के प्रति इतनी गहरी निष्ठा जागृत हो चुकी हो, उसके लिए राज्य का मोह क्षणिक ही रहता है। पद्मपुराण के कुछ संदर्भों में वानर योद्धाओं के वैराग्य का उल्लेख मिलता है। माता तारा — अंगद की माता — के हिमाचल जाने की लोकश्रुति है। नारकंडा (हिमाचल प्रदेश) में हाटू माता मंदिर है, जो तारा माता को समर्पित है। जनश्रुति में यह भी कहा जाता है कि मंदोदरी भी इसी क्षेत्र में आई थीं। यदि माता किष्किंधा छोड़ हिमाचल चली गईं, तो अंगद वहां और अकेले हो गए। एक पुत्र का स्वाभाविक आवेग होता — माता के पास जाना, या फिर अपनी ही आत्मा की खोज में हिमालय की गोद में समा जाना। तीसरी और सबसे रोचक संभावना कुमारी कंदम की है। यह एक प्राचीन द्वीप या भू-भाग था जिसका उल्लेख तमिल पुराणों में मिलता है — कहा जाता है कि यह लंका के दक्षिण में था और हिंद महासागर में समाया हुआ था। लोकश्रुति यह है कि जब विभीषण लंका छोड़कर हिमालय की ओर चले गए, तो उस क्षेत्र के एक द्वीप पर अंगद का अधिकार हो गया और उन्होंने वहां राजपाट आरंभ किया। कुमारी कंदम का एक छोटा अवशेष आज भी श्रीलंका के अधीन कुछ द्वीपों के रूप में है। कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि इन द्वीपों पर अभी भी ऐसे प्रमाण हो सकते हैं जो वानर सभ्यता से जुड़े हों।
यह विचार केवल कल्पना नहीं है — वाल्मीकि रामायण में स्वयं उल्लेख है कि वानर सेना में कई ऐसे योद्धा थे जो समुद्री द्वीपों से आए थे। उनका वापस लौटना तार्किक प्रतीत होता है। रामायण और महाभारत के बीच कितने वर्षों का अंतर है — इस पर विद्वानों में मतभेद हैं। परंतु कुछ क्षेत्रीय और लोकप्रचलित महाभारत के संस्करणों में — विशेषकर दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के संस्करणों में — एक वानर योद्धा का उल्लेख मिलता है जो महाभारत काल में भी जीवित था। हनुमान जी का उल्लेख महाभारत में स्पष्ट है — अर्जुन के रथ की ध्वजा पर। उसी प्रकार कुछ संस्करणों में एक और वानर का उल्लेख है जो दीर्घायु था। कुछ विद्वान इसे अंगद मानते हैं। आनंद रामायण — जो रामायण का एक परवर्ती विस्तृत संस्करण है — उसमें अंगद के दीर्घजीवी होने के संकेत मिलते हैं। यह ग्रंथ बताता है कि भगवान राम के प्रति उनकी निष्ठा इतनी गहरी थी कि वे एक साधारण मृत्यु नहीं मर सकते थे। भारत से बाहर की 300 से अधिक रामायण परंपराओं में से कई में अंगद एक ऐसे पात्र हैं जो रामायण के बाद भी विभिन्न देशों में सक्रिय रहे। थाईलैंड की रामकियेन में ओंगकोट एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करते हैं। एक और आश्चर्यजनक संदर्भ मिलता है — ग्रीक पुरातन कथाओं में। कुछ शोधकर्ता जो प्राचीन सभ्यताओं के परस्पर संबंध पर कार्य करते हैं, वे बताते हैं कि ग्रीक परंपराओं में एक 'वन में रहने वाले नर' का उल्लेख है — एक ऐसी सभ्यता जो अत्यंत बुद्धिमान और दिव्य शक्तिसंपन्न थी। यह 'वन नर' ग्रीस की धरती पर आए और वहां काफी समय तक प्रभावशाली रहे। कुछ विद्वान इसे सुग्रीव या अंगद से जोड़ते हैं। यह विचार अभी शोध के प्रारंभिक चरण में है, परंतु यह संकेत देता है कि वानर सभ्यता की पहुंच केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं थी। वानर — शब्द का अर्थ ही है 'वन में रहने वाला नर'। ये कोई सामान्य जीव नहीं थे। वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानर सेना के पास विज्ञान, कूटनीति, युद्धकला, समुद्र लांघने की क्षमता — सब कुछ था। ऐसी सभ्यता का विस्तार विश्व के विभिन्न कोनों तक होना असंभव नहीं। चाहे अंगद दक्षिण-पूर्व एशिया गए हों, हिमालय गए हों, या कुमारी कंदम — एक बात निश्चित है। उनकी विरासत अमर है। वाल्मीकि रामायण में अंगद के बारे में एक तथ्य स्पष्ट है — वे हनुमान के समान बल, साहस और बुद्धि से संपन्न थे। युद्ध में उन्होंने वज्रदंष्ट्र, नरान्तक, देवांतक जैसे महारथियों का वध किया। इंद्रजीत को पहली मुठभेड़ में पराजित किया। परंतु अंगद की सबसे बड़ी विरासत है — वह मनोबल जो उन्होंने रावण की सभा में प्रदर्शित किया। बिना किसी आज्ञा के, अपने प्रभु पर पूर्ण विश्वास के साथ — एक पैर जमा दिया और कहा: गड़ गयो खम्भ हमारो 'हिम्मत हो तो जाहे उखाड़ो — अंगद बीच सभा में थारो।' बोलो राम जी की जय। यह केवल शारीरिक शक्ति नहीं थी। यह था विश्वास की शक्ति। निष्ठा की शक्ति। वह निष्ठा जो एक संशयी बालक में जागृत होकर उसे इतिहास का अमर पात्र बना गई। अंगद के बारे में अभी बहुत कुछ खोजा जाना बाकी है। दक्षिण-पूर्व एशिया के मंदिरों में, हिमालय की गुफाओं में, कुमारी कंदम के अवशेषों में — शायद उनकी कहानी का अगला अध्याय लिखा हो। रामायण के ये 'अनसंग वॉरियर्स' — ये ऐसे योद्धा हैं जिन्होंने राम की जीत को संभव बनाया, परंतु इतिहास ने उन्हें उनका उचित स्थान नहीं दिया। आज इस डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से हम उन्हें वह सम्मान देने का प्रयास करते हैं।

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