भगवान शिव का जन्म कैसे हुआ और माता दुर्गा के पति कौन हैं?
कल्पना कीजिए एक ऐसे समय की, जब 'समय' का ही जन्म नहीं हुआ था। न दिशाएं थीं, न आकाश था, न पाताल। न सूर्य की तपन थी, न चंद्रमा की शीतलता। ग्रहों, नक्षत्रों और निहारिकाओं का कोई अस्तित्व नहीं था। सर्वत्र केवल एक ही चीज़ व्याप्त थी – अथाह, अनंत और अगाध महाशून्य। यह एक ऐसा अंधकार था जो डरावना नहीं, बल्कि पूर्ण शांति से भरा हुआ था। इस अनंत महाशून्य में, जहाँ कोई ध्वनि नहीं थी, वहाँ केवल एक परम चेतना विद्यमान थी। यह चेतना न कभी जन्मी थी, न कभी समाप्त होने वाली थी। यही स्वयंभू तत्व, यह निराकार और निर्गुण ऊर्जा ही परम शिव (परब्रह्म) थे। परम शिव महासमाधि में लीन थे। उनके लिए न कुछ पाने को था, न कुछ खोने को। वे स्वयं में पूर्ण थे – सच्चिदानंद (सत्, चित्, और आनंद)। युगों-युगों तक, जो कि उस समय गिने ही नहीं जा सकते थे, वह महाशून्य उसी निर्गुण ब्रह्म के ताप और शांति में डूबा रहा। फिर, उस अनंत शांति में एक सूक्ष्म स्पंदन हुआ। यह स्पंदन किसी बाहरी कारण से नहीं, बल्कि स्वयं शिव की इच्छा से हुआ था। निर्गुण ब्रह्म के भीतर एक विचार उत्पन्न हुआ – "एकोऽहं बहुस्याम्" (मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ)। यह कोई आवश्यकता नहीं थी, बल्कि यह तो केवल शिव की 'लीला' करने की इच्छा थी। अपने ही आनंद को विस्तार देने की चाह थी। जैसे ही परम शिव के भीतर लीला की यह इच्छा जाग्रत हुई, उनके उसी निराकार स्वरूप से एक असीम, चमकदार और प्रचंड ऊर्जा अलग हुई। यह ठीक वैसा ही था जैसे किसी शांत अग्नि कुंड से अचानक एक प्रज्वलित ज्वाला उठ खड़ी हो, या जैसे उगते हुए सूर्य से उसकी पहली स्वर्णिम किरण फूट पड़े। यह ऊर्जा कोई और नहीं, बल्कि शिव की ही इच्छा-शक्ति, क्रिया-शक्ति और ज्ञान-शक्ति का साकार रूप थी। यह आदिशक्ति, पराशक्ति अंबिका, प्रकृति थीं। जो शिव अब तक शांत और स्थिर थे, इस शक्ति के अलग होते ही वे गतिशील हो गए। आदिशक्ति अत्यंत तेजोमय थीं। उनके प्रकाश से वह आदिम अंधकार मिटने लगा। शिव और शक्ति अब आमने-सामने थे। वे दो दिख रहे थे, लेकिन गहराई में वे एक ही थे। फूल और उसकी सुगंध को कैसे अलग किया जा सकता है? सोने और उसकी चमक को कैसे बांटा जा सकता है? ठीक वैसे ही शिव और शक्ति भी अभिन्न थे। तब, इस ब्रह्मांड की सबसे पहली और सबसे सुंदर घटना घटी। सृष्टि को यह संदेश देने के लिए कि पुरुष और प्रकृति, चेतना और ऊर्जा कभी अलग नहीं हैं, दोनों ने मिलकर एक अत्यंत अलौकिक रूप धारण किया। अचानक एक दिव्य प्रकाशपुंज प्रकट हुआ, जिसके दर्शन मात्र से जन्म-मृत्यु के चक्र समाप्त हो जाएं। उस प्रकाश के बीच में अर्धनारीश्वर का स्वरूप प्रकट हुआ। इस दिव्य शरीर का दाहिना आधा भाग परम शिव का था। उनका रंग कर्पूर के समान गौर था। जटाओं में चंद्रमा सुशोभित था, गले में वासुकि नाग लिपटा हुआ था, और उनके शरीर पर भस्म रमी हुई थी। यह भाग वैराग्य, चेतना, संहार और स्थिरता का प्रतीक था। वहीं, शरीर का बायां आधा भाग माँ आदिशक्ति (भगवती दुर्गा/भवानी) का था। उनका रंग तप्त स्वर्ण या लालिमा लिए हुए था। उनके माथे पर सिंदूर, कानों में कुंडल, और शरीर पर बहुमूल्य लाल रेशमी वस्त्र और दिव्य आभूषण शोभायमान थे। यह भाग ऊर्जा, गतिशीलता, सृजन, और प्रेम का प्रतीक था। इस एक शरीर ने पूरे ब्रह्मांड का नियम तय कर दिया। अर्धनारीश्वर रूप ने यह घोषित कर दिया कि शिव शक्ति के बिना 'शव' (निष्क्रिय) हैं, और शक्ति शिव की चेतना के बिना दिशाहीन है। दोनों के इस मिलन से एक दिव्य ध्वनि उत्पन्न हुई – "ॐ"। यह ब्रह्मांड का पहला नाद था, जो आज भी हर कण में गूंज रहा है। अर्धनारीश्वर स्वरूप के उस दिव्य नाद "ॐ" की गूंज से महाशून्य में कंपन होने लगा था। परम शिव और आदिशक्ति अब अपने उसी मूल से सदाशिव (महाकाल) और भगवती दुर्गा (प्रकृति) के रूप में प्रकट हुए। सदाशिव का रूप परम शांत, कल्याणकारी और अनादि था। उनके साथ उनकी अर्धांगिनी, त्रिदेव-जननी, अष्टभुजा माँ दुर्गा विराजमान थीं। वे दोनों मिलकर एक ऐसे स्थान की कल्पना कर रहे थे जो काल (समय), भौतिक नियमों और युगों के चक्र से पूरी तरह मुक्त हो। एक ऐसा आयाम जहाँ प्रलय का भी कोई प्रभाव न पड़े। "हे प्राणनाथ," माँ दुर्गा ने कहा, "यह महाशून्य अब हमारी लीला का साक्षी बन चुका है। आइए, एक ऐसे पवित्र स्थल का निर्माण करें जो हमारे विहार का केंद्र बने और जहाँ से सृष्टि का संचालन हो।" सदाशिव मुस्कुराए। उन्होंने अपने त्रिशूल को उठाया और उस महाशून्य में स्थापित कर दिया। उस त्रिशूल की नोंक पर एक अत्यंत तेजोमय, पंचक्रोशी दिव्य क्षेत्र प्रकट हुआ। यही क्षेत्र 'आनंद वन' कहलाया, जिसे आज हम अविनाशी काशी के नाम से जानते हैं। यह भौतिक पृथ्वी का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह शिव के त्रिशूल पर टिका एक ऐसा समानांतर आयाम था जहाँ समय की गति भिन्न थी। इसी आनंद वन में सदाशिव और अष्टभुजा दुर्गा लंबे समय तक रमण करते रहे। फिर सदाशिव के मन में विचार आया, "हम कब तक केवल इसी आनंद में मग्न रहेंगे? अब सृष्टि का विस्तार होना चाहिए। हमें ऐसे जीवों और व्यवस्थापकों की रचना करनी चाहिए जो इस ब्रह्मांडीय खेल को संभालें।" सदाशिव की इच्छा को माँ दुर्गा ने अपनी सहमति दी। यह वह क्षण था जब ब्रह्मांड के भौतिक नियमों, सत, रज और तम गुणों का निर्माण होने वाला था। सदाशिव ने अपने बाएँ अंग पर हाथ फेरा। वहां से एक दिव्य, अमृतमय तत्व प्रकट हुआ। उस अमृत-मल से एक अत्यंत मनमोहक, शांत और नीलमणि के समान चमकते हुए पुरुष का प्राकट्य हुआ। यह सतोगुण (पालन) के प्रतीक भगवान विष्णु थे। विष्णु के जन्म के साथ ही क्षीरसागर का निर्माण हुआ और वे शेषनाग की शय्या पर विश्राम करने लगे। उनके हर श्वास के साथ रोम-रोम से अनगिनत ब्रह्मांडों के बीज उत्पन्न हो रहे थे। इसके पश्चात, सदाशिव ने अपने दाहिने अंग से एक और महान ऊर्जा को जन्म दिया। यह रजोगुण (सृजन) के प्रतीक भगवान ब्रह्मा थे। ब्रह्मा जी को सीधे क्षीरसागर में भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुए एक विशाल, स्वर्णिम कमल पर विराजमान कर दिया गया। ब्रह्मा जी के भीतर सृष्टि को रचने का ज्ञान भरा हुआ था। अब संतुलन के लिए तीसरे तत्व की आवश्यकता थी। सदाशिव ने अपने ही अंश से, अपने हृदय और भृकुटी के मध्य से, एक अत्यंत उग्र, वैरागी और शक्तिशाली रूप को प्रकट किया। यह तमोगुण (संहार) के प्रतीक रुद्र (महेश/शंकर) थे। इस प्रकार, सदाशिव और माँ दुर्गा के संकल्प से त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का जन्म हुआ। माँ दुर्गा की ही ऊर्जा से त्रिदेवों को अपने-अपने कार्य करने की शक्ति प्राप्त हुई। परम सत्य में, माँ दुर्गा के पति वे परम 'सदाशिव' हैं, जो इन सभी रूपों से परे, इस पूरे ब्रह्मांड के आदिकारण हैं। सृष्टि का पहिया अब अपनी गति पकड़ चुका था। भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में लीन थे और ब्रह्मा जी अपने स्वर्ण कमल पर विराजमान होकर नई सृष्टियों को आकार दे रहे थे। लेकिन, इसी निर्माण कार्य के बीच एक सूक्ष्म परंतु विनाशकारी तत्व ने जन्म लिया—अहंकार। एक बार, ब्रह्मा जी क्षीरसागर पहुंचे जहाँ भगवान विष्णु विश्राम कर रहे थे। विष्णु जी ने उठकर उनका अभिवादन नहीं किया, जिससे ब्रह्मा जी का अहंकार जाग उठा। उन्होंने कहा, "हे विष्णु! मैं इस संपूर्ण सृष्टि का पिता हूँ। तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ।" भगवान विष्णु शांत रहे लेकिन मुस्कुराते हुए बोले, "हे ब्रह्मा! तुम मेरे नाभि-कमल से उत्पन्न हुए हो। सम्पूर्ण ब्रह्मांड मेरे भीतर निवास करता है, श्रेष्ठता तो मुझमें ही निहित है।" विवाद बढ़ने लगा और दोनों के बीच एक भयंकर युद्ध छिड़ गया। उनके अस्त्र-शस्त्रों के टकराव से दिशाएं कांप उठीं। जब युद्ध अपने चरम पर था, तब स्वयं परम शिव को हस्तक्षेप करना पड़ा। अचानक, रणभूमि के मध्य में अंतरिक्ष को चीरता हुआ एक विशाल, अनंत और प्रज्वलित ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। इस स्तंभ का न कोई आदि दिख रहा था, न कोई अंत। उस निराकार ज्योति स्तंभ से आकाशवाणी हुई— "हे ब्रह्मा! हे विष्णु! जो भी इस ज्योति स्तंभ के आदि या अंत का पता लगाकर सबसे पहले लौट आएगा, वही सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा।" ब्रह्मा जी ने हंस का रूप धारण किया और ऊपरी छोर खोजने उड़ चले। भगवान विष्णु ने वराह का रूप धारण किया और निचले हिस्से की ओर खुदाई करते हुए उतरने लगे। युग बीत गए, लेकिन दोनों को कोई छोर नहीं मिला। भगवान विष्णु ने अपनी हार मान ली। लेकिन ब्रह्मा जी ने अहंकारवश लौटते समय एक केतकी के फूल को अपने पक्ष में झूठ बोलने के लिए मना लिया। विष्णु जी ने सत्य कहा, लेकिन ब्रह्मा जी ने गर्व से कहा, "मैंने इसके ऊपरी छोर को देख लिया है।" ब्रह्मा जी का यह झूठ बोलते ही, उस अग्नि स्तंभ से भगवान शिव साकार रूप में प्रकट हुए। शिव ने कड़कती हुई आवाज़ में ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि उनकी कहीं भी पूजा नहीं होगी और केतकी का फूल कभी शिव को नहीं चढ़ाया जाएगा। विष्णु जी के सत्य से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें अपनी तरह पूजनीय होने का वरदान दिया। इस लीला ने ब्रह्मांड को सिखा दिया कि परम शिव ही अनादि और अनंत हैं। सृष्टि निर्माण के दौरान ब्रह्मा जी ने चार मानस पुत्रों (सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार) को जन्म दिया। लेकिन वे जन्म से ही वैरागी निकले और सृष्टि बढ़ाने से इनकार कर दिया। ब्रह्मा जी समझ गए कि केवल सतोगुण और रजोगुण से सृष्टि नहीं चल सकती, इसमें परिवर्तन और संहार (तमोगुण) का होना भी आवश्यक है। ब्रह्मा जी ने कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से परम शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। अचानक, ब्रह्मा जी की भृकुटी से एक तीव्र प्रकाश पुंज निकला और उनकी गोद में एक अत्यंत तेजस्वी, नील-लोहित बालक प्रकट हुआ। बालक के प्रकट होते ही उसने अत्यंत उच्च स्वर में रोना आरंभ कर दिया। उसका रुदन इतना तीव्र था कि सातों लोक कांप उठे। ब्रह्मा जी ने पूछा, "हे दिव्य बालक! तुम क्यों रो रहे हो?" बालक ने कहा, "मेरा कोई नाम नहीं है और न ही रहने का स्थान है। जब तक आप मुझे मेरा नाम और स्थान नहीं देंगे, मैं ऐसे ही रोता रहूँगा।" ब्रह्मा जी ने उस बालक को रोने के कारण पहला नाम दिया— "रुद्र"। बालक फिर भी रोता रहा। ब्रह्मा जी ने एक-एक करके उसे आठ नाम दिए: रुद्र, भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उग्र, और महादेव। ये भगवान शिव की 'अष्टमूर्ति' कहलाईं। परम शिव कभी जन्म नहीं लेते, यह केवल उनकी एक लीला थी। शिव ने ब्रह्मा जी को 'पिता' कहलाने का सम्मान दिया, किंतु वे स्वयं संपूर्ण जगत के परम पिता हैं। बाल रुद्र के इस अवतार ने जीवन-मृत्यु के अनंत चक्र की स्थापना की। ब्रह्मा जी सृष्टि तो रच रहे थे, लेकिन वह 'मानसी सृष्टि' थी (केवल मन से उत्पन्न)। जब तक ब्रह्मा जी स्वयं नए जीव नहीं बनाते, ब्रह्मांड सूना ही रहता। सृष्टि अपने आप आगे नहीं बढ़ पा रही थी। ब्रह्मा जी ने फिर परम शिव की शरण ली और कठोर तपस्या की। उनके सामने साक्षात 'अर्धनारीश्वर' स्वरूप प्रकट हुआ। दाहिना भाग शिव (पुरुष तत्व) का था और बायां भाग आदिशक्ति (प्रकृति तत्व) का। महादेव ने कहा, "हे ब्रह्मन! केवल पुरुष तत्व से जीवन का चक्र नहीं घूम सकता। सृष्टि के विस्तार के लिए मेरी इस पराशक्ति का सहयोग अनिवार्य है।" ब्रह्मा जी ने प्रार्थना की, "हे माता! सृष्टि को आगे बढ़ाने के लिए मुझे स्त्री तत्व की आवश्यकता है।" शिव मुस्कुराए और उनकी शक्ति उनके शरीर से अलग होकर साक्षात माँ भगवती के रूप में प्रकट हो गई। माँ भगवती ने ब्रह्मा जी को स्त्री-तत्व का संचार करने की शक्ति दी और वरदान दिया कि वे उनके पुत्र दक्ष प्रजापति की पुत्री (सती) के रूप में भौतिक जगत में अवतार लेंगी। जैसे ही स्त्री और पुरुष तत्व अलग हुए, 'मैथुनी सृष्टि' (मिलन से सृष्टि) का आरंभ हुआ। अर्धनारीश्वर लीला ने यह सिद्ध कर दिया कि स्त्री और पुरुष एक ही परम सत्य के दो हिस्से हैं। एक बार नैमिषारण्य में ब्रह्मांड के महान ऋषि-मुनि एकत्रित हुए। उनके मन में प्रश्न उठा: "ब्रह्मा जी ने हमें उत्पन्न किया, विष्णु जी पालन कर रहे हैं, लेकिन महादेव के माता-पिता कौन हैं?" वे कैलाश पर्वत पहुंचे और भगवान शिव से पूछा, "प्रभु, आपके पिता कौन हैं?" शिव ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे ऋषियों! मेरे पिता चतुरानन भगवान ब्रह्मा हैं।" ऋषियों ने तर्क दिया, "यदि ब्रह्मा आपके पिता हैं, तो आपके पितामह (दादा) कौन हुए?" शिव ने उत्तर दिया, "मेरे दादा जी क्षीरसागर में शयन करने वाले भगवान विष्णु हैं।" ऋषियों की जिज्ञासा चरम पर थी। उन्होंने अंतिम प्रश्न किया, "हे परमेश्वर! तो कृपया यह भी बता दीजिए कि आपके परदादा कौन हैं?" कैलाश पर सन्नाटा छा गया। भगवान शिव अपने परम, अनादि स्वरूप में आ गए और गंभीर वाणी में बोले: "हे ऋषियों! मेरे पिता ब्रह्मा हैं, मेरे दादा विष्णु हैं... और मेरे परदादा स्वयं मैं ही हूँ!" ऋषियों को परम सत्य समझ आ गया। जो परम शिव सृष्टि के आदि में 'सदाशिव' हैं, वही अंत में 'रुद्र' हैं। उनका कोई जन्म नहीं होता, वे स्वयंभू हैं। जो कुछ भी है, वह केवल उनकी लीला है। माँ दुर्गा के पति 'सदाशिव' हैं, शिव का कोई जन्म नहीं केवल लीला है, और अर्धनारीश्वर रूप बताता है कि संहार और सृजन सब एक हैं। ऋषियों ने महादेव और माँ पार्वती की स्तुति की और इस रहस्य को जानकर जीवन-मृत्यु के भय से मुक्त हो गए। हर हर महादेव! 🕉️ जय माँ दुर्गा! 🚩
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें