लोमस ऋषि के साथ इंद्र का अनंत ब्रह्माण्ड दर्शन
एक समय की बात है, स्वर्गलोक की राजधानी अमरावती अपने पूर्ण वैभव पर थी। देवराज इंद्र, जिन्होंने कठोर तपस्या और सौ अश्वमेध यज्ञों के पुण्य के बल पर यह त्रिभुवन का सर्वोच्च पद प्राप्त किया था, अब अपने ऐश्वर्य, पद और शक्ति के गहरे मद (घमंड) में डूब चुके थे। सिंहासन पर बैठे हुए, अप्सराओं के नृत्य और गंधर्वों के संगीत के बीच, इंद्र के मन में एक विचार आया— "मैं तीनों लोकों का स्वामी हूँ। मेरे पास जो शक्ति है, वह अद्वितीय है। लेकिन यह स्वर्ग का राजमहल अब मेरी महानता के अनुरूप नहीं लगता। यह पुराना और साधारण सा प्रतीत होता है। मेरे रहने के लिए एक ऐसा नया और भव्य प्रासाद (महल) होना चाहिए, जिसकी कल्पना तक किसी ने न की हो!" अहंकार से वशीभूत होकर इंद्र ने तुरंत देवताओं के शिल्पी, भगवान विश्वकर्मा को अपने दरबार में बुलवाया। विश्वकर्मा जी हाथ जोड़कर उपस्थित हुए। इंद्र ने आदेशात्मक स्वर में कहा, "हे शिल्पीराज! एक ऐसे महल का निर्माण करो जो इस पूरे ब्रह्मांड में अनुपम हो। उसमें सोने-चाँदी के खंभे हों, जिनकी चमक से सूर्य भी लजा जाए। दीवारें ऐसे मणि-माणिक्य और हीरों से जड़ी हों कि रात में भी ...