शुक्राचार्य की पुत्री से राजा दंड की कामवासना
वासना का अंधापन: राजा दंड और अर्जा कामुकता और वासना के तीव्र वेग पर नियंत्रण पाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है। बड़े-बड़े पराक्रमी और शूरवीर भी इसके सम्मुख घुटने टेक देते हैं। ऐसे ही एक प्रतापी योद्धा थे महाराज इक्ष्वाकु के सुपुत्र दंड। दंड ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य जी को अपना मार्गदर्शक और कुलगुरु स्वीकार किया था। एक दिन ऐसा हुआ कि गुरुदेव आश्रम में उपस्थित नहीं थे, और इसी गैरहाजिरी में राजा दंड उनके आश्रम जा पहुंचे। वहां गुरु शुक्राचार्य की रूपवती कन्या अर्जा ने उनका आदर-सत्कार किया। परंतु अर्जा के अद्वितीय रूप को निहारते ही राजा दंड का हृदय काम-वासना से ग्रसित हो उठा। अर्जा ने उन्हें बहुत समझाया कि "मैं आपकी गुरु-पुत्री होने के नाते आपकी बहन के समान हूं, अतः ऐसा अनर्थ न करें।" किंतु राजा दंड पर तो वासना का भूत सवार था। उन्होंने उस असहाय और विनती करती हुई अर्जा के साथ बलपूर्वक दुष्कर्म किया। इसके पश्चात जो घटनाक्रम घटित हुआ, वह अत्यंत ही रोंगटे खड़े कर देने वाला है। आखिर इक्ष्वाकु के पुत्र राजा दंड ने अपने ही गुरु की पुत्री के साथ ऐसा नीच कृत्य क्यों किया? भगवान विश्वकर्...