श्रृंग ऋषि
जंगल के भीतर, जहाँ सूर्य की किरणें भी ज़मीन तक पहुँचने से पहले थक जाती थीं, वहाँ एक आश्रम था। न कोई रास्ता, न कोई गाँव, न कोई इंसान। बस पेड़ थे… अग्नि थी… और मौन। उस मौन के बीच रहता था एक लड़का। अठारह वर्ष का। उसका नाम था — ऋष्यश्रृंग। उसने कभी बारिश नहीं देखी थी। कभी शहर नहीं देखा था। कभी किसी दूसरे मनुष्य को नहीं देखा था। उसे इतना ही पता था कि संसार दो चीज़ों से बना है — उसके पिता… और जंगल। उसके पिता थे विभांडक ऋषि। कठोर तपस्वी। तेजस्वी। और भयभीत। हाँ… भयभीत। क्योंकि उन्होंने संसार देखा था। उन्होंने मनुष्य देखे थे। उनकी इच्छाएँ, छल, लोभ, मोह देखा था। और इसलिए उन्होंने ठान लिया था — उनका पुत्र इस दुनिया से दूर रहेगा। “दुनिया दूषित है,” वे कहते। “तुम्हें उससे बचाकर रखना ही मेरा धर्म है।” ऋष्यश्रृंग सिर झुका देता। क्योंकि उसने कभी कोई दूसरा सत्य देखा ही नहीं था। हर सुबह वह अग्नि में आहुति देता। पक्षियों से बातें करता। पेड़ों के नाम जानता था। तारों की चाल पहचानता था। लेकिन वह यह नहीं जानता था कि — हँसी कैसी होती है, भीड़ कैसी होती है, और किसी दूसरे इंसान का स्पर्श कैसा होता है। कभी-कभी व...