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भगवान विष्णु ब्रह्माण्ड कैसे बनाते हैं और शिव कैसे विनाश करते हैं?

कल्पना कीजिए... आप एक ऐसे असीमित अंधकार में खड़े हैं, जहाँ समय (Time) और स्थान (Space) का भी जन्म नहीं हुआ है। चारों ओर एक ऐसा अनंत शून्य है जो डरावना नहीं, बल्कि गहरे ध्यान सा शांत है। न कोई ध्वनि, न प्रकाश, न दिशा और न ही कोई आकार। सब कुछ एकदम स्थिर है। फिर अचानक, उस असीम सन्नाटे को चीरती हुई एक हल्की-सी सांस सुनाई देती है—बहुत शांत, बहुत लयबद्ध और बहुत गहरी। उस एक सांस के बाहर निकलते ही जैसे ब्रह्मांडीय जादू हो जाता है। उस श्वास के घर्षण से अनंत ब्रह्मांड जन्म लेते हैं—अरबों तारे एक साथ फूटते हैं, आकाशगंगाएँ अपने अक्ष पर घूमने लगती हैं, और अनगिनत ग्रहों पर जीवन का पहला स्पंदन शुरू हो जाता है। और ठीक उसी क्षण, जब सृष्टि अपने चरम पर पहुँचती है, कहीं दूर से एक और ध्वनि गूँजती है—डमरू की थाप। ढम... ढम... ढम...। वह थाप इतनी प्रचंड है कि सारे ब्रह्मांड थरथरा उठते हैं। फिर एक तीसरी आँख खुलती है—एक प्रचंड ज्वाला निकलती है, और सब कुछ भस्म होकर, पिघलकर फिर से उसी आदि-शून्य में लौट जाता है। यह कोई आधुनिक हॉलीवुड की विज्ञान कथा (Sci-Fi) या कोरी कविता नहीं है। यह वह परम सत्य है जो विष्णु पुराण, ...

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