युधिष्ठिर की स्वर्ग यात्रा
महाभारत के महासंग्राम में विजय प्राप्त करने के बाद, पांडवों ने लगभग 36 वर्षों तक हस्तिनापुर पर धर्मपूर्वक शासन किया। लेकिन दोस्तों, समय कभी एक जैसा नहीं रहता। द्वापर युग की संध्या आ चुकी थी और पृथ्वी पर अजीब, डरावने और विनाशकारी संकेत दिखाई देने लगे थे। माता गांधारी के शाप और स्वयं श्री कृष्ण द्वारा स्वीकार किए गए विधान के कारण यदुवंश का अंत निकट आ गया। यदुवंशी वीर आपस में ही लड़कर नष्ट हो गए। इसके बाद बलराम जी ने योगबल से समाधि धारण की और संसार त्याग दिया। कुछ समय बाद, एक अनजाने शिकारी के तीर को निमित्त बनाकर योगेश्वर श्री कृष्ण ने भी अपनी इस नश्वर लीला का समापन किया और अपने परम धाम वैकुंठ को प्रस्थान कर गए। जब यह महाशोक का समाचार पांडवों तक पहुँचा, तो वे समझ गए कि इस त्रि-आयामी (3D) भौतिक संसार में उनका कार्य अब पूर्ण हो चुका है। ब्रह्मांडीय ऊर्जा का संतुलन बिगड़ रहा था। धर्मराज युधिष्ठिर ने तुरंत एक बड़ा निर्णय लिया। उन्होंने अपने सौतेले भाई युत्सु को बुलाया और समूचे हस्तिनापुर की सुरक्षा एवं संचालन की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी। साथ ही, वीर अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित का विधिवत राज्य...