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मत्स्य अवतार

सृष्टि की सबसे बड़ी भूल यही है कि मनुष्य समय को सीधी रेखा समझता है… जबकि सनातन धर्म समय को चक्र मानता है। एक ऐसा चक्र… जिसमें सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलयुग बार-बार आते हैं… और फिर समाप्त होकर पुनः जन्म लेते हैं। जिस कलयुग में हम आज जी रहे हैं… यह पहला कलयुग नहीं है। हमसे पहले भी असंख्य कल्प बीत चुके हैं। असंख्य बार ब्रह्मा का दिन आरंभ हुआ… और असंख्य बार समाप्त। मत्स्य अवतार की कथा भी ऐसे ही एक प्राचीन कल्प के अंत की है। उस समय जो कलयुग समाप्त हो रहा था… वह आज के कलयुग से बिल्कुल भिन्न था। उस युग में राजा थे… विशाल साम्राज्य थे… ऋषि थे… तप था… धर्म था… लेकिन धीरे-धीरे अधर्म भी बढ़ने लगा था। आज के कलयुग में मनुष्य मशीनों पर निर्भर है, जबकि तब के कलयुग में मनुष्य प्रकृति और दिव्य शक्तियों के निकट था। आज सत्ता नेताओं और मंत्रियों के हाथ में है, तब पृथ्वी पर चक्रवर्ती सम्राट शासन करते थे। आज विज्ञान बाहरी दुनिया को जीतना चाहता है, तब का विज्ञान ब्रह्मांड और आत्मा को समझने का प्रयास करता था। लेकिन दोनों कलयुगों में एक समानता थी… अहंकार। और जब अहंकार सीमा पार कर देता है… तब सृष्टि स्वयं क...

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