क्या सच में ब्रह्मा ने अपनी ही बेटी से भोग किया था। या झूठ

कल्पना कीजिए एक बड़े से विश्वविद्यालय के क्लासरूम की। वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का एक कमरा है, जहाँ एक प्रोफेसर छात्रों के सामने खड़े हैं। विषय चल रहा है—रेप और यौन अपराध। क्लास में सन्नाटा है, छात्र ध्यान से सुन रहे हैं। तभी वह प्रोफेसर एक ऐसा दावा करते हैं जो सीधे तौर पर करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र पर एक भयंकर प्रहार है। वह प्रोफेसर अपने छात्रों को पढ़ाते हैं कि इस जघन्य अपराध, यानी रेप की शुरुआत किसी और ने नहीं, बल्कि स्वयं हिंदू देवता ब्रह्मा जी ने की थी, जब उन्होंने अपनी ही पुत्री माँ सरस्वती के साथ जोर-जबरदस्ती की।
इंटरनेट के इस असीम मायाजाल में अगर आप आज गोता लगाएँ, तो आपको ऐसे हजारों लोग, सैकड़ों ब्लॉग्स, अनगिनत आर्टिकल्स और ट्विटर थ्रेड्स मिल जाएंगे जहाँ लोग चीख-चीख कर माँ सरस्वती के लिए तथाकथित 'इंसाफ' मांगते नजर आते हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य सनातन हिंदू धर्म को इस घृणित अपराध का जनक बताना है। और जब आप उनसे पूछेंगे कि तुम्हारे पास क्या प्रमाण है? तो वे आपके चेहरे पर हिंदू ग्रंथों की आधी-अधूरी कटी हुई कुछ पंक्तियां फेंक मारेंगे। या फिर वे आपको बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर द्वारा लिखी गई किताब 'रिडल्स इन हिंदुइज्म' के पन्ने थमा देंगे। इन पन्नों में सिर्फ ब्रह्मा जी का ही अपमान नहीं किया गया है, बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को सीता जी का भाई तक बता दिया गया है। इसी पुस्तक में यह भी दावा किया गया है कि राम जी के अन्य स्त्रियों के साथ संबंध थे, लव-कुश असल में रावण के पुत्र थे, और भगवान राम शराबी और मांसाहारी थे।
लेकिन क्या आपने कभी एक पल रुककर यह सोचा है कि इन भयंकर दावों का असल आधार क्या था? आधार थे वो विदेशी अनुवाद और कुछ भटकी हुई बौद्ध रामायण के भ्रामक तथ्य, जिन्हें एक सोची-समझी साजिश के तहत तैयार किया गया था। इन अनुवादों के पीछे मैक्स मूलर जैसे लोगों का हाथ था। वही मैक्स मूलर, जिसने अपनी ही पत्नी को लिखी एक चिट्ठी में बड़े गर्व से बताया था कि "मैंने वेदों का जो नया एडिशन तैयार किया है, वो असल में भारतीयों के धर्म की जड़ है, और हमें इसे ही उखाड़ फेंकना होगा।" एक अन्य खत में वह लिखता है कि "भारत की शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से नष्ट करके ही हम ईसाइयत और पश्चिमी सभ्यता को भारत में स्थापित कर पाएंगे।" और आज, विडंबना देखिए कि हमारे ही देश के कुछ लोग, ऐसे ही विदेशी षड्यंत्रकारियों के लिखे झूठे अनुवादों को परम सत्य मानकर अपने ही धर्म को दिन-रात कोस रहे हैं।
नमस्कार दोस्तों! मैं हूँ आपका दोस्त, धर्मेंद्र, और आप देख रहे हैं 'अध्यात्म गुरु की दुनिया' की एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और सत्य को उजागर करने वाली डॉक्युमेंट्री।
सनातन धर्म पर कीचड़ उछालने का यह खेल कोई आज का नहीं है, यह बहुत पुराना है। आपको बार-बार वही आधी-अधूरी बातें बताई जाएंगी, आपको उकसाया जाएगा, लेकिन कोई आपसे यह नहीं कहेगा कि जाओ और अपने शास्त्रों को, अपनी कथाओं को उनकी संपूर्णता में गहराई से पढ़ो। मेरे इस सफर का, इस डॉक्युमेंट्री को आप तक पहुँचाने का केवल एक ही उद्देश्य है—सत्य की उन परतों को खोलना जो सालों से झूठ के नीचे दबी हैं। ताकि आप, एक सनातनी होते हुए भी, इन षड्यंत्रों के चक्रव्यूह में फँसकर अपने ही महान दर्शन को नफरत की निगाह से न देखने लगें।
आज हम उन आक्षेपों का पूरी तरह से खंडन करेंगे जो विधाता ब्रह्मा जी और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती के पवित्र रिश्ते पर लगाए जाते हैं। तो आइए, बिना किसी विलंब के, आज के इस महा-विश्लेषण को आरंभ करते हैं।
जब भी कोई आपसे यह तर्क देता है कि ब्रह्मा जी ने अपनी ही बेटी से विवाह कर लिया, तो वह बड़ी चालाकी से आपके सामने 'श्रीमद्भागवत महापुराण' के तृतीय स्कंध के 12वें अध्याय का एक छोटा सा हिस्सा रख देता है। वहाँ लिखा है: "भगवान ब्रह्मा की कन्या सरस्वती बड़ी ही सुकुमारी और मनोहर थीं। हमने सुना है, एक बार उसे देखकर ब्रह्मा जी काम-मोहित हो गए थे, यद्यपि वह स्वयं वासना-हीन थीं।"
बस! कहानी को यहीं रोक दिया जाता है। इसके आगे क्या हुआ और इसके पीछे का प्रसंग क्या था, यह आपको कभी नहीं बताया जाएगा। इसी वजह से एक आम हिंदू शर्मिंदगी से अपना सिर झुका लेता है या निरुत्तर हो जाता है। लेकिन आज हम सिर नहीं झुकाएंगे। आज हम जानेंगे कि कैसे बिना संदर्भ (Context) के आधी-अधूरी जानकारी देकर समाज को मूर्ख बनाया जाता है।
हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि भागवत पुराण का यह 12वां अध्याय असल में किस विषय पर बात कर रहा है। यह अध्याय कोई आम इंसानों के जन्म की कहानी नहीं है, बल्कि यह 'सृष्टि के विस्तार' का वर्णन करता है। ब्रह्मांड के जन्म का विज्ञान है यह। यहाँ बताया गया है कि कैसे प्रजापति ब्रह्मा जी ने अपने शरीर के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग गुणधर्मों की रचना की।
कथा कहती है कि ब्रह्मा जी की गोद से दक्ष प्रकट हुए, अंगूठे से वशिष्ठ, प्राण से भृगु, त्वचा से क्रतु, हाथ से पुलह और मुख से ज्ञान की देवी सरस्वती उत्पन्न हुईं।
अब जरा विज्ञान और दर्शन की कसौटी पर इसे कसकर देखिए। क्या किसी इंसान की त्वचा, मुख या अंगूठे से बच्चे पैदा हो सकते हैं? बिल्कुल नहीं। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि अत्यंत उच्च कोटि के दार्शनिक और वैज्ञानिक थे। वे 'कार्य-कारण की एकरूपता' के सिद्धांत को भली-भांति समझते थे। शेर का बच्चा शेर ही होगा। माता-पिता से संतान शारीरिक रूप से जन्म लेती है, तो वह उन्हीं के जैसी दिखेगी। तो फिर अंगूठे या मुख से जन्म लेने का क्या अर्थ है?
यहीं पर हमें समझना होगा कि पुराणों की भाषा क्या है। पुराणों की कथाएं दरअसल उस गहरे वैदिक ज्ञान को आम जनता तक पहुँचाने का एक सरल माध्यम थीं, जिसे समझना सबके बस की बात नहीं थी। जब सृष्टि का आरंभ हो रहा था, तो भारतीय दर्शन के अनुसार एक शक्ति 'अव्यक्त' (Unmanifested) अवस्था में थी। जब उस शक्ति ने स्वयं को 'व्यक्त' (Manifested) किया, तब सृष्टि का निर्माण हुआ।
इस गहरे दर्शन को समझाने के लिए पुराणों ने एक कथा रची। एक निराकार शक्ति को 'ब्रह्मा' का साकार रूप दिया गया। और जब सृष्टि बनेगी, तो सबसे पहले किस चीज की आवश्यकता होगी? ज्ञान की, बुद्धि की। सांख्य दर्शन भी यही कहता है कि जब 'प्रकृति' और 'पुरुष' का संयोग होता है, तो सबसे पहली जो चीज उत्पन्न होती है, वह है 'महत्' यानी बुद्धि। इसी 'इंटेलिजेंस' या बुद्धि को भागवत पुराण में ज्ञान की देवी सरस्वती के रूप में ब्रह्मा जी के मुख से प्रकट होता हुआ दिखाया गया है।
यहाँ सबसे ज्यादा ध्यान देने वाला शब्द है—'उत्पन्न' होना या 'प्रकट' होना। सनातन धर्म और अब्राहमिक धर्मों की फिलॉसफी में यहीं सबसे बड़ा अंतर आ जाता है। 'उत्पन्न' होने का अर्थ है कि यहाँ किसी भी प्रकार का 'मिथुन धर्म' यानी शारीरिक संभोग या रिप्रोडक्शन नहीं हुआ है। यह सृष्टि निर्माण की एकदम शुरुआती प्रक्रिया है, जहाँ इंसानों या जीवों का जन्म तक नहीं हुआ है। ब्रह्मा जी एक 'क्रिएटर' हैं, सृष्टिकर्ता हैं। और एक सृष्टिकर्ता की हर रचना को उसकी संतान माना जाता है। इसलिए सरस्वती जी को पुत्री जरूर कहा गया है, लेकिन सत्य अर्थों में सरस्वती जी ब्रह्मा जी की जैविक पुत्री नहीं, बल्कि उनकी 'कृति' हैं, उनकी रचना हैं।
शारीरिक संबंध या 'मिथुन धर्म' से संतान पैदा होने की जो प्रक्रिया है, वह इसी अध्याय में बहुत बाद में शुरू होती है। जब सृष्टि को आगे बढ़ाना था, तब कथा कहती है कि ब्रह्मा जी के शरीर के दो भाग हुए। एक भाग से पुरुष (स्वायंभुव मनु) और दूसरे भाग से स्त्री (महारानी शतरूपा) प्रकट हुए। पुराण स्पष्ट शब्दों में कहता है कि: "तब से मिथुन धर्म (स्त्री-पुरुष संभोग) से प्रजा की वृद्धि होने लगी।"
यानी, जब सरस्वती जी प्रकट हुई थीं, तब ब्रह्मांड में मिथुन धर्म या शारीरिक संबंध जैसी कोई चीज मौजूद ही नहीं थी! तो फिर व्यभिचार का प्रश्न ही कहाँ उठता है?
अब जो लोग हमारे दर्शन पर हंसते हैं, जरा उनके धर्मों का आधार देखिए। अब्राहमिक धर्मों में 'आदम और हव्वा' (एडम और ईव) की कथा आती है। वहां दुनिया के पहले पुरुष और स्त्री से संतानें पैदा होती हैं। अब सोचिए, एक ही माता-पिता की संतानें आपस में क्या हुईं? भाई-बहन। और फिर उन भाई-बहनों ने आपस में ही शारीरिक संबंध बनाए और सृष्टि को आगे बढ़ाया। एडम के बेटे केन ने अपनी ही बहन से शादी की। यह उनकी धार्मिक किताबों का आधार है। जिस धर्म का आधार ही भाई-बहन के शारीरिक संबंधों पर टिका हो, वह बेहद बचकानी और शर्मसार कर देने वाली फिलॉसफी है। सनातन धर्म की 'मनु और शतरूपा' की कथा इस बचकानी थ्योरी से कहीं ज्यादा वैज्ञानिक है। हमारे ऋषियों ने मिथुन धर्म को बहुत बाद में रखा, ताकि ऐसी वैचारिक दरिद्रता से बचा जा सके।
अब आपके मन में यह प्रश्न जरूर उठ रहा होगा कि मेरे दोस्त धर्मेंद्र, अगर मिथुन धर्म था ही नहीं, तो पुराण में यह क्यों लिखा गया कि ब्रह्मा जी अपनी ही कृति पर काम-मोहित हो गए?
यहीं पर कहानी का वह हिस्सा आता है जो ये षड्यंत्रकारी आपसे छिपा लेते हैं। पुराण समाज को शिक्षा देने का एक आईना हैं। इस कथा के माध्यम से समाज को एक बहुत बड़ा नैतिक पाठ पढ़ाया गया है। जब ब्रह्मा जी के मन में यह विचार आया, तो इस कथा को आगे पढ़िए।
इसी अध्याय में आगे लिखा है कि जब उनके पुत्रों (मरीचि आदि ऋषियों) ने यह देखा, तो उन्होंने अपने पिता को बड़ी कठोरता से समझाया। उन्होंने कहा, "पिताजी! आप समर्थ हैं, फिर भी अपने मन में उत्पन्न हुए काम के वेग को न रोककर पुत्री-गमन जैसा दुस्तर पाप करने का संकल्प कर रहे हैं? ऐसा तो आपसे पूर्ववर्ती किसी भी ब्रह्मा ने नहीं किया और न आगे ही कोई करेगा।"
पुत्रों की यह बात सुनकर प्रजापतियों के पति ब्रह्मा जी अत्यंत लज्जित हुए। आत्मग्लानि में डूबकर उन्होंने उसी क्षण अपने उस शरीर का ही त्याग कर दिया। पुराण कहता है कि उनका वह त्यागा हुआ शरीर दिशाओं ने ले लिया और वह 'घोर अंधकार' या 'कोहरा' बन गया।
सोचिए! इस कहानी का वास्तविक सार क्या है? इसका सार यह है कि अपनी पुत्री या अपनी कृति के प्रति काम-वासना रखना तो दूर, उसके बारे में सोचना भी इतना भयंकर पाप है कि स्वयं विधाता को भी इसके लिए अपने शरीर का त्याग करना पड़ा। जो भी पुरुष इस कथा को पढ़ेगा, उसे यह स्पष्ट शिक्षा मिलेगी कि पुत्री-गमन इस ब्रह्मांड का सबसे निकृष्ट कृत्य है। इस अध्याय में कहीं भी ब्रह्मा और सरस्वती का विवाह नहीं हुआ है, बल्कि बुराई के पतन को दर्शाया गया है।
अब एक और उलझन है जो आम सनातनी के मन में आती है। हम सभी पूजा करते समय ब्रह्मा जी के साथ माँ सरस्वती को उनकी पत्नी के रूप में पूजते हैं। अगर भागवत पुराण में उनका विवाह नहीं हुआ, तो यह विवाह कहाँ हुआ? और वह सरस्वती कौन हैं?
सच्चाई की एक और परत खुलती है 'ब्रह्म वैवर्त पुराण' में। यहाँ ब्रह्मा जी के सगुण स्वरूप का वर्णन है। इसके 35वें अध्याय में स्वयं भगवान श्री नारायण (विष्णु जी) बताते हैं कि: "ब्रह्मा जी ने गोलोक में जाकर मेरे मुखारविंद से निर्गत संपूर्ण विद्याओं की अधिष्ठात्री देवी सती 'भारती' को प्राप्त किया।"
माँ सरस्वती का ही एक प्राचीन नाम 'भारती' है। क्या ये वही सरस्वती हैं? जी हाँ। पुराण आगे उन्हें 'वागीश्वरी' यानी वीणा धारण करने वाली और 'श्वेतवर्णा' बताता है। उनके हाथों में वीणा, पुस्तक और व्याख्या की मुद्रा है। इससे पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि ये वही सरस्वती देवी हैं जिनकी हम ब्रह्मा जी के साथ पत्नी रूप में पूजा करते हैं। और सबसे बड़ा सत्य यह है कि ये देवी ब्रह्मा जी से उत्पन्न नहीं हुईं, बल्कि भगवान विष्णु के मुख से उत्पन्न हुई थीं! ब्रह्मा जी ने विष्णु जी से उत्पन्न ज्ञान की देवी को अपनी पत्नी के रूप में प्राप्त किया था।
हमें यह भी समझना होगा कि सनातन दर्शन में 'ब्रह्मा' कोई एक व्यक्ति विशेष नहीं हैं। जब मरीचि ने ब्रह्मा जी को समझाया था, तो उन्होंने साफ कहा था कि "आपसे पूर्ववर्ती किसी ब्रह्मा ने ऐसा नहीं किया और न आगे कोई करेगा।"
इसका सीधा अर्थ है कि इन ब्रह्मा जी से पहले भी कई ब्रह्मा आ चुके हैं और आगे भी आएंगे। सनातन धर्म आज के आधुनिक विज्ञान से हजारों साल पहले 'मल्टीवर्स' (Multiverse) यानी अनंत ब्रह्मांडों का सिद्धांत दे चुका था। ब्रह्मा असल में 'सृजन की शक्ति' का एक पद है। ब्रह्मांड में जहाँ भी सृजन होगा, वहाँ ज्ञान की आवश्यकता होगी। इसीलिए हर ब्रह्मांड के ब्रह्मा के साथ ज्ञान की देवी सरस्वती को जोड़ा जाता है। अब किस ब्रह्मा जी का किस सरस्वती जी से संयोग दिखाया गया है, यह पौराणिक कथाओं के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
अक्सर वामपंथी और कुछ अज्ञानी लोग यह भी आक्षेप लगाते हैं कि हिंदू धर्म वाले अपनी कहानियों को बचाने के लिए उन्हें हमेशा रूपक या मेटाफर बता देते हैं। लेकिन मैं आपको बता दूँ कि हमारे पुराणों में ही बीच-बीच में यह स्पष्ट ज्ञान पिरोया गया है ताकि पाठक कथाओं में भटक न जाए।
श्रीमद्भागवत महापुराण खुद कहता है कि: "ब्रह्मा जी 'शब्द ब्रह्म स्वरूप' हैं। वह वैखरी रूप से व्यक्त और ओंकार रूप से अव्यक्त हैं।"
इसी तरह ब्रह्म वैवर्त पुराण साफ शब्दों में कहता है: "मन को ही ब्रह्मा, ज्ञान को महेश्वर, और वाणी की अधिष्ठात्री देवी को सरस्वती जानो।"
जब आप बोलते हैं, तो आपका मन (ब्रह्मा) आपकी वाणी और ज्ञान (सरस्वती) का ही तो पीछा करता है।
650 ईस्वी के महान दार्शनिक और विद्वान कुमारिल भट्ट को पता था कि भविष्य में निर्बुद्धि लोग हमारे शास्त्रों का गलत अर्थ निकालेंगे। इसलिए उन्होंने अपने महान ग्रंथ 'तन्त्रवार्तिक' में इस पूरे प्रसंग की एक अद्भुत और वैज्ञानिक व्याख्या की है। उन्होंने ब्रह्मा जी (जिन्हें प्रजापति भी कहा जाता है) की व्याख्या करते हुए लिखा:
"संसार का रक्षक होने के कारण 'सूर्य' ही प्रजापति है। वह सुबह फटने के समय 'उषा' (Dawn) के पीछे-पीछे उदित हो जाता है। वह उषा सूर्य के प्रकाश से ही उत्पन्न होती है, इसलिए कथाओं में उषा को सूर्य की पुत्री के समान बताया गया। इसी उषा में जब सूर्य अपनी लाल किरणें डालता है, तो इस खगोलीय घटना को समझाने के लिए उसे स्त्री-पुरुष के संयोग की उपमा (मेटाफर) दे दी गई।"
यह प्रकृति का विज्ञान है। प्रकाश और ऊर्जा का खेल है। दो मेटाफर्स (उपमाओं) को मिलाकर आज के लोग उसका गंदा मजाक बना देते हैं।
इसी बात को पंडित माधवाचार्य शास्त्री जी ने मनोवैज्ञानिक रूप से समझाते हुए कहा है कि: "इस पूरी कथा का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि वाणी (सरस्वती) का अंधा अनुगमन करते हुए जब इंसान का मन (ब्रह्मा) भटकता है, तो उसका विवेक (मरीचि ऋषि) उसे बार-बार सावधान करता है। यही इस कथा का गहरा रहस्य है।"
तो मेरे प्यारे दोस्तों, यह था उस आधी-अधूरी कथा का संपूर्ण, प्रामाणिक और दार्शनिक सच। हमारे प्राचीन ऋषियों ने मनुष्य के मनोविज्ञान, ब्रह्मांड की उत्पत्ति और चेतना के विस्तार को आम इंसान तक पहुँचाने के लिए जो रूपक गढ़े, आज के पश्चिमी मानसिकता के गुलाम उन पवित्र रूपकों को अपनी गंदी और संकीर्ण सोच के तराजू पर तौलते हैं।
मुझे पूरा विश्वास है कि 'अध्यात्म गुरु की दुनिया' की इस डॉक्युमेंट्री ने आपके मन में उठ रहे सारे सवालों और संशयों को जड़ से खत्म कर दिया होगा। अब भविष्य में यदि कोई भी आपके सामने सनातन धर्म की इन पवित्र कथाओं का ऐसा भद्दा मजाक बनाएगा, तो आप निरुत्तर होकर सिर नहीं झुकाएंगे। आप पूरे प्रमाण और तर्कों के साथ उसकी आँखों में आँखें डालकर उसे सनातन सत्य से परिचित कराएंगे।
अगर आपको सत्य की यह गहराई और यह दार्शनिक विश्लेषण पसंद आया हो, तो अपने इस दोस्त धर्मेंद्र के चैनल 'अध्यात्म गुरु की दुनिया' को सब्सक्राइब करना बिल्कुल मत भूलिएगा। इस डॉक्युमेंट्री को अपने परिवारजनों, मित्रों और हर उस व्यक्ति के साथ साझा करें जिसे अपने धर्म की महानता पर गर्व है।
आज की इस डॉक्युमेंट्री को मैं यहीं विराम देता हूँ। मैं, धर्मेंद्र, जल्द ही मिलूँगा आपसे एक और नए रहस्य, एक और नए सत्य के साथ। तब तक के लिए अपना ध्यान रखें, स्वाध्याय करते रहें और सत्य के मार्ग पर चलते रहें।
जय श्री राम!

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