शुक्राचार्य की पुत्री से राजा दंड की कामवासना
वासना का अंधापन: राजा दंड और अर्जा कामुकता और वासना के तीव्र वेग पर नियंत्रण पाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है। बड़े-बड़े पराक्रमी और शूरवीर भी इसके सम्मुख घुटने टेक देते हैं। ऐसे ही एक प्रतापी योद्धा थे महाराज इक्ष्वाकु के सुपुत्र दंड। दंड ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य जी को अपना मार्गदर्शक और कुलगुरु स्वीकार किया था। एक दिन ऐसा हुआ कि गुरुदेव आश्रम में उपस्थित नहीं थे, और इसी गैरहाजिरी में राजा दंड उनके आश्रम जा पहुंचे। वहां गुरु शुक्राचार्य की रूपवती कन्या अर्जा ने उनका आदर-सत्कार किया। परंतु अर्जा के अद्वितीय रूप को निहारते ही राजा दंड का हृदय काम-वासना से ग्रसित हो उठा। अर्जा ने उन्हें बहुत समझाया कि "मैं आपकी गुरु-पुत्री होने के नाते आपकी बहन के समान हूं, अतः ऐसा अनर्थ न करें।" किंतु राजा दंड पर तो वासना का भूत सवार था। उन्होंने उस असहाय और विनती करती हुई अर्जा के साथ बलपूर्वक दुष्कर्म किया। इसके पश्चात जो घटनाक्रम घटित हुआ, वह अत्यंत ही रोंगटे खड़े कर देने वाला है। आखिर इक्ष्वाकु के पुत्र राजा दंड ने अपने ही गुरु की पुत्री के साथ ऐसा नीच कृत्य क्यों किया? भगवान विश्वकर्मा की जवान बेटी चित्रांगदा खुद ही एक राजा की काम-प्यास बुझाने के लिए क्यों प्रस्तुत हो गई? देव शिल्पी विश्वकर्मा को वानर का रूप क्यों धारण करना पड़ा? दंडकारण्य नामक वन के निर्माण की क्या कथा है (जहां श्रीराम ने तपस्वियों की रक्षा की प्रतिज्ञा ली थी)? और वानर तथा अप्सरा के मिलन से उत्पन्न हुए विश्वकर्मा के पुत्र नल के जन्म का क्या रहस्य है? यह सब कुछ आपको इस प्रसंग में विस्तार से जानने को मिलेगा। यह संपूर्ण वृत्तांत वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड और वायु पुराण के पन्नों से लिया गया है। चलिए, इस दिलचस्प कथा का श्रीगणेश करते हैं। विंध्य का राज्य और गुरु की अनुपस्थिति प्रतापी राजा इक्ष्वाकु के सौ से भी अधिक पुत्र थे, जिनमें से एक का नाम दंड था। महाराज इक्ष्वाकु ने दंड को विंध्य पर्वत के आसपास का राज्य सौंप दिया था। दंड ने अपने बाहुबल और कौशल से उस प्रदेश को अत्यंत रमणीय बना दिया था। वहां की प्रजा बड़े आनंद से जीवन व्यतीत कर रही थी। चारों ओर हरियाली छाई रहती थी, सरोवर हमेशा पानी से लबालब भरे रहते थे, और पशु-पक्षी भी वहां असीम सुख का अनुभव करते थे। कुल मिलाकर राजा दंड के सुशासन में विंध्य का वह इलाका किसी स्वर्ग से कम सुंदर नहीं था। एक समय की बात है, शुक्राचार्य जी असुरराज वृषपर्वा के यहां एक विशाल यज्ञ संपन्न कराने हेतु गए हुए थे। इस यज्ञ में उन्हें काफी लंबा समय लग गया, जिसके कारण वे राजा दंड को बहुत दिनों तक दर्शन नहीं दे सके। लंबे अरसे तक गुरुदेव से भेंट न होने के कारण दंड को फिक्र होने लगी। अतः वे अपने गुरु से मिलने उनके आश्रम की ओर निकल पड़े। आश्रम पहुंचने पर वहां रहने वाले लोगों ने बताया कि महर्षि यहां नहीं हैं, बल्कि वे वृषपर्वा के महल गए हैं। राजा ने पूछा कि "यदि गुरुदेव नहीं हैं, तो आश्रम में यह जो चहल-पहल दिख रही है, वह किसलिए है?" तब आश्रमवासियों ने उत्तर दिया कि महर्षि की सुपुत्री अर्जा यहीं निवास करती हैं, और उन्हीं की उपस्थिति के कारण यह रौनक है। यह सुनकर दंड के मन में उत्सुकता जागी और वे अर्जा से भेंट करने भीतर चले गए। दंड का कामातुर होना और अर्जा का विरोध अंदर जाने पर अर्जा ने उनका भव्य स्वागत किया और सम्मानपूर्वक उन्हें आसन ग्रहण करवाया। अर्जा का सौंदर्य अत्यंत मनमोहक था। गुरु-पुत्री की उस अप्रतिम सुंदरता को देखकर राजा दंड के हृदय में कामुकता ने डेरा डाल लिया। वासना में अंधे होकर दंड ने अपने साथ आए सेवकों और आश्रम के अन्य लोगों को वहां से बाहर जाने का आदेश दे दिया। एकांत पाकर उसने अर्जा से अपनी पापी मंशा जाहिर की। कामदेव के बाणों से घायल राजा ने कहा, "हे रूपसी! इस वक्त मैं काम की ज्वाला में बुरी तरह जल रहा हूं। कृपा करके मेरे समीप आओ और मेरी इस क्षुधा को शांत करो, जिससे मेरे अशांत मन को चैन मिल सके।" जब अर्जा ने राजा के मुख से ऐसी अनुचित बातें सुनीं, तो उसका खून खौल उठा। उसने क्रोधित होकर जवाब दिया, "हे राजन! आप मेरे पिता के शिष्य हैं, इस रिश्ते से आप मेरे गुरु-भाई हुए। आपको तो अपने मुख से ऐसी बातें निकालते हुए भी लज्जा आनी चाहिए। क्या आप मेरे पिता के भयंकर क्रोध से वाकिफ नहीं हैं? उन्हीं के शुभ आशीर्वाद से आपका यह राज्य स्वर्ग के समान फला-फूला है। यदि उनका कोप आप पर भड़क गया, तो आपके पूरे साम्राज्य का सर्वनाश हो जाएगा।"
इस पर दंड ने पलटकर कहा, "तुम्हारे पिता जब मुझे अपने श्राप की अग्नि में भस्म करेंगे, वह तो भविष्य की बात है। लेकिन इस समय तो मैं काम की आग में झुलस रहा हूं। इसलिए हे सुंदरी! व्यर्थ की बातें छोड़कर मेरे पास आओ।" अर्जा ने राजा को समझाने की लाख कोशिशें कीं, पर वासना में अंधा दंड कुछ भी सुनने को तैयार न था। तब हारकर अर्जा ने कहा, "हे नरेश! यदि आप मुझ पर इतने ही मोहित हैं, तो कृपया कुछ वक्त इंतजार कीजिए। जब मेरे पिता वापस लौटें, तो आप विधिवत उनसे मेरा हाथ मांग लीजिएगा। बिना उनकी आज्ञा के स्वयं को किसी को सौंपने का अधिकार मुझे नहीं है।"
राजा ने अपनी जिद पर अड़ते हुए कहा, "हे कमलनयनी! समय निकल जाने के बाद किसी भी बात का कोई मोल नहीं रह जाता। तुमने जो यह कहा कि कोई भी स्त्री स्वयं को अपनी मर्जी से नहीं सौंप सकती, इस संदर्भ में मैं तुम्हें एक पुरानी कथा सुनाता हूं।" राजा दंड ने आगे कहा, "प्राचीन काल की बात है, भगवान विश्वकर्मा और घृताची नाम की अप्सरा की एक रूपवान कन्या थी—चित्रांगदा। चित्रांगदा बेहद हसीन थी। एक दिन वह अपनी सहेलियों के संग नैमिषारण्य के वन में स्नान करने पहुंची। जैसे ही वह पानी में उतरी, ठीक उसी समय राजा सुदेव के ज्ञानी पुत्र, राजा सूरत वहां आ निकले। उन्होंने उस परम सुंदरी को देखा और काम-वासना से भर उठे। राजा को कामातुर देखकर चित्रांगदा ने अपनी सखियों से कहा कि यह राजकुमार मेरे ही रूप के कारण तड़प रहा है, अतः मैं खुद को इन्हें सौंप दूंगी। सखियों ने बहुत रोका कि तुम्हारे पिता महान धर्मनिष्ठ हैं, तुम्हारा अपनी मर्जी से खुद को राजा के हवाले कर देना कदापि उचित नहीं है। तभी बेहाल राजा सूरत करीब आ पहुंचे और आग्रह किया कि कामदेव की ज्वाला उन्हें जला देगी। इसके बाद उस सुंदरी ने सहेलियों के मना करने के बावजूद, खुद को राजा के प्रति समर्पित कर दिया। इस तरह पुराने समय में उस सुंदरी ने एक राजा की जान बचाई थी।" यह वृत्तांत अर्जा को सुनाने के बाद दंड ने कहा कि तुम्हें भी इसी तरह मेरी लाज रखनी चाहिए। अर्जा का पलटवार और विश्वकर्मा का श्राप राजा दंड की बात सुनकर अर्जा तमतमा उठी और बोली, "हे राजन! क्या तुम इस घटना के आगे का परिणाम नहीं जानते? सुनो, जब चित्रांगदा ने अपनी इच्छा से राजा सूरत को खुद को सौंप दिया, तब उसके पिता विश्वकर्मा ने क्रोध में आकर अपनी ही पुत्री को भयंकर श्राप दे दिया और कहा- 'हे मूर्ख लड़की! तूने धर्म की मर्यादा लांघ दी है। जा, अब तेरा कभी विवाह नहीं होगा और न ही तू कभी पति या संतान का सुख भोग पाएगी।' विश्वकर्मा के इस कठोर श्राप के तुरंत बाद, सरस्वती नदी राजा सूरत को अपने तेज बहाव में कई मील दूर बहाकर ले गई। राजा के इस तरह दूर बह जाने पर चित्रांगदा भी मूर्छित होकर गिर पड़ी। सखियों के लाख जतन के बाद भी जब वह न उठी तो वे उसे मृत मानकर चली गईं। बाद में जब चित्रांगदा को होश आया और उसने अपने प्रेमी को नहीं पाया, तो निराश होकर खुद को फिर से सरस्वती नदी की तेज धारा में फेंक दिया। सरस्वती नदी ने उसे गोमती नदी में धकेल दिया और गोमती की लहरों ने उसे शेरों-बाघों से भरे एक भयंकर जंगल में फेंक दिया।" यह सुनाकर अर्जा ने कहा, "हे नरेश! मैंने आपको असीमित स्वतंत्रता की इस बुरी दशा का पूरा हाल सुना दिया है। मैं अपने शील की रक्षा करूंगी और किसी भी कीमत पर खुद को तुम्हारे हवाले नहीं करूंगी।" अर्जा की बातें सुनकर दुष्ट राजा दंड बेशर्मी से हंसा और बोला, "हे रूपसी! क्या तुम्हें नहीं मालूम कि इसके बाद देव शिल्पी विश्वकर्मा की क्या दुर्दशा हुई? सुनो, चित्रांगदा जब उस घने जंगल में गिरी, तो आकाश मार्ग से गुजर रहे अंजन नाम के एक यक्ष ने उसे देखा। उसने चित्रांगदा को सांत्वना दी और भगवान श्रीकंठ (महादेव) के दर्शनों के लिए भेजा। वहां यमुना तट पर मुनि ऋतुध्वज स्नान करने पधारे। उन्होंने उस सुंदरी को देखा और उससे उसकी आपबीती पूछी। चित्रांगदा की करुण कथा सुनकर मुनि को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने उसी क्षण उस शिल्पकार (विश्वकर्मा) को यह कठोर श्राप दे दिया कि 'उस पापी पिता ने अपनी कन्या को पति सुख से वंचित किया है, इसलिए वह अब एक वानर (बंदर) बन जाए!' इसके बाद मुनि ने चित्रांगदा को सप्त गोदावरी तीर्थ जाकर हाटकेश्वर महादेव की आराधना करने का निर्देश दिया और बताया कि वहां उसे तीन अन्य कन्याएं (देववती, नंदयंती और वेदवती) मिलेंगी।" दंड ने आगे बताया, "श्राप के प्रभाव से विश्वकर्मा एक बंदर में तब्दील हो गए। वे पहाड़ से गिरकर एक भयंकर जंगल में जामुन खाकर जीवन बिताने लगे। कुछ समय बाद कंदरमाली नाम का दैत्य अपनी पुत्री देववती के साथ वहां आया। वानर रूपी विश्वकर्मा ने देववती का हाथ पकड़ लिया। कंदरमाली को क्रोधित देख वह बंदर देववती को लेकर यमुना नदी में कूद गया। कंदरमाली ने उन्हें मृत मान लिया और लौट गया। पानी के तेज बहाव में बहते हुए बंदर को भान ही नहीं रहा। जब वह बाहर निकला, तो उसे यक्ष अंजन की पुत्री नंदयंती दिखी। उसे देववती समझकर बंदर उस पर झपटा। डर के मारे नंदयंती हिरण्यवती नदी में कूद पड़ी और बह गई।" जाबालि का संकट और कन्याओं का मिलन "नंदयंती बहते-बहते कौशल देश पहुंची। वहां उसने एक विशाल बरगद के पेड़ पर जटाओं से बंधे हुए पांच वर्ष के एक बालक को देखा। वह बालक जाबालि (मुनि ऋतुध्वज का पुत्र) था। विश्वकर्मा ने श्राप का बदला लेने के लिए मुनि के पुत्र को बांध दिया था। जाबालि ने नंदयंती को बताया कि उसे केवल इक्ष्वाकु वंश का शकुनि ही खोल सकता है। जाबालि ने नंदयंती को अपने पिता मुनि ऋतुध्वज के पास श्रीकंठ महादेव के मंदिर जाने को कहा। उधर, देववती भी भटकते हुए उसी मंदिर में आ पहुंची थी। दोनों कन्याओं की वहां मुलाकात हुई। जब मुनि नहीं आए, तो उन्होंने एक शिला पर पूरी कहानी लिख दी। बाद में गालव ऋषि वहां आए और दोनों कन्याओं को अपने साथ पुष्कर तीर्थ ले गए। जब ऋतुध्वज मंदिर पहुंचे और वह शिला पढ़ी, तो वे तुरंत राजा इक्ष्वाकु के पास गए और उनके पुत्र शकुनि की मदद से अपने पुत्र जाबालि को मुक्त करवाया। मुक्त होते ही जाबालि युवा हो गया। इधर पुष्कर तीर्थ में गालव ऋषि पानी में स्नान कर रहे थे, तभी मछलियों ने उनके साथ दो जवान कन्याओं के होने पर ताना मारा। शर्म के मारे गालव ऋषि पानी से बाहर ही नहीं निकले। किनारे पर देववती, नंदयंती के साथ चित्रांगदा भी आ मिली। कुछ देर बाद घृताची अप्सरा की बेटी वेदवती भी वहां आ पहुंची। उसने बताया कि एक बंदर (विश्वकर्मा) के पीछे पड़ने के कारण पवन देव ने उसे उड़ाकर यहां फेंक दिया है। इस तरह, एक ही बंदर (विश्वकर्मा) के कारण सताई गई वे चारों कन्याएं वहां एक साथ साध्वियों की तरह रहने लगीं। "मुनि पुत्र जाबालि ने नंदयंती का उपकार चुकाने के लिए अपने पिता ऋतुध्वज से उसे खोजने का आग्रह किया। ऋतुध्वज राजा इंद्रद्युम्न के पास गए। इंद्रद्युम्न, यक्ष अंजन और दैत्य कंदरमाली—सभी अपनी-अपनी स्त्रियों और पुत्रियों की तलाश में पुष्कर वन की ओर निकल पड़े। घृताची अप्सरा भी अपनी बेटी वेदवती को खोजती हुई वहां पहुंची। उसी वन में भटकते हुए वानर रूपी विश्वकर्मा भी आ गए। घृताची और वानर विश्वकर्मा के बीच मिलन हुआ, जिससे घृताची गर्भवती हो गई। (इसी मिलन से वानर नल का जन्म हुआ)। अंततः मुनि ऋतुध्वज ने राजा सूरत (चित्रांगदा के प्रेमी) को भी साथ ले लिया। सब लोग सप्त गोदावरी तीर्थ पहुंचे। बंदर बने विश्वकर्मा ने मुनि ऋतुध्वज से श्राप मुक्ति की प्रार्थना की। मुनि ने वरदान दिया कि घृताची से महाबलवान पुत्र उत्पन्न होने पर तुम श्राप मुक्त हो जाओगे। इसके बाद चित्रांगदा, देववती, नंदयंती और वेदवती अपने-अपने प्रेमियों और परिजनों से मिल गईं। घृताची ने भी अपनी पुत्री वेदवती को देखा और सभी के जीवन में पुनः हर्ष लौट आया।"
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