राम का धाम साकेत नगरी कहां है?
त्रेता युग अपने अंतिम चरण में था। समय की धारा धीरे-धीरे उस महान क्षण की ओर बढ़ रही थी जिसकी प्रतीक्षा स्वयं देवता भी कर रहे थे। पृथ्वी पर धर्म की स्थापना हो चुकी थी। अधर्म का अंत हो चुका था। अयोध्या नगरी अपनी दिव्यता के चरम पर थी। चारों दिशाओं में सुख, शांति और समृद्धि का साम्राज्य था। कोई रोगी नहीं था, कोई दुखी नहीं था, कोई अन्यायी नहीं था। यह वही रामराज्य था जिसकी कल्पना युगों-युगों तक ऋषि-मुनि करते आए थे। और इस दिव्य राज्य के केंद्र में विराजमान थे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम। वे केवल अयोध्या के राजा नहीं थे। वे धर्म के आधार थे, सत्य के स्वरूप थे, करुणा की मूर्ति थे। उनके दर्शन मात्र से मनुष्य के भीतर का अंधकार समाप्त हो जाता था। परंतु संसार की हर लीला की तरह यह लीला भी एक दिन पूर्ण होनी थी। जब प्रभु ने अनुभव किया कि पृथ्वी पर उनका कार्य पूर्ण हो चुका है, तब उन्होंने अपने परमधाम लौटने का निश्चय किया। यह कोई साधारण निर्णय नहीं था। क्योंकि यह केवल एक राजा का प्रस्थान नहीं था। यह स्वयं परमात्मा का पृथ्वी से अदृश्य होना था। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में वर्णन मिलता है कि जब यह समय निकट आया तो देवताओं में भी हलचल मच गई। ब्रह्मा जी स्वयं देवताओं के साथ प्रकट हुए और folded hands में प्रभु श्रीराम से बोले— “हे प्रभु, आपने पृथ्वी का भार हर लिया। धर्म की पुनः स्थापना कर दी। अब समय आ गया है कि आप अपने सनातन धाम लौट चलें।” जैसे ही यह समाचार अयोध्या में फैला, पूरी नगरी शोक में डूब गई। लोग रोने लगे। माताएं विलाप करने लगीं। वृद्ध कांपते हुए प्रभु के दर्शन के लिए दौड़ पड़े। छोटे-छोटे बालक अपने माता-पिता से पूछने लगे— “क्या राम हमें छोड़कर चले जाएंगे?” केवल मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी व्याकुल हो उठे। गायों ने चारा छोड़ दिया। पक्षियों ने गीत गाना बंद कर दिया। यहां तक कि वृक्षों के पत्ते भी झुक गए मानो वे भी अपने प्रभु के वियोग में अश्रु बहा रहे हों। क्योंकि श्रीराम केवल राजा नहीं थे, वे अयोध्या की आत्मा थे। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास बार-बार यही भाव व्यक्त करते हैं कि भगवान श्रीराम को केवल प्रेम प्रिय है— “रामहि केवल प्रेम पियारा।” और उस दिन पूरी अयोध्या का प्रेम आंसुओं के रूप में बह रहा था। प्रभु श्रीराम ने अपने पुत्रों लव और कुश को राज्य सौंप दिया। भरत, शत्रुघ्न और समस्त मंत्रियों को अंतिम आदेश दिए। फिर वे धीरे-धीरे सरयू नदी की ओर बढ़ने लगे। उनके मुख पर वही दिव्य शांति थी जो केवल परमात्मा के मुख पर हो सकती है। उनके प्रत्येक कदम के साथ हजारों-लाखों अयोध्यावासी भी चल पड़े। कोई पीछे नहीं रहना चाहता था। हर किसी के हृदय में एक ही भावना थी— “जहां राम जाएंगे, वहीं हम भी जाएंगे।” जब प्रभु गुप्तार घाट पहुंचे तो कुछ क्षणों के लिए रुक गए। उन्होंने अपनी प्रिय अयोध्या की ओर देखा। वह दृष्टि साधारण नहीं थी। उसमें करुणा थी, वात्सल्य था, अनंत प्रेम था। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं समय भी उस क्षण ठहर गया हो। फिर प्रभु धीरे-धीरे सरयू के जल में उतरने लगे। जैसे ही उनका चरण जल को स्पर्श करता है, वैसे ही पूरी सरयू दिव्य प्रकाश से चमक उठती है। आकाश में दुंदुभियां बजने लगती हैं। देवताओं के विमान प्रकट हो जाते हैं। पुष्पों की वर्षा होने लगती है। और तभी एक ऐसा रहस्य प्रकट होता है जिसे सामान्य लोग नहीं जानते। सरयू के मध्य एक दिव्य द्वार प्रकट होता है। वह कोई साधारण द्वार नहीं था। वह था— साकेत लोक का प्रवेश द्वार। अधिकांश लोग यही मानते हैं कि भगवान श्रीराम विष्णु के अवतार थे, इसलिए वे वैकुंठ लौट गए। यह सत्य है, परंतु अधूरा सत्य है। क्योंकि हमारे अनेक पौराणिक ग्रंथ एक ऐसे दिव्य धाम का वर्णन करते हैं जो स्वयं वैकुंठ से भी अधिक रहस्यमय माना गया है। उस धाम का नाम है— साकेत लोक। बृहद ब्रह्म संहिता, पद्म पुराण, विष्णु पुराण और रामभक्ति की प्राचीन परंपराओं में साकेत लोक का अत्यंत गूढ़ वर्णन मिलता है। पद्म पुराण में भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं— “वैकुंठस्य अंतरे दिव्यं साकेतं नाम वै पुरम्।” अर्थात वैकुंठ के भीतर एक दिव्य और परम पवित्र धाम स्थित है जिसे साकेत कहा जाता है। यह धाम विशेष रूप से भगवान श्रीराम और उनके प्रेममय भक्तों का निवास स्थान है। जैसे भगवान श्रीकृष्ण का गोलोक है, वैसे ही भगवान श्रीराम का निजधाम साकेत है। परंतु साकेत केवल ऐश्वर्य का धाम नहीं है। यह प्रेम का धाम है। यह मर्यादा का धाम है। यह करुणा का धाम है। यहां भगवान केवल सर्वशक्तिमान ईश्वर के रूप में नहीं रहते। यहां वे अपने भक्तों के अपने राम हैं। किसी के पुत्र, किसी के भाई, किसी के मित्र, किसी के स्वामी और किसी के आराध्य। कहा जाता है कि साकेत लोक की रचना किसी देवता ने नहीं की। वह स्वयं भगवान श्रीराम की चेतना से प्रकट हुआ। जैसे सूर्य से प्रकाश अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही श्रीराम से साकेत अलग नहीं किया जा सकता। यह उनके प्रेम का विस्तार है। वहां सूर्य नहीं उगता, फिर भी चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश है। वह प्रकाश सूर्य या अग्नि का नहीं, बल्कि स्वयं परम चेतना का है। वहां की भूमि रत्नों से निर्मित है। मार्ग स्वर्णमय हैं। वृक्ष कल्पवृक्ष हैं जो भक्तों की हर इच्छा पूर्ण करते हैं। मंद-मंद सुगंधित वायु बहती रहती है। वहां की नदियां अमृत से भी अधिक दिव्य हैं। कहा जाता है कि पृथ्वी की सरयू केवल उसका प्रतिबिंब है, वास्तविक दिव्य सरयू साकेत लोक में प्रवाहित होती है। उसके जल का स्पर्श करते ही आत्मा की समस्त वासनाएं शांत हो जाती हैं। साकेत लोक के मध्य में स्थित है दिव्य राम दरबार। वह दृश्य इतना अद्भुत है कि देवता भी जिसके दर्शन के लिए लालायित रहते हैं। करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी सिंहासन पर श्री राम विराजमान हैं। उनके वाम भाग में सीता माता शोभायमान हैं। उनके मुख पर अनंत करुणा है। उनके नेत्रों में ऐसी शांति है जिसे देखकर आत्मा का हर दुःख समाप्त हो जाए। उनके चरणों में भक्त शिरोमणि हनुमान सदैव सेवा में लीन रहते हैं। हनुमान जी के लिए मोक्ष भी सेवा से छोटा है। वे आज भी वहीं बैठे अखंड रामनाम जपते रहते हैं। लक्ष्मण जी चंवर डुलाते हैं। भरत folded hands में खड़े रहते हैं। शत्रुघ्न सेवा व्यवस्था संभालते हैं। चारों दिशाओं में केवल एक ही ध्वनि गूंजती रहती है— “सीताराम… सीताराम… जय जय राम…” वहां कोई मृत्यु नहीं है। कोई बुढ़ापा नहीं है। कोई रोग नहीं है। कोई दुःख नहीं है। विष्णु पुराण का भावार्थ कहता है— “जहां न शोक है, न मोह, न जरा और न मृत्यु।” वहां समय भी स्थिर हो जाता है। पृथ्वी पर सब कुछ समय के अधीन है। यहां जन्म है, वृद्धावस्था है और मृत्यु है। परंतु साकेत में केवल नित्य वर्तमान है। वहां श्रीराम सदैव युवा हैं। माता सीता सदैव तेजस्विनी हैं। वहां कोई बिछड़ता नहीं। कोई रोता नहीं। क्योंकि वहां वियोग का अस्तित्व ही नहीं। कहा जाता है कि जब प्रभु श्रीराम सरयू में प्रविष्ट हुए, तब उनके पीछे-पीछे असंख्य अयोध्यावासी भी जल में उतर गए। केवल मनुष्य ही नहीं, वानर, भालू, पशु-पक्षी, यहां तक कि कुछ वृक्षों की आत्माएं भी प्रभु के पीछे चली गईं। क्योंकि वे अपने राम के बिना रहना नहीं चाहते थे। और प्रभु ने उन सभी को अपने धाम में स्थान दिया। यही श्रीराम का प्रेम है। वे केवल महान योगियों को नहीं अपनाते। वे प्रेम करने वालों को अपनाते हैं। शबरी के पास ज्ञान नहीं था, पर प्रेम था। निषादराज के पास वैभव नहीं था, पर प्रेम था। हनुमान जी के पास केवल भक्ति थी। और यही भक्ति साकेत का द्वार खोलती है। रामचरितमानस में तुलसीदास जी कहते हैं— “कलियुग केवल नाम अधारा।” अर्थात कलियुग में केवल राम नाम ही आधार है। शास्त्रों में साकेत लोक की प्राप्ति के तीन प्रमुख मार्ग बताए गए हैं— राम नाम, शरणागति और निष्काम भक्ति। जब कोई भक्त प्रेमपूर्वक “राम” नाम का जप करता है, तब उसकी चेतना धीरे-धीरे शुद्ध होने लगती है। भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि एक “राम” नाम हजार विष्णु नामों के समान फल देता है। दूसरा मार्ग है शरणागति। अर्थात स्वयं को पूर्णतः प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना। जैसे विभीषण ने सब कुछ छोड़कर केवल श्रीराम की शरण ली और प्रभु ने उन्हें तुरंत अपना लिया। तीसरा मार्ग है निष्काम भक्ति— कथा श्रवण, सेवा, गुणगान, ध्यान और करुणा। यही साधन आत्मा को धीरे-धीरे साकेत की ओर ले जाते हैं। संत कहते हैं कि साकेत केवल मृत्यु के बाद मिलने वाला धाम नहीं है। जब किसी मनुष्य के भीतर से अहंकार समाप्त हो जाता है, जब उसके हृदय में करुणा जाग जाती है, जब उसे हर जीव में श्रीराम दिखाई देने लगते हैं, तभी उसके भीतर साकेत का द्वार खुलने लगता है। क्योंकि साकेत कोई स्थान मात्र नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था है जहां आत्मा पूर्ण रूप से श्रीराम में विलीन हो जाती है। आज भी जब कोई भक्त सच्चे मन से “सीताराम” का स्मरण करता है, तब उसकी पुकार सबसे पहले उस दिव्य क्षेत्र में पहुंचती है जहां हनुमान अखंड रामनाम जप रहे हैं, और फिर वे स्वयं उसे प्रभु श्रीराम तक पहुंचाते हैं। यही कारण है कि करोड़ों भक्त आज भी मानते हैं कि भगवान श्रीराम कहीं गए नहीं हैं। वे आज भी साकेत लोक में अपने भक्तों के साथ विराजमान हैं। सरयू की लहरों में, अयोध्या की हवाओं में, रामनाम की ध्वनि में और हर उस हृदय में जहां प्रेम जीवित है। साकेत लोक केवल एक दिव्य धाम नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम की अनंत करुणा, कृपा और भक्तों के प्रति उनके शाश्वत प्रेम का जीवंत प्रमाण है।
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