नारद
अनंत आकाश के पार… जहां नक्षत्र जन्म लेते हैं और विलीन हो जाते हैं… वहां एक ऐसी शक्ति जाग चुकी थी जिसे स्वयं देवता भी नहीं पहचान पाए थे। स्वर्गलोक में इंद्र सभा सजी हुई थी। देवगण अपने-अपने कार्यों में व्यस्त थे। पृथ्वी लोक पर ऋषि तप में लीन थे। पाताल लोक में नागराज ध्यान कर रहे थे। सब कुछ सामान्य था। तभी… पूरा ब्रह्मांड एक सूक्ष्म कंपन से हिल उठा। पहले वह कंपन इतना हल्का था कि किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन कुछ ही क्षणों में वह कंपन बढ़ने लगा। जैसे किसी अदृश्य हाथ ने स्वयं समय की धड़कन को छू लिया हो। आकाश के रंग बदलने लगे। दिशाएं मौन हो गईं। और तभी हर लोक में एक साथ एक ही ध्वनि गूंजी… “नारायण… नारायण…” यह ध्वनि किसी एक स्थान से नहीं आई थी। वह हर दिशा से एक साथ सुनाई दे रही थी। देवता चौंक गए। ऋषियों ने नेत्र खोले। और उसी क्षण… अनंत ब्रह्मांडों में उपस्थित हर एक नारद मुनि अचानक रुक गए। उनकी वीणा की ध्वनि थम गई। उनकी दृष्टि आकाश की ओर उठी। क्योंकि आकाश में अब एक विशाल दिव्य द्वार खुल चुका था। वह द्वार साधारण नहीं था। उसके चारों ओर नीली, स्वर्णिम और बैंगनी ऊर्जा घूम रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे हजारों आकाशगंगाएं एक ही बिंदु में समा गई हों। नारद समझ गए… यह किसी लोक का द्वार नहीं था। यह ब्रह्मांडों को जोड़ने वाला मार्ग था। सबसे पहले एक नारद उस द्वार की ओर बढ़े। फिर दूसरे। फिर तीसरे। और कुछ ही क्षणों में… सैकड़ों नारद मुनि उस दिव्य स्थान पर एकत्र हो चुके थे। हर एक के हाथ में वीणा थी। हर एक के मुख पर “नारायण नारायण” का उच्चारण। लेकिन फिर भी… सब अलग थे। किसी का तेज सूर्य जैसा था। किसी का स्वर अत्यंत गंभीर। किसी की आंखों में हजारों वर्षों का ज्ञान था। कुछ युवा दिखते थे। कुछ इतने प्राचीन कि जैसे स्वयं युगों के साक्षी हों। वे एक-दूसरे को देखकर स्तब्ध थे। एक नारद बोले— “यह कैसे संभव है? मैं तो एकमात्र नारद हूं।” दूसरे ने कहा— “नहीं… मैं भी नारद हूं।” तभी एक अत्यंत शांत स्वर गूंजा। “तुम सब अलग नहीं हो…” सभी ने पीछे देखा। एक दिव्य नारद आगे बढ़ रहे थे। उनकी आभा बाकी सब से भिन्न थी। उन्होंने कहा— “तुम सब एक ही चेतना के विभिन्न रूप हो।” सन्नाटा छा गया। “तुम अलग-अलग ब्रह्मांडों से नहीं… अलग-अलग समयों से आए हो।” यह सुनते ही सभी स्तब्ध रह गए। भूतकाल के नारद… वर्तमान के नारद… और भविष्य के नारद… सब एक ही स्थान पर खड़े थे। जैसे ही यह सत्य प्रकट हुआ… पूरा क्षेत्र कांप उठा। समय की रेखाएं टूटने लगीं। कुछ नारदों को अपने सामने अपने ही अतीत के दृश्य दिखाई देने लगे। कुछ को भविष्य। एक भविष्य के नारद बोले— “यह मिलन विनाश ला सकता है। यदि समय के अनेक रूप एक साथ उपस्थित रहे… तो समय स्वयं टूट जाएगा।” तभी— एक विचित्र घटना हुई। सभी नारदों की वीणा से दिव्य ध्वनि निकल रही थी। परंतु… एक वीणा की ध्वनि अलग थी। उसमें करुणा नहीं थी। उसमें भक्ति नहीं थी। उसमें एक अजीब अंधकार था। सभी की दृष्टि उसी नारद पर टिक गई। “तुम कौन हो?” वह मुस्कुराया। और अचानक उसका स्वरूप बदलने लगा। उसका शरीर काले धुएं में बदल गया। उसकी आंखें अग्नि जैसी चमक उठीं। वह बोला— “मैं वह हूं जो समय को नियंत्रित करना चाहता है। मैंने तुम सबको यहां बुलाया है। क्योंकि जब समय के सभी रूप एक स्थान पर होंगे… तब ब्रह्मांडों का संतुलन टूट जाएगा।” वह शक्ति अब अपने वास्तविक रूप में थी। न देवता। न असुर। न ऋषि। वह कुछ और ही था। एक ऐसी सत्ता जो समय के बाहर जन्मी थी। उसने कहा— “मैंने अनगिनत युगों तक प्रतीक्षा की है। मैंने देखा है कि कैसे समय हर बार स्वयं को दोहराता है। सत्ययुग… त्रेता… द्वापर… कलयुग… हर बार वही कहानी। अब मैं इस चक्र को तोड़ूंगा।” इतना कहकर उसने अपनी शक्ति फैलानी शुरू की। समय कांप उठा। कुछ नारद वृद्ध होने लगे। कुछ बालक बन गए। कुछ अचानक अदृश्य हो गए। भविष्य वाला नारद चिल्लाया— “यदि यह शक्ति सफल हो गई… तो सभी ब्रह्मांड एक-दूसरे से टकरा जाएंगे।” तभी— सैकड़ों वीणाओं की ध्वनि एक साथ गूंज उठी। “नारायण… नारायण…” दिव्य प्रकाश फैल गया। ऊर्जा की तरंगें टकराईं। और फिर— सब कुछ श्वेत प्रकाश में डूब गया। जब प्रकाश समाप्त हुआ… तो वहां केवल एक नारद खड़े थे। बाकी सब गायब हो चुके थे। लेकिन… यह वही नारद नहीं थे जिन्हें सब जानते थे। उनकी आंखों में समय से भी गहरा रहस्य था। उन्होंने कहा— “तुम समय में यात्रा करते हो… परंतु तुम यह नहीं जानते कि समय स्वयं कैसे चलता है।” सभी मौन थे। उन्होंने अपनी वीणा बजाई। और अचानक सबके सामने एक अद्भुत दृश्य प्रकट हुआ। समय एक नदी नहीं था। वह अनगिनत प्रकाश रेखाओं का जाल था। हर ब्रह्मांड उस जाल की एक शाखा। हर जीव उसका एक बिंदु। उन्होंने कहा— “जब कोई चेतना अत्यंत शुद्ध हो जाती है… तब वह समय की सीमाओं से बाहर जा सकती है। यही कारण है कि नारद हर युग में उपस्थित रहते हैं।” नारद ध्यान में बैठ गए। उनकी वीणा की ध्वनि धीरे-धीरे पूरे शून्य में फैलने लगी। फिर… उनका शरीर स्थिर हो गया। लेकिन उनकी चेतना ऊपर उठने लगी। उनके सामने प्रकाश का एक द्वार बना। वह कालद्वार था। उन्होंने कहा— “यह यात्रा शरीर की नहीं… चेतना की है। मैं भूतकाल देख सकता हूं। भविष्य देख सकता हूं। परंतु एक नियम है… समय को पूरी तरह बदला नहीं जा सकता।” एक युवा नारद ने पूछा— “अगर कोई यह नियम तोड़ दे तो?” सन्नाटा छा गया। और तभी— पूरा ब्रह्मांड अचानक रुक गया। हवा रुक गई। जल स्थिर हो गया। देवता वहीं जम गए। पक्षी आकाश में थम गए। समय ने सांस लेना बंद कर दिया था। लेकिन… एक व्यक्ति अभी भी चल रहा था। देवर्षि नारद। उन्होंने वीणा बजाई। पर ध्वनि आगे नहीं बढ़ी। तभी उनके सामने एक दरार प्रकट हुई। जैसे समय का पर्दा फट गया हो। उस दरार के भीतर अलग-अलग युग दिखाई दे रहे थे। कहीं महाभारत चल रहा था। कहीं रामायण। कहीं भविष्य की विचित्र सभ्यताएं। नारद उस दरार में प्रवेश कर गए। और वहां… समय था ही नहीं। वह स्थान अद्भुत था। न दिन। न रात। न अतीत। न भविष्य। केवल अस्तित्व। तभी एक आवाज गूंजी— “नारद… तुम समय के बाहर खड़े हो। यहां से सभी ब्रह्मांड दिखाई देते हैं। और यदि समय का जाल टूट गया… तो सभी वास्तविकताएं एक-दूसरे में मिल जाएंगी।” नारद ने पूछा “कौन हो तुम?” उत्तर आया— “मैं काल का साक्षी हूं। मैं वह हूं जो हर युग के अंत को देखता है।” तभी नारद ने देखा… अनगिनत ब्रह्मांड धीरे-धीरे एक-दूसरे की ओर खिंच रहे थे। समय के रहस्य को जानने के बाद भी… नारद के भीतर एक प्रश्न शेष था। क्या कोई माया से परे जा सकता है? वह वैकुण्ठ पहुंचे। भगवान विष्णु मुस्कुराए। “क्या बात है नारद?” नारद बोले “प्रभु, क्या कोई आपकी माया को जीत सकता है?” भगवान विष्णु ने कहा— “पहले मेरे लिए जल ले आओ।” नारद पृथ्वी पर आए। वहां उन्होंने एक अत्यंत सुंदर स्त्री को देखा। और उसी क्षण… सब बदल गया। उन्होंने विवाह किया। संतान हुई। वर्ष बीत गए। एक सुखी जीवन। लेकिन फिर… भीषण बाढ़ आई। सब कुछ बह गया। उनका परिवार… उनका घर… उनकी दुनिया… नारद टूट गए। और तभी— सब गायब हो गया। वह फिर उसी स्थान पर खड़े थे। भगवान विष्णु मुस्कुरा रहे थे। “नारद… जल कहां है?” नारद स्तब्ध रह गए। उनके लिए पूरी जिंदगी बीत चुकी थी। पर वास्तव में केवल कुछ क्षण बीते थे।
भगवान विष्णु बोले— “समय वही नहीं जो तुम देखते हो। समय चेतना के अनुसार बदलता है।” फिर उन्होंने नारद को महायुगों का दर्शन कराया। सत्ययुग ➔ त्रेतायुग ➔ द्वापरयुग ➔ कलियुग। सत्ययुग… त्रेतायुग… द्वापर… कलियुग… फिर पुनः वही चक्र। भगवान बोले— “सृष्टि का अंत भी आरंभ है। और आरंभ भी अंत।” नारद ने देखा— अनंत ब्रह्मांड महाविष्णु के भीतर समा रहे थे। फिर उन्हीं से जन्म ले रहे थे। अब नारद सब समझ चुके थे। समय… माया… ब्रह्मांड… सब एक ही चेतना के रूप थे। लेकिन तभी उन्हें एक अंतिम रहस्य ज्ञात हुआ। वह अज्ञात शक्ति अभी नष्ट नहीं हुई थी। वह समय के बाहर छिपी हुई थी। और वह प्रतीक्षा कर रही थी… उस क्षण की… जब फिर से सभी ब्रह्मांडों के नारद एक साथ मिलेंगे। तभी— दूर शून्य में फिर वही ध्वनि गूंजी… “नारायण… नारायण…” और कथा यहीं समाप्त नहीं होती… क्योंकि समय का चक्र अभी भी चल रहा है।
हर हर महादेव। जय श्री हरि विष्णु।
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