वेदवती

त्रेतायुग के उस रहस्यमयी काल में जब पृथ्वी पर धर्म और अधर्म के मध्य संघर्ष धीरे-धीरे प्रबल होता जा रहा था, समुद्र की अथाह लहरों के मध्य एक ऐसी नगरी स्थित थी जिसकी चमक देवताओं की अमरावती को भी चुनौती देती थी। वह नगरी थी स्वर्णमयी लंका। उसके राजमहल स्वर्ण से निर्मित थे, राजपथ रत्नों से जड़े हुए थे और उसकी ऊँची प्राचीरें सूर्य के प्रकाश में इस प्रकार चमकती थीं मानो पृथ्वी पर दूसरा सूर्य उदित हो गया हो। उस स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान था एक ऐसा सम्राट जिसकी शक्ति का डंका तीनों लोकों में बजता था— दशग्रीव रावण। रावण केवल एक राजा नहीं था। वह एक असाधारण व्यक्तित्व था। वेदों का ज्ञाता, ज्योतिष का आचार्य, संगीत का महान विद्वान, रणभूमि का अद्वितीय योद्धा और भगवान शिव का अनन्य भक्त। उसके द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्र तक देवताओं को विस्मित कर देता था। कहा जाता है कि जब वह वीणा बजाता था, तब स्वयं प्रकृति कुछ क्षणों के लिए मौन हो जाती थी। लेकिन ज्ञान और शक्ति जब विनम्रता से अलग हो जाएँ, तब वही गुण विनाश की जड़ बन जाते हैं। रावण ने अपनी युवावस्था से ही असाधारण तप किया था। उसने वर्षों तक कैलाश पर्वत पर कठोर तपस्या की। उसने अपने एक-एक मस्तक को अग्नि में समर्पित कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। अंततः उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। महादेव ने उसे चंद्रहास नामक दिव्य खड्ग प्रदान किया और कहा— “हे दशग्रीव, यह अस्त्र तुम्हारी शक्ति का प्रतीक होगा। किंतु स्मरण रखना, शक्ति का उपयोग यदि धर्म से हटकर हुआ, तो यही तुम्हारे पतन का कारण बनेगी।” उस समय रावण ने विनम्र होकर सिर झुका दिया। किंतु समय के साथ वही विनम्रता अहंकार में बदलने लगी। दिव्य चंद्रहास प्राप्त करने के बाद रावण ने अपनी दिग्विजय आरंभ की। उसका पुष्पक विमान आकाश को चीरता हुआ एक-एक राज्य पर उतरता और राजा बिना युद्ध किए ही उसके चरणों में झुक जाते। यक्ष, गंधर्व, किन्नर और अनेक दानव उसकी अधीनता स्वीकार करने लगे। धीरे-धीरे उसका अभिमान इतना बढ़ गया कि उसने स्वयं को देवताओं से भी श्रेष्ठ समझना प्रारंभ कर दिया। स्वर्ण लंका में प्रतिदिन उत्सव होते थे। मदिरा की धाराएँ बहती थीं। नृत्यांगनाएँ राजसभा में नृत्य करती थीं। राक्षस सेना विजय के गीत गाती थी। किन्तु उसी वैभव के भीतर एक ऐसा अंधकार जन्म ले चुका था जो आने वाले समय में सम्पूर्ण लंका को निगलने वाला था।



एक दिन अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान रावण का पुष्पक विमान आकाश मार्ग से उत्तर दिशा की ओर बढ़ रहा था। अनेक पर्वतों और नदियों को पार करने के बाद वह एक अद्भुत नगरी के ऊपर पहुँचा। वह नगरी थी मायापुरी। यह नगरी दानवों के महान वास्तुकार मय दानव द्वारा निर्मित थी। वहाँ के महल ऐसे प्रतीत होते थे मानो स्वप्नों को पत्थरों में तराश दिया गया हो। भवनों की दीवारों में जड़े रत्न रात्रि में स्वयं प्रकाश उत्पन्न करते थे। जलप्रपातों के भीतर छिपे मार्ग और आकाश में तैरते महल उसकी अद्भुत वास्तुकला का प्रमाण थे। जब मय दानव को ज्ञात हुआ कि लंकाधिपति स्वयं उनकी नगरी में पधारे हैं, तब वे राजद्वार तक उनका स्वागत करने पहुँचे। मय दानव ने रावण का तेज देखा। उसके मुख पर विद्वता का तेज था, किंतु आँखों में अभिमान की ज्वाला भी स्पष्ट दिखाई देती थी। राजसभा में प्रवेश करते ही रावण की दृष्टि एक युवती पर पड़ी। वह थीं मंदोदरी। उनका सौंदर्य चंद्रमा के समान शांत और दिव्य था। उनकी आँखों में करुणा थी, वाणी में मधुरता और व्यक्तित्व में अद्भुत मर्यादा। रावण कुछ क्षणों तक उन्हें देखता रह गया। मंदोदरी केवल रूपवती नहीं थीं। वे राजनीति, धर्म और नीति की भी ज्ञाता थीं। उन्हें ज्ञात था कि शक्ति तभी तक महान है जब तक वह मर्यादा में बंधी रहे। मय दानव ने मन ही मन निश्चय किया कि यदि उनकी पुत्री का विवाह किसी योग्य पुरुष से हो सकता है, तो वह केवल रावण ही है। कुछ समय बाद वैदिक मंत्रों, अग्नि और देवताओं की साक्षी में रावण और मंदोदरी का विवाह सम्पन्न हुआ। पूरी लंका दीपों से जगमगा उठी। समुद्र की लहरें तक मानो उत्सव मना रही थीं। किन्तु मंदोदरी के मन में कहीं एक अनजाना भय था। उन्हें ऐसा प्रतीत होता था कि रावण की शक्ति जितनी विशाल है, उसका अहंकार उससे भी अधिक विशाल होता जा रहा है। विवाह के कुछ समय बाद मंदोदरी गर्भवती हुईं। यह समाचार सुनकर रावण अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसे विश्वास था कि उसका पुत्र उससे भी अधिक शक्तिशाली होगा। रावण ज्योतिष और तंत्र विद्या का महान ज्ञाता था। उसने गणना की कि यदि जन्म के समय ग्रह विशेष स्थिति में हों, तो बालक अजेय बन सकता है। उसने अपने दूतों को आदेश दिया— “नवग्रहों को तत्काल राजसभा में उपस्थित किया जाए।” कुछ ही समय में ग्रह देवता उसके सामने उपस्थित हुए। रावण ने गर्व से कहा— “मेरे पुत्र के जन्म के समय तुम सभी लाभ भाव में स्थित रहोगे। मैं चाहता हूँ कि मेरा पुत्र तीनों लोकों में अजेय हो।” उसके तप और शक्ति के भय से ग्रह मौन रहे। किन्तु शनिदेव शांत भाव से रावण को देखते रहे। समय बीता। जन्म का क्षण निकट आया। उसी अंतिम क्षण शनिदेव ने सूक्ष्म रूप से अपनी स्थिति बदल ली। और उसी क्षण मंदोदरी ने एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया। जन्म लेते ही बालक ने ऐसी गर्जना की कि स्वर्ण लंका काँप उठी। राजमहल के स्तंभ हिल गए। समुद्र की लहरें उग्र हो उठीं। रावण हर्ष से भर उठा। “इसकी गर्जना मेघों के समान है। इसका नाम मेघनाद होगा।” किन्तु जब उसने ग्रहों की स्थिति देखी, उसका चेहरा क्रोध से विकृत हो उठा। उसने शनिदेव को अपमानित किया और उन्हें बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। शनिदेव मौन रहे। उनकी दृष्टि मानो यह कह रही थी— “समय सबसे बड़ा सम्राट है, रावण।” अगर वीडियो पसंद आ रहा है तो इसे लाइक कीजिए और चैनल पर नए हैं तो सबस्क्राइब कीजिए तथा अपने मित्रों रिश्तेदारों के पास शेयर कीजिए।



मेघनाद बड़ा होकर असाधारण योद्धा बना। उसने शस्त्र विद्या के साथ-साथ मायावी युद्धकला भी सीखी। वह आकाश में अदृश्य होकर युद्ध कर सकता था। उसके बाण अग्नि और सर्पों के समान शत्रुओं पर टूट पड़ते थे। रावण अपने पुत्र पर अत्यंत गर्व करता था। एक समय देवताओं और राक्षसों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ा। उस युद्ध में मेघनाद ने ऐसा प्रचंड पराक्रम दिखाया कि देवराज इंद्र तक परास्त हो गए। देवलोक में भय फैल गया। तब ब्रह्मा प्रकट हुए और बोले— “आज से यह केवल मेघनाद नहीं रहेगा। इसने इंद्र को जीत लिया है। अतः इसका नाम इंद्रजीत होगा।” पूरी लंका विजय उत्सव में डूब गई। रावण ने उसी दिन घोषणा की— “अब देवताओं का युग समाप्त हो चुका है।” लेकिन उसी क्षण नियति मुस्करा रही थी। क्योंकि हर अत्याचार अपने साथ विनाश का बीज लेकर आता है। अलकापुरी में कुबेर के पुत्र नलकुबेर निवास करते थे। स्वर्ग की अप्सरा रंभा उनसे प्रेम करती थीं। एक दिन रंभा दिव्य आभूषणों से सुसज्जित होकर नलकुबेर से मिलने जा रही थीं। मार्ग में रावण की दृष्टि उन पर पड़ी। उनकी सुंदरता देखकर उसका मन कामवासना से भर उठा। रंभा भयभीत हो गईं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा— “हे लंकेश, मैं आपके भ्राता कुबेर के पुत्र नलकुबेर की प्रिय हूँ। इस संबंध से मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूँ।” किन्तु रावण का विवेक नष्ट हो चुका था। उसने उनकी प्रार्थना अनसुनी कर दी। अपमानित रंभा विलाप करती हुई नलकुबेर के पास पहुँचीं। संपूर्ण घटना सुनकर नलकुबेर का क्रोध प्रज्वलित हो उठा। उन्होंने जल उठाकर श्राप दिया— “यदि रावण किसी भी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श करेगा, तो उसी क्षण उसका विनाश हो जाएगा।” यह श्राप दिशाओं में गूँज उठा। उसी दिन से रावण के जीवन में विनाश का दूसरा द्वार खुल चुका था। हिमालय के घने वनों में एक दिव्य तपस्विनी तप कर रही थीं। उनका नाम था वेदवती। वे बचपन से ही भगवान विष्णु को अपना पति मान चुकी थीं। वर्षों की तपस्या के बाद एक दिन भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए। उन्होंने कहा— “अगले अवतार में मैं तुम्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करूँगा।” वेदवती आनंद से भर उठीं। किन्तु उसी समय रावण वहाँ पहुँच गया। उसने वेदवती को देखा और उनके सौंदर्य पर मोहित हो गया। जब वेदवती ने विष्णु को अपना आराध्य बताया, रावण क्रोधित हो उठा। “त्रैलोक्य का स्वामी मैं हूँ। विष्णु नहीं।” यह कहकर उसने उनके केश पकड़ लिए। क्षणभर में वेदवती की आँखों में अग्नि प्रकट हुई। उन्होंने अपने केश काट डाले और कहा— “हे अधर्मी! मैं पुनर्जन्म लेकर तेरे सर्वनाश का कारण बनूँगी।” यह कहकर वे अग्नि में समा गईं। वन में केवल उनकी प्रतिज्ञा गूँजती रही— “मैं लौटूँगी…”


काल का चक्र अपनी गति से घूमता रहा। कई शताब्दियाँ बीत गईं। एक ओर लंका में रावण का अत्याचार और अहंकार अपने चरम पर पहुँच चुका था, तो दूसरी ओर पृथ्वी पर धर्म की रक्षा के लिए देवताओं की प्रार्थनाएँ तेज हो गई थीं। अयोध्या के सूर्यवंशी राजा दशरथ के घर भगवान विष्णु ने अपने अवतार श्रीराम के रूप में जन्म लिया। उसी समय, विदेहराज जनक की नगरी मिथिला में एक अद्भुत घटना घटी। राज्य में पड़े भयंकर अकाल को दूर करने के लिए जब राजर्षि जनक ने स्वयं स्वर्ण का हल चलाया, तो भूमि के भीतर से एक कलश प्राप्त हुआ। उस कलश में एक अत्यंत कुशाग्र और दिव्य कन्या थी। उस कन्या का नाम रखा गया— सीता। मान्यता है कि हिमालय के वनों में रावण के विनाश की प्रतिज्ञा लेकर अग्नि में भस्म होने वाली तपस्विनी वेदवती ने ही अपने संकल्प को पूरा करने के लिए सीता के रूप में पुनर्जन्म लिया था। प्रकृति ने रावण के अंत की पटकथा लिख दी थी। एक ओर मर्यादा पुरुषोत्तम राम थे, तो दूसरी ओर शक्ति स्वरूपा सीता, जिनके कारण भविष्य में स्वर्ण लंका की नींव हिलने वाली थी। नियति अब अपने अंतिम अध्याय की ओर बड़ी शांति से कदम बढ़ा रही थी। रावण का साम्राज्य अब इतना विशाल हो चुका था कि उसे लगता था मानो वह काल को भी जीत चुका है। उसके पुष्पक विमान की एक झलक मात्र से धरती के राजा अपने शस्त्र डाल देते थे। लंका स्वर्ण और मणियों से अटी पड़ी थी, लेकिन उस चकाचौंध में रावण यह भूल गया था कि उसके जीवन में विनाश के तीन बीज पहले ही बोए जा चुके थे— शनिदेव का मौन न्याय, नलकुबेर का वह श्राप जो उसे स्त्रियों की इच्छा के विरुद्ध जाने से रोकता था, और वेदवती का वह अटल संकल्प जो अब सीता के रूप में आकार ले चुका था। उसे अपनी अजेय शक्ति पर अंधा विश्वास था। उसे लगता था कि शिव का खड्ग 'चंद्रहास' और ब्रह्मा का वरदान उसे अमर बना चुके हैं। किंतु प्रकृति का यह नियम है कि जब अधर्म अपनी सभी सीमाएँ लाँघ देता है, तब सत्य और धर्म स्वयं अस्त्र उठाकर धरती पर उतरते हैं। और अब वह समय अत्यंत निकट आ चुका था। दंडकारण्य में श्रीराम का वनवास, शूर्पणखा का अपमान, स्वर्ण मृग का छल और अंततः सीता का हरण... ये सभी घटनाएँ उसी महायुद्ध की भूमिका बनने वाली थीं जिसने त्रिलोक के सबसे शक्तिशाली और विद्वान सम्राट दशानन रावण के अहंकार को लंका की राख में मिला दिया। शक्ति जब मर्यादा का त्याग करती है, तो वह केवल अपना नहीं, बल्कि पूरे कुल का विनाश लेकर आती है। यह महागाथा इसी शाश्वत सत्य का सबसे बड़ा प्रमाण है।

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