असली लंका कहां है ?
हजारों वर्षों से एक सवाल भारतीय इतिहास, पुराण और ज्योतिष के सबसे रहस्यमय अध्यायों में छिपा हुआ है। एक ऐसा सवाल, जिस पर हम आंख मूंदकर विश्वास तो कर लेते हैं, लेकिन जब विज्ञान और प्राचीन ग्रंथों की कसौटी पर उसे कसते हैं, तो हमारे सारे भ्रम टूट जाते हैं।
वह सवाल है—रावण की लंका आखिर थी कहां?
हम सभी बचपन से सुनते आए हैं कि रावण की स्वर्ण नगरी वही थी जिसे आज हम ‘श्रीलंका’ कहते हैं। भारत के दक्षिण में स्थित वह द्वीप… रामसेतु के पास… और रामायण की कथा से जुड़ा हुआ स्थान। लेकिन मेरे दोस्त, क्या सच वास्तव में इतना सरल है?
आज हम "अध्यात्म गुरु की दुनिया" में इतिहास की वह परतें खोलेंगे जो शायद आपको किसी स्कूल या किताब में नहीं पढ़ाई गईं। जब प्राचीन भारतीय ज्योतिष ग्रंथ, भूगर्भीय प्रमाण, समुद्री मानचित्र और प्राचीन साहित्य को एक साथ रखा जाता है, तो एक बिल्कुल अलग तस्वीर उभरती है। एक ऐसी तस्वीर जो बताती है कि शायद रावण की असली लंका आज आधुनिक श्रीलंका नहीं, बल्कि समुद्र के नीचे दबी हुई कोई विशाल सभ्यता है।
तैयार हो जाइए एक ऐसे सफर के लिए, जो खगोल विज्ञान, भूगोल और इतिहास के पन्नों से होकर गुजरेगा।
आज हम जिस देश को श्रीलंका कहते हैं, क्या वह हमेशा से श्रीलंका था? मेरे दोस्त, अगर आप इतिहास के पन्ने पलटें, तो आपको जानकर हैरानी होगी कि 1972 से पहले इस देश का आधिकारिक नाम "श्रीलंका" था ही नहीं।
यूरोपियन और ब्रिटिश मानचित्रों में इसे "सीलोन" कहा जाता था। अरब के व्यापारी इसे "सेरेनडिप" कहते थे। और हमारे अपने प्राचीन भारतीय ग्रंथों, यहां तक कि सम्राट अशोक के शिलालेखों में भी, इस द्वीप को "ताम्रपर्णी" या "सिंहल द्वीप" कहा गया है। साल 1972 में सीलोन सरकार ने आधिकारिक रूप से अपने देश का नाम बदलकर "श्रीलंका" रख लिया।
लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अगर यह रावण वाली लंका थी, तो सदियों तक हमारे ही ऋषियों, मुनियों और राजाओं ने इसे 'सिंहल' क्यों कहा? इस सवाल का जवाब हमें विज्ञान और खगोल शास्त्र में मिलता है।
सबसे पहले समझते हैं कि प्राचीन भारतीय ग्रंथ वास्तव में क्या कहते हैं।
सूर्य सिद्धांत, आर्यभटीय, भास्कराचार्य का सिद्धान्त शिरोमणि और लघु भास्करीय जैसे महान ज्योतिष ग्रंथों में “लंका” का उल्लेख बार-बार आता है। लेकिन यहां लंका को केवल एक राज्य या साम्राज्य की तरह नहीं बताया गया। उसे एक एस्ट्रोनॉमिकल रेफरेंस पॉइंट के रूप में इस्तेमाल किया गया है।
प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्री पृथ्वी की गणनाओं के लिए एक मुख्य मेरिडियन का प्रयोग करते थे। ठीक वैसे ही जैसे आज आधुनिक दुनिया इंग्लैंड के 'ग्रीनविच मेरिडियन' का उपयोग करती है, हजारों साल पहले भारत का अपना एक प्राइम मेरिडियन था।
इन ग्रंथों के अनुसार वह प्राचीन मेरिडियन तीन महत्वपूर्ण स्थानों से होकर गुजरता था—उत्तर में कुरुक्षेत्र, मध्य भारत में उज्जैन और दक्षिण में लंका।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन ग्रंथों में लंका को 0° अक्षांश और 0° देशांतर पर बताया गया है। अर्थात… ठीक भूमध्य रेखा पर।
सूर्य सिद्धांत में इसके लिए “निरक्ष” शब्द का प्रयोग मिलता है। जिसका अर्थ है—जहां कोई लैटीट्यूड नहीं है, जहां दिन और रात हमेशा बराबर होते हैं। यानी लंका सिर्फ दक्षिण दिशा में स्थित कोई द्वीप नहीं थी, वह पृथ्वी की भूमध्य रेखा पर स्थित एक विशेष बिंदु थी।
अब यहां सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है मेरे दोस्त। आज का श्रीलंका इक्वेटर पर नहीं है! वह भूमध्य रेखा से सैकड़ों किलोमीटर उत्तर में स्थित है। इतना ही नहीं, वह उज्जैन वाली उस प्राचीन मेरिडियन लाइन पर भी नहीं पड़ता। अगर आप उज्जैन से सीधी रेखा दक्षिण की ओर खींचते हैं, तो वह मालदीव के आस-पास भूमध्य रेखा को काटती है, आधुनिक श्रीलंका तक तो वह पहुंचती ही नहीं।
तो क्या आर्यभट्ट और वराहमिहिर जैसे महान वैज्ञानिक गलती कर रहे थे? नहीं। क्योंकि यही ग्रंथ ग्रहों की गति, ग्रहण और नक्षत्रों की जो गणनाएं बताते हैं, वे आज भी आश्चर्यजनक रूप से सटीक मानी जाती हैं।
अब हम चलते हैं सबसे बड़े प्रमाण की ओर—स्वयं महर्षि वाल्मीकि कृत 'रामायण'।
जब सीता माता की खोज के लिए सुग्रीव वानर सेनाओं को चार दिशाओं में भेजते हैं, तब वे दक्षिण दिशा में जाने वाले दल को अत्यंत विस्तृत भौगोलिक निर्देश देते हैं। सुग्रीव कहते हैं कि यात्रा दक्षिण भारत के पर्वतीय क्षेत्रों से होकर आगे बढ़ेगी। दल विंध्याचल पार करेगा, नर्मदा और गोदावरी नदियों को लांघेगा, मलय पर्वत को पार करेगा, फिर महेंद्र पर्वत तक पहुंचेगा… और उसके बाद समुद्र के ऊपर बहुत दूर तक जाना होगा।
रामायण में महेंद्र पर्वत से लंका की दूरी 100 योजन बताई गई है। अगर हम 1 योजन को न्यूनतम 8 से 12 किलोमीटर भी मानें, तो 100 योजन का अर्थ होता है कम से कम 800 से 1200 किलोमीटर। जबकि आज के भारत से आधुनिक श्रीलंका की दूरी बमुश्किल 30 किलोमीटर है! यह दूरी का अंतर एक बहुत बड़ा इशारा है।
और दिशा? दिशा सबसे महत्वपूर्ण है मेरे दोस्त। रामायण बार-बार लंका की दिशा “नैरृत्य” बताती है। नैरृत्य यानी दक्षिण-पश्चिम। रावण और उसके राज्य को कई स्थानों पर नैरृत्य कोण का स्वामी बताया गया है। लेकिन आधुनिक श्रीलंका भारत के ठीक दक्षिण-पूर्व में स्थित है… दक्षिण-पश्चिम में नहीं!
अगर मूल ग्रंथ किसी स्थान की दिशा और दूरी इतनी स्पष्ट रूप से बता रहे हों, और वास्तविक भौगोलिक स्थिति उससे बिल्कुल अलग हो, तो हमें रुककर सोचना होगा कि हम कहां गलती कर रहे हैं।
अब इस रहस्य में प्रवेश करता है एक तारा… अगस्त्य तारा। जिसे पश्चिमी खगोल विज्ञान में 'कैनोपस' कहा जाता है।
भारतीय परंपरा में अगस्त्य केवल एक तारा नहीं था, उसे दिशा निर्धारण और समुद्री यात्राओं का मार्गदर्शक माना जाता था। रामायण के किष्किंधा कांड में सुग्रीव दक्षिण दिशा में जाने वाले दल से कहते हैं कि वे अगस्त्य तारे को तभी स्पष्ट रूप से देख पाएंगे जब वे भारत के अंतिम दक्षिणी छोर तक पहुंचेंगे।
यह विवरण सुनने में सामान्य लग सकता है, लेकिन आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार इसमें एक अद्भुत और हैरान करने वाला संकेत छिपा है। पृथ्वी की धुरी समय के साथ धीरे-धीरे लट्टू की तरह घूमती और झुकती रहती है। विज्ञान की भाषा में इसे 'प्रिसेशन ऑफ द इक्विनॉक्स' कहा जाता है। इसी कारण हजारों वर्षों में आकाश के तारों की स्थिति पृथ्वी से देखने पर बदलती रहती है।
वैज्ञानिक गणना करते हैं, तो पता चलता है कि आज से लगभग 12,000 से 13,000 वर्ष पहले, अगस्त्य तारा दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के अत्यंत निकट दिखाई देता था। उस समय वह लगभग दक्षिण दिशा के 'पोल स्टार' जैसा प्रतीत होता था, जो नाविकों को दक्षिण दिशा का सटीक ज्ञान देता था। रामायण में अगस्त्य तारे का जो वर्णन मिलता है, वह आधुनिक आकाश से नहीं, बल्कि उसी 13,000 साल पुराने कालखंड के आकाश से मेल खाता है।
अगस्त्य तारे का 13,000 वर्ष पुराना संकेत हमें कहानी के सबसे रोमांचक मोड़ पर ले आता है। क्योंकि ठीक इसी समय, यानी आज से 13,000 से 14,000 वर्ष पहले, पृथ्वी पर एक बहुत बड़ा भौगोलिक परिवर्तन हो रहा था।
हमारी पृथ्वी का आखिरी हिमयुग समाप्त हो रहा था। उस समय उत्तर और दक्षिण ध्रुवों के विशाल ग्लेशियरों में दुनिया का बहुत सारा पानी जमा था। विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि उस समय समुद्र का स्तर आज की तुलना में लगभग 120 से 140 मीटर नीचे था!
ज़रा सोचिए मेरे दोस्त, इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि आज जो क्षेत्र समुद्र के नीचे डूबे हुए हैं, वे उस समय विशाल भूभाग हुआ करते थे। उस समय भारत और श्रीलंका के बीच कोई समुद्र नहीं था, वे पूरी तरह सूखी जमीन से जुड़े हुए थे।
लेकिन बात सिर्फ श्रीलंका की नहीं है। भारत के दक्षिण में, भूमध्य रेखा तक और उससे भी आगे, मालदीव से लेकर मेडागास्कर तक, समुद्र के भीतर बहुत दूर तक भूमि फैली हुई थी। तमिलनाडु के प्राचीन संगम साहित्य में एक विशाल महाद्वीप का जिक्र आता है, जिसे 'कुमारी कंदम' कहा गया है। कहा जाता है कि प्राचीन पांड्य राजाओं की राजधानी इसी कुमारी कंदम में थी, जिसे बाद में समुद्र ने निगल लिया।
क्या यह संभव नहीं कि रावण की वह त्रिकूट पर्वत पर बसी, विश्वकर्मा द्वारा बनाई गई स्वर्ण लंका, भारत के दक्षिण-पश्चिम में, भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर स्थित उसी विशाल भूभाग का हिस्सा थी? जैसे-जैसे हिमयुग खत्म हुआ, बर्फ पिघली, समुद्र का स्तर बढ़ा, और वह महान सभ्यता हमेशा-हमेशा के लिए हिंद महासागर की गहराइयों में जलमग्न हो गई।
अगर आपको अब भी लगता है कि यह सब सिर्फ थ्योरी है, तो आइए हमारे प्राचीन साहित्यकारों की बात सुनते हैं। मध्यकाल तक हमारे विद्वान अच्छी तरह जानते थे कि लंका और सिंहल दो अलग-अलग स्थान हैं।
श्रीमद्भागवत पुराण के पांचवें स्कंध में जम्बूद्वीप के द्वीपों का वर्णन करते हुए 'सिंहल' और 'लंका' दोनों का अलग-अलग नाम लिया गया है। महान खगोलशास्त्री वराहमिहिर ने अपनी 'बृहत्संहिता' में सिंहल को एक अलग देश और लंका को एक अलग क्षेत्र बताया है। नौवीं शताब्दी के प्रसिद्ध नाटककार मुरारी ने लिखा है कि भगवान राम जब लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद पुष्पक विमान से लौट रहे थे, तो वे आसमान से 'सिंहल द्वीप' को देखते हुए गुजरे थे। स्वयं बौद्ध ग्रंथ महावंश और दीपवंश, जो श्रीलंका के सबसे पुराने इतिहास ग्रंथ माने जाते हैं, कभी भी अपने देश को रावण की लंका नहीं कहते।
महाभारत के सभा पर्व में, जब सहदेव दक्षिण दिशा में दिग्विजय अभियान पर जाते हैं, तो वहां सिंहल द्वीप के राजाओं का वर्णन अलग आता है और विभीषण की लंका का अलग।
लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, असली लंका समुद्र में डूब चुकी थी। व्यापार और संपर्क टूटने लगे। उत्तर भारत के लोगों के लिए दक्षिण का वह द्वीप ही रामायण की लंका का प्रतीक बन गया। सदियों के बाद, लोग भूल गए कि असली लंका इक्वेटर पर पानी के नीचे सो रही है, और उन्होंने इसी द्वीप को लंका मान लिया।
तो मेरे दोस्त, इन सभी साक्ष्यों को एक साथ रखकर देखिए।
ज्योतिष ग्रंथ लंका को भूमध्य रेखा पर बताते हैं। वाल्मीकि रामायण लंका की दिशा भारत के दक्षिण-पश्चिम और दूरी 100 योजन बताती है। अगस्त्य तारे का खगोलीय प्रमाण हमें 13,000 साल पीछे ले जाता है। भूगर्भ शास्त्र साबित करता है कि 13,000 साल पहले समुद्र का जलस्तर 120 मीटर नीचे था और इक्वेटर के पास विशाल भूभाग मौजूद था। और हमारे खुद के प्राचीन ग्रंथ लंका और सिंहल को दो अलग देश मानते हैं।
इनमें से कोई भी तथ्य अकेले अंतिम प्रमाण नहीं है। लेकिन जब ये सभी विज्ञान—एस्ट्रोनॉमी, जियोलॉजी, जियोग्राफी और साहित्य—एक ही बिंदु की ओर इशारा करते हैं… तो यह एक साधारण इत्तेफाक नहीं हो सकता।
सच्चाई यह है कि रावण की असली स्वर्ण लंका आज के श्रीलंका में नहीं, बल्कि शायद हिंद महासागर की हजारों फीट गहरी खाइयों में, भूमध्य रेखा के पास कहीं दफन है। जिस तरह द्वारका नगरी समुद्र में मिली, हो सकता है आने वाले वर्षों में अंडरवॉटर आर्कियोलॉजी हमें रावण की उस महान वैज्ञानिक सभ्यता के अवशेष भी खोज कर दे दे।
लेकिन फिलहाल... इतना निश्चित है कि रावण की लंका का रहस्य उतना सरल नहीं है, जितना हमें सदियों से बताया जाता रहा है।
मेरे दोस्त, अगर प्राचीन भारत के विज्ञान और इतिहास की यह रहस्यपूर्ण यात्रा आपको भी रोमांचित लगी, अगर आपको लगा कि आज आपने कुछ ऐसा जाना जो आपकी सोच बदल सकता है... तो इस डॉक्यूमेंट्री को अपने मित्रों और परिवार के साथ जरूर शेयर करें। चैनल "अध्यात्म गुरु की दुनिया" को सब्सक्राइब करें और कमेंट्स में जय श्री राम जरूर लिखें।
क्योंकि इतिहास के सबसे बड़े रहस्य अक्सर वहीं छिपे होते हैं… जहां हम देखना ही बंद कर देते हैं।
मिलते हैं अगले एपिसोड में, एक नए रहस्य के साथ। तब तक के लिए, आपका दोस्त आपसे विदा लेता है।
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