जब महाविष्णु ही गायब हो गए।
सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक… एक सत्य कभी नहीं बदला था। जब-जब अधर्म बढ़ता… तब-तब भगवान विष्णु अवतार लेते। लेकिन उस दिन… पहली बार कुछ ऐसा हुआ… जिसकी कल्पना स्वयं ब्रह्मा ने भी नहीं की थी। आकाश के तारे एक-एक करके बुझने लगे। समय धीमा पड़ने लगा। देवलोक की सीढ़ियां टूटने लगीं। और अनगिनत ब्रह्मांडों के बीच बना संतुलन… अचानक डगमगाने लगा। उस क्षण… पूरा मल्टीवर्स कांप उठा। देवताओं ने देखा… अनंत आकाश के बीच स्थित विष्णु लोक… धीरे-धीरे अंधकार में डूब रहा था। शंख की ध्वनि बंद हो चुकी थी। सुदर्शन चक्र शांत था। और क्षीरसागर… पहली बार स्थिर पड़ा था। तभी एक आवाज गूंजी— “महाविष्णु… अब इस ब्रह्मांड में नहीं हैं…” यह सुनते ही स्वर्गलोक में भय फैल गया। इंद्र का वज्र हाथ से गिर पड़ा। वरुण का समुद्र उफान मारने लगा। यमराज ने पहली बार अपने सिंहासन से उठकर आकाश की ओर देखा। लेकिन सबसे भयानक दृश्य अभी बाकी था। हर ब्रह्मांड में मौजूद कल्कि अवतार… एक-एक करके समाप्त होने लगे। कोई अदृश्य शक्ति… उन्हें खोज रही थी। और जैसे ही कोई कल्कि अपनी दिव्य शक्ति प्रकट करता… वह मारा जाता। सिर्फ कुछ घंटों में… करोड़ों ब्रह्मांडों के सभी कल्कि अवतार समाप्त हो चुके थे। सिवाय… एक के। कैलाश पर्वत। बर्फीली हवाओं के बीच महादेव समाधि में बैठे थे। उनके चारों ओर शिवगण मौन खड़े थे। तभी आकाश से एक जली हुई आकृति नीचे गिरी। वह थे… कागभुशुण्डि। उनके पंख झुलस चुके थे। आंखों में भय था। और हाथ में एक टूटा हुआ दिव्य शंख। नारद तुरंत उनकी ओर दौड़े। “वत्स! यह क्या हुआ?” कागभुशुण्डि कांपती आवाज में बोले— “सब… समाप्त हो गया…” “सभी कल्कि… मारे जा चुके हैं…” पूरा कैलाश मौन हो गया। नारद अविश्वास में बोले— “असंभव!” “कल्कि को कोई कैसे मार सकता है?” तभी… महादेव ने अपनी आंखें खोलीं। उनकी आंखों में पहली बार चिंता दिखाई दी। उन्होंने कहा— “क्योंकि यह युद्ध… देवताओं का नहीं है…” “यह युद्ध… नियति के विरुद्ध है।” कागभुशुण्डि धीरे-धीरे भूमि पर बैठ गए। उनकी आंखों में आंसू थे। वह विष्णु से प्रेम करते थे। सिर्फ भक्त की तरह नहीं… एक पुत्र की तरह। उन्हें विष्णु की मुस्कान याद आने लगी। उनकी बातें… उनकी हंसी… उनका अटल विश्वास। तभी… उन्हें विष्णु की कही एक बात याद आई। बहुत समय पहले उन्होंने पूछा था— “प्रभु… यदि कभी आपका और महादेव का युद्ध हो… तो कौन जीतेगा?” विष्णु मुस्कुराए थे। उन्होंने कहा था— “यदि महादेव पूर्ण शक्ति से युद्ध करें… तो मुझे कठिनाई अवश्य होगी…” “लेकिन… मुझे केवल विष्णु ही पराजित कर सकता है।” तब वह वाक्य अहंकार लगा था। लेकिन आज… उसका अर्थ बदल चुका था। कागभुशुण्डि अचानक खड़े हो गए। “विष्णु को केवल विष्णु ही पराजित कर सकता है…” “इसका मतलब…” उनकी आंखों में अचानक प्रकाश चमका।
कागभुशुण्डि ने तुरंत महादेव से पूछा— “प्रभु… क्या कोई ऐसा ब्रह्मांड है… जहां कल्कि अवतार ने कभी युद्ध किया ही ना हो?” महादेव मौन हो गए। उन्होंने धीरे-धीरे नेत्र बंद किए। क्षण भर में… अनंत ब्रह्मांड उनकी चेतना में घूमने लगे। करोड़ों पृथ्वियां… करोड़ों सूर्य… करोड़ों समय रेखाएं। फिर… उन्होंने आंखें खोलीं। “हां…” “एक ब्रह्मांड ऐसा है…” “जहां कल्कि अवतार को यह तक ज्ञात नहीं… कि वह स्वयं विष्णु का अवतार है।” नारद चौंक पड़े। “क्या?” महादेव बोले— “उस लोक में विष्णु ने जानबूझकर एक दुर्बल मनुष्य के रूप में जन्म लिया…” “बिना शक्ति…” “बिना स्मृति…” “बिना साहस…” “क्योंकि यदि उसमें तनिक भी दिव्यता होती… तो वह धर्म के लिए युद्ध करता… और मारा जाता।” कागभुशुण्डि मुस्कुराने लगे। “नारायण… आपने पहले ही सब देख लिया था…” तभी महादेव गंभीर हो गए। “लेकिन समस्या अभी समाप्त नहीं हुई…” “क्योंकि उसे भी कोई खोज रहा है…” “वह… जिसने सभी कल्कि अवतारों का अंत किया।” आकाश कांप उठा। और पहली बार… उस सत्ता का नाम लिया गया। “कालांतक…” सृष्टि के आरंभ से पहले… जब समय भी पैदा नहीं हुआ था… तब शून्य में एक चेतना जागी। वह ना देव थी… ना दानव… ना असुर। वह स्वयं अस्तित्व की पहली त्रुटि थी। उसने देखा… सृष्टि बन रही है। जीवन जन्म ले रहा है। भावनाएं, प्रेम, युद्ध, मृत्यु… सब कुछ। और तभी… उसके भीतर घृणा पैदा हुई। उसे लगा… अस्तित्व स्वयं एक बीमारी है। और उसका इलाज है… पूर्ण शून्य। वही चेतना आगे चलकर कालांतक बनी। उसने हजारों युगों तक स्वयं को छुपाकर रखा। फिर उसने मल्टीवर्स के रहस्य खोज लिए। उसे पता चल गया… हर ब्रह्मांड में विष्णु का एक अवतार जन्म लेता है। और यदि उन सभी अवतारों को समाप्त कर दिया जाए… तो स्वयं विष्णु की चेतना टूट जाएगी। यही कारण था… कि एक-एक करके सभी कल्कि अवतार मारे जा रहे थे। लेकिन… एक अंतिम अवतार अभी बाकी था। एक साधारण इंसान… पृथ्वी नाम के छोटे से ग्रह पर। पृथ्वी। भारत। रात के 2 बजे। एक छोटा सा शहर। बारिश हो रही थी। एक साधारण युवक सड़क किनारे बैठा था। उसका नाम था— आर्यन। ना उसके पास शक्ति थी… ना धन… ना कोई महान उद्देश्य। वह बस जीवन से हार चुका एक सामान्य इंसान था। लेकिन उसे पिछले कुछ महीनों से अजीब सपने आ रहे थे। हर रात… वह एक विशाल युद्धभूमि देखता। जलते हुए ब्रह्मांड। टूटते हुए ग्रह। और एक आवाज… जो उससे कहती— “जागो…” “समय समाप्त हो रहा है…” वह डरकर उठ जाता। उसका शरीर कांपता रहता। उसे लगता… वह पागल हो रहा है। लेकिन उसे नहीं पता था… कि उसी क्षण… करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर… कागभुशुण्डि और नारद उसे खोजने निकल चुके थे।
कागभुशुण्डि, नारद और महादेव का एक गुप्त रूप… मानव संसार में उतरे। उन्होंने साधारण मनुष्यों का रूप धारण किया। लेकिन पृथ्वी बदल चुकी थी। लोग अब ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे। धर्म मजाक बन चुका था। मानव तकनीक के पीछे भाग रहा था। नारद बोले— “यह वही पृथ्वी है… जहां विष्णु ने अवतार लिया?” कागभुशुण्डि बोले— “यही तो कारण है…” “कोई यहां भगवान को खोजने की कल्पना भी नहीं करेगा।” तभी अचानक… महादेव रुक गए। उन्होंने आकाश की ओर देखा। “वह आ चुका है…” उसी समय… पूरे शहर की बिजली चली गई। आकाश काला पड़ गया। और एक छाया… धीरे-धीरे पृथ्वी पर उतरने लगी। कालांतक… अंतिम अवतार के करीब पहुंच चुका था। आर्यन की जिंदगी में सिर्फ एक व्यक्ति था… जो उसे समझता था। एक रहस्यमयी लड़की… जिसका नाम था मीरा। मीरा हमेशा उससे कहती— “तुम साधारण नहीं हो…” लेकिन आर्यन हर बार हंस देता। उसे क्या पता था… कि मीरा कोई साधारण लड़की नहीं थी। वह लक्ष्मी का अंश थी। जिसे विष्णु के अंतिम अवतार की रक्षा के लिए भेजा गया था। उसे सब याद था। हर जन्म। हर युग। हर युद्ध। लेकिन एक नियम था। वह आर्यन को सत्य नहीं बता सकती थी… जब तक वह स्वयं जाग ना जाए। क्योंकि यदि कोई अवतार को समय से पहले जगा दे… तो उसकी चेतना टूट सकती थी। लेकिन अब समय समाप्त हो रहा था। उस रात… आर्यन अपने घर लौट रहा था। अचानक… समय रुक गया। बारिश हवा में स्थिर हो गई। लोग मूर्तियों की तरह जम गए। और सड़क के बीचोंबीच… एक काली आकृति प्रकट हुई। उसकी आंखें शून्य जैसी थीं। वह बोला— “तो… तुम हो अंतिम विष्णु…” आर्यन डर गया। “कौन हो तुम?” आकृति मुस्कुराई। “मैं… अंत हूं।” तभी अचानक आकाश से वीणा की ध्वनि गूंजी। नारद प्रकट हुए। फिर कागभुशुण्डि। और अंत में… एक साधारण वृद्ध के रूप में खड़े महादेव। कालांतक पीछे हट गया। “शिव…” महादेव बोले— “यह युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ।”
आर्यन अब सब जानना चाहता था। लेकिन सत्य इतना विशाल था… कि उसका मन उसे स्वीकार नहीं कर पा रहा था। कागभुशुण्डि ने उसे मल्टीवर्स दिखाया। करोड़ों ब्रह्मांड। करोड़ों पृथ्वियां। करोड़ों कल्कि। और फिर… उनकी मृत्यु। आर्यन टूट गया। “मैं भगवान नहीं हूं…” “मैं किसी को बचा नहीं सकता…” तभी महादेव उसके पास आए। उन्होंने कहा— “यही कारण है कि तुम जीवित हो।” “क्योंकि बाकी सभी कल्कि योद्धा थे…” “लेकिन तुम… मानव हो।” “और कभी-कभी… ब्रह्मांड को शक्ति नहीं…” “मानवता बचाती है।” महादेव ने आर्यन को एक स्थान पर ले गए… जहां समय अस्तित्व में नहीं था। वहां एक विशाल द्वार था। उस पर लिखा था— “जब अंतिम विष्णु जागेगा… तभी अंतिम युद्ध आरंभ होगा।” महादेव बोले— “यदि तुम जाग गए… तो कालांतक तुम्हें खोज लेगा।” “और यदि तुम नहीं जागे… तो सृष्टि समाप्त हो जाएगी।” आर्यन ने पूछा— “तो मुझे क्या करना होगा?” महादेव बोले— “तुम्हें याद करना होगा… कि तुम कौन हो।” आर्यन को क्षीरसागर ले जाया गया। वहां उसने अपने पिछले जन्म देखे। राम। कृष्ण। वामन। नरसिंह। हर अवतार। हर युद्ध। हर बलिदान। और अंत में… उसने स्वयं को देखा। एक साधारण इंसान की तरह। तभी उसे समझ आया। विष्णु ने इस बार शक्ति नहीं… मानवता को चुना था। कालांतक अब पृथ्वी पर पूरी शक्ति से उतर चुका था। आकाश फटने लगा। समुद्र उबलने लगे। पूरी मानवता भय में डूब गई। तभी… आर्यन आगे बढ़ा। उसकी आंखें बंद थीं। और पहली बार… उसने स्वयं को स्वीकार किया। अचानक… पूरा ब्रह्मांड प्रकाश से भर गया। उसके पीछे अनंत रूप प्रकट होने लगे। राम। कृष्ण। नरसिंह। कल्कि। सभी एक होकर… उसमें समा गए। कालांतक पहली बार डरा। “यह… असंभव है…” आर्यन ने आंखें खोलीं। अब वह सिर्फ आर्यन नहीं था। वह था… अंतिम विष्णु। फिर आरंभ हुआ… इतिहास का सबसे भयानक युद्ध। समय टूट रहा था। ग्रह नष्ट हो रहे थे। कालांतक शून्य की शक्ति से लड़ रहा था। और विष्णु… अस्तित्व की शक्ति से। हर प्रहार से ब्रह्मांड कांप उठता। महादेव और ब्रह्मा भी उस युद्ध को केवल देख पा रहे थे। क्योंकि यह युद्ध अब देवताओं के स्तर से ऊपर जा चुका था। यह युद्ध था— अस्तित्व बनाम शून्य। अंत में… कालांतक ने कहा— “तुम जीत भी गए… तो दुख फिर जन्म लेगा…” “युद्ध फिर होंगे…” “मृत्यु फिर आएगी…” तभी विष्णु मुस्कुराए। “यही जीवन है।” “अपूर्ण… फिर भी सुंदर।” और उसी क्षण… सुदर्शन चक्र प्रकाश बनकर घूम उठा। पूरा शून्य कांप गया। और कालांतक… हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
युद्ध समाप्त हो चुका था। देवता लौट आए। ब्रह्मांड फिर स्थिर हो गया। लेकिन तब… विष्णु ने ऐसा निर्णय लिया… जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। उन्होंने अपनी सारी दिव्य शक्तियां त्याग दीं। नारद चौंक पड़े। “प्रभु! आप क्या कर रहे हैं?” विष्णु मुस्कुराए। “मैंने अनगिनत युग भगवान बनकर बिताए हैं…” “अब मैं मानव बनकर जीना चाहता हूं।” महादेव मुस्कुराने लगे। “अंततः… तुमने वही चुना… जो सबसे कठिन है।” मानव जीवन। कुछ महीनों बाद। पृथ्वी फिर सामान्य हो चुकी थी। लोगों को कुछ याद नहीं था। उन्हें लगा… यह सब एक अजीब प्राकृतिक घटना थी। लेकिन कहीं दूर… एक छोटे शहर में… आर्यन और मीरा साथ बैठे थे। साधारण इंसानों की तरह। तभी मीरा मुस्कुराकर बोली— “तो भगवान बनकर कैसा लगा?” आर्यन हंस पड़ा। “बहुत थका देने वाला…” दोनों हंसने लगे। लेकिन उसी क्षण… आकाश में एक हल्की दरार दिखाई दी। महादेव कैलाश पर खड़े उसे देख रहे थे। उन्होंने धीरे से कहा— “कहानी अभी समाप्त नहीं हुई…” क्योंकि शून्य कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। और कहीं… बहुत दूर… अंधकार में… दो लाल आंखें फिर खुल चुकी थीं।
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