दुनिया के पांच ऐसे देश जहां आज भी होती है हनुमान जी की पूजा
दुनिया के पांच ऐसे देश जहां आज भी होती है हनुमान जी की पूजा और पहले नंबर पर मौजूद देश तो खुद मुस्लिम आबादी से भरा हुआ है। रामदूत, पवन पुत्र हनुमान। जब हम यह नाम सुनते हैं, तो हमारे मन में असीम भक्ति, शक्ति और समर्पण का चित्र उभरता है। अधिकतर लोग मानते हैं कि भगवान हनुमान की पूजा केवल भारत और हिंदू राष्ट्र नेपाल तक ही सीमित है। लेकिन आज हम जिस सफर पर निकल रहे हैं, वह आपको हैरान कर देगा। वाल्मीकि रामायण और स्कंद पुराण जैसे हमारे पवित्र ग्रंथों के अनुसार, हनुमान जी चिरंजीवी हैं। आधुनिक विज्ञान जिसे 'टाइम डायलेशन' (Time Dilation) या समय के धीमे होने का सिद्धांत कहता है, सनातन धर्म ने उसे युगों पहले समझ लिया था। चिरंजीवी होने का अर्थ है समय और भौतिक सीमाओं के पार जाना। हनुमान जी के पास 'अष्ट सिद्धियां' हैं—अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा आदि। अगर हम इसे क्वांटम फिजिक्स (Quantum Physics) के नजरिए से देखें, तो यह अणुओं (Atoms) और द्रव्यमान (Mass) को अपनी इच्छा से नियंत्रित करने की एक अत्यंत उन्नत वैज्ञानिक प्रक्रिया है। यही कारण है कि उनकी ऊर्जा केवल एक भूभाग तक सीमित नहीं रही। आज हम दुनिया के उन पांच देशों के बारे में जानेंगे, जहां आज भी हनुमान जी की पूजा एक देवता के रूप में होती है, और इनमें से कुछ देश तो मुस्लिम बहुल आबादी वाले हैं। आइए, समय के पन्नों को पलटते हैं। हमारी सूची में पांचवें नंबर पर है मॉरीशस। मॉरीशस का इतिहास केवल कुछ सदियों पुराना नहीं है, बल्कि इसका संबंध पृथ्वी के उस प्राचीन स्वरूप से है जिसे विज्ञान 'गोंडवानालैंड' (Gondwana Land) और हमारे पुराण 'जम्बूद्वीप' कहते हैं। लाखों वर्ष पहले, जब पृथ्वी के गर्भ में टेक्टोनिक प्लेट्स (Tectonic Plates) की भयंकर उथल-पुथल हुई, तो जम्बूद्वीप का एक बड़ा भूभाग टूटकर हिंद महासागर में जा बसा। यह वही द्वीप है जिसे आज हम मॉरीशस कहते हैं। यद्यपि आज यह एक धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन इसकी आत्मा में सनातन धर्म बसा है। यहां की कुल जनसंख्या का लगभग 48 से 52 प्रतिशत हिस्सा हिंदू धर्म का पालन करता है। आधुनिक इतिहास बताता है कि अंग्रेजों के समय में भारतीयों को यहां लाया गया था, लेकिन ये लोग अपने साथ केवल अपनी शारीरिक क्षमता नहीं लाए, बल्कि अपने ग्रंथों, अपने संस्कारों और हनुमान जी की असीम ऊर्जा को भी साथ लाए। मॉरीशस में आज कई प्राचीन और पवित्र स्थल हैं। यहां का 'गंगा तलाव' जिसे ग्रैंड बेसिन भी कहा जाता है, केवल एक झील नहीं, बल्कि एक ऐसा ऊर्जा केंद्र है जहां भगवान शिव, माता दुर्गा और हनुमान जी के अत्यंत भव्य मंदिर स्थापित हैं। बेलीमारे और बॉयज चेरी का हनुमान मंदिर हो, या पोर्ट लुईस का ऐतिहासिक काशीपुर हनुमान मंदिर मंडली—यहाँ की हवाओं में राम नाम की गूंज है। यहां हनुमान जन्मोत्सव किसी त्योहार से कम नहीं होता। जब यहां के लोग पारंपरिक धोती और मुकुट धारण कर वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो प्राचीन भारत का कोई स्वर्णिम काल जीवंत हो उठा हो। हमारे सफर का चौथा पड़ाव है कंबोडिया। यह वही देश है जहां दुनिया का सबसे बड़ा और रहस्यमयी हिंदू मंदिर 'अंकोर वाट' (Angkor Wat) सीना ताने खड़ा है। अंकोर वाट का आर्किटेक्चर और इसका खगोलीय संरेखण (Astronomical Alignment) इतना सटीक है कि आज के वैज्ञानिक भी इसे एक 'क्वांटम पोर्टल' या समानांतर ब्रह्मांड (Parallel Universe) से जुड़ने का माध्यम मानते हैं।
कंबोडिया के इतिहास की जड़ें सनातन धर्म के एक ब्राह्मण विद्वान 'कौंडिन्य प्रथम' से जुड़ी हैं, जिन्हें स्थानीय लोग 'प्रेथोंग' के नाम से पूजते हैं। इन्होंने नाग राजकुमारी सोमा से विवाह कर 'फुनान साम्राज्य' की स्थापना की थी। इसी वैदिक बीज से कंबोडिया में रामायण का उदय हुआ। भारत में जहां महर्षि वाल्मीकि की रामायण और गोस्वामी तुलसीदास जी का रामचरितमानस गूंजता है, वहीं कंबोडिया में रामायण के खमेर संस्करण 'रेमकर' (Reamker) को जीवन का आधार माना जाता है। यहां भगवान राम को 'प्रह रिम' कहा जाता है। कंबोडिया का प्राचीन 'लखाओ खाओल' नृत्य कोई साधारण कला नहीं है, बल्कि यह रामलीला का एक बेहद जटिल और वैज्ञानिक नाट्य रूप है। 802 ईसा पूर्व में जयवर्मन द्वितीय द्वारा स्थापित खमेर साम्राज्य के शिलालेख, जो 103 ईसा पूर्व के हैं, पूरी तरह संस्कृत में लिखे गए हैं। हालांकि आज कंबोडिया की 80% आबादी थेरवाद बौद्ध धर्म का पालन करती है, लेकिन कंबोडिया की रग-रग में आज भी हनुमान जी वास करते हैं। 10वीं शताब्दी के 'प्रसाद चीन मंदिर' और 12वीं शताब्दी के अंकोर वाट की दीवारों पर उकेरी गई नक्काशियों में हनुमान जी अपने पूरे रौद्र और रक्षक रूप में दिखाई देते हैं। यहां के लोग आज भी नकारात्मक ऊर्जा, भूत-प्रेत और काले जादू जैसी अदृश्य शक्तियों से बचने के लिए हनुमान जी का आह्वान करते हैं, जिन्हें वे अत्यंत आदर के साथ 'वाइट मंकी गॉड' कहते हैं। अब हम आते हैं तीसरे नंबर के देश पर, और यह नाम आपको चौंका सकता है—चीन। प्राचीन काल में भारत को 'दयांशु' यानी स्वर्ग कहने वाला चीन भी असल में हनुमान जी की पूजा करता है। लेकिन वहां उन्हें 'सन वुकंग' (Sun Wukong) यानी 'मंकी किंग' (Monkey King) के नाम से जाना जाता है।
जब हम चीनी पौराणिक कथाओं और सनातन धर्म का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं, तो कई अंतरराष्ट्रीय विद्वानों और इतिहासकारों का यह स्पष्ट मानना है कि 'मंकी किंग' कोई और नहीं, बल्कि साक्षात हनुमान जी ही हैं। दोनों की शक्तियों में अचरज में डालने वाली समानताएं हैं। सन वुकंग का हवा में उड़ना, अपना रूप और आकार बदलना, और अपार शक्ति का प्रदर्शन करना—यह सब अष्ट सिद्धियों (विशेषकर गरिमा और लघिमा सिद्धि) का ही चीनी रूपांतरण है। दोनों ही वानर योद्धा हैं, दोनों ही अमर (चिरंजीवी) हैं, और दोनों ही अकल्पनीय ब्रह्मांडीय कार्य करने की क्षमता रखते हैं। सनातन धर्म में हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार हैं, जो श्री राम के प्रति परम भक्ति के प्रतीक हैं। वहीं चीनी संस्कृति में सन वुकंग ताओवादी और बौद्ध धर्म के एक रक्षक के रूप में देखे जाते हैं। चीन के प्रसिद्ध इतिहासकार 'जी जियानलिन' (Ji Xianlin) और 'चेंग एन' (Wu Cheng'en) के अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि रामायण की कथाएं सिल्क रूट (Silk Route) के माध्यम से चीन पहुंचीं। यह संभव है कि श्री राम के देह त्यागने और वैकुंठ लौटने के बाद, चिरंजीवी हनुमान जी ने हिमालय के पार उस भूभाग में भी समय बिताया हो, जिसे आज हम चीन कहते हैं। समय के साथ वहां की संस्कृति ने उनके इतिहास को अपने रंग में ढाल लिया, और रामदूत हनुमान वहां के अजेय 'मंकी किंग' बन गए।
मेरे दोस्त, हमारी इस डॉक्यूमेंट्री का यह सफर अब उस देश में प्रवेश कर रहा है, जहां राजशाही आज भी भगवान राम के नाम से चलती है—थाईलैंड। थाईलैंड वह देश है जहां हनुमान जी की पूजा विशुद्ध हिंदू परंपरा और थाई महाकाव्य 'रामाकियेन' (Ramakien) के एक अद्भुत संगम के रूप में होती है। आधुनिक विज्ञान जिसे 'बायो-इलेक्ट्रिसिटी' (Bio-electricity) या मानव शरीर की छिपी हुई असीमित ऊर्जा (Kinetic Potential) कहता है, थाईलैंड के लोग उसे हनुमान जी की शक्ति मानते हैं। यहां हनुमान जी को वीरता, असीमित बुद्धि और वफादारी के प्रतीक 'वाइट मंकी किंग' के रूप में पूजा जाता है। थाईलैंड के महाकाव्य रामाकियेन, जिसका अर्थ है 'राम की महिमा' (Glory of Rama), को वाल्मीकि रामायण का ही थाई संस्करण माना जाता है। इसे 18वीं शताब्दी में थाईलैंड के राजा राम प्रथम ने एक नया स्वरूप दिया था। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि थाईलैंड के चक्री राजवंश के सम्राट आज भी खुद को 'राम वंश' का उत्तराधिकारी मानते हैं और अपने नाम के आगे 'राम' लगाते हैं—जैसे रामा प्रथम, रामा दशम। बैंकॉक के विश्व प्रसिद्ध 'द टेंपल ऑफ एमराल्ड बुद्धा' (The Temple of the Emerald Buddha) में इस रामाकियेन को 'खोन' (Khon) नामक एक बेहद प्राचीन और शास्त्रीय नृत्य-नाटक के जरिए प्रदर्शित किया जाता है। इस थाई संस्करण की एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विशेषता यह है कि इसमें राक्षसराज थोत्सकन (यानी रावण) के मुकाबले हनुमान जी को कहीं अधिक शक्तिशाली और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का स्वामी दिखाया गया है। यहां तक कि थाई मार्शल आर्ट्स (Thai Martial Arts), जो अपनी मारक क्षमता के लिए दुनिया भर में मशहूर है, उसके संरक्षक (Protector) के रूप में आज भी हनुमान जी की पूजा होती है। यह दर्शाता है कि अखाड़े में उतरने से पहले एक योद्धा कैसे अपनी 'प्राण ऊर्जा' (Prana Energy) को हनुमान जी के ध्यान से जागृत करता है। बैंकॉक के प्रसिद्ध लक्ष्मीनारायण मंदिर में आज भी हनुमान जन्मोत्सव की गूंज उसी तरह सुनाई देती है, जैसे अयोध्या या काशी में। अब हम आते हैं नंबर दो पर। अब जिस देश की बात हम करने जा रहे हैं, वह आधुनिक दुनिया के भौगोलिक और धार्मिक समीकरणों को पूरी तरह से चौंका देता है। एक ऐसा देश जिसकी 90% आबादी मुस्लिम है, लेकिन उसके कण-कण में, उसकी श्वास-श्वास में सनातन धर्म और रामायण की गूंज है—वह है इंडोनेशिया। अगर हम क्वांटम फिजिक्स की 'स्ट्रिंग थ्योरी' (String Theory) को समझें, तो वह कहती है कि यह पूरा ब्रह्मांड सूक्ष्म धागों (Strings) के कंपन (Vibrations) से बना है। इसी सिद्धांत को आधार मानें, तो 'रामकथा' कोई साधारण कहानी नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय कंपन है जो धर्म और समय की सीमाओं को पार कर के हर आयाम में गूंजती है। इंडोनेशिया का जावा और बाली द्वीप इसके सबसे बड़े जीवंत प्रमाण हैं। जावा में नौवीं और दसवीं शताब्दी के मातरम साम्राज्य के दौरान प्राचीन जावानी भाषा में 'काकावीन रामायण' (Kakawin Ramayana) लिखी गई। आपको यह सुनकर अचरज होगा कि आज भी जावा द्वीप के कई लोग खुद को किष्किंधा के राजा सुग्रीव का वंशज मानते हैं और अत्यंत श्रद्धा के साथ उनकी और हनुमान जी की पूजा करते हैं। जावा में आज भी कई प्राचीन और ऊर्जावान मंदिर मौजूद हैं, जिनमें 9वीं शताब्दी का 'प्रम्बानन मंदिर' (Prambanan Temple) सबसे प्रमुख है। इस मंदिर के पत्थरों पर उकेरी गई रामायण केवल कला नहीं, बल्कि ऊर्जा का एक ऐसा ब्लूप्रिंट (Blueprint) है जो सदियों बाद भी जीवित है। वहीं दूसरी तरफ है 'बाली' द्वीप। इसे मिनी इंडिया भी कहा जाता है। इसका तो नाम ही सुग्रीव के बड़े भाई 'बाली' के नाम पर रखा गया है। यहां की रामायण को 'राम कवाका' (Rama Kavaca) कहा जाता है। बाली के लोग वायु यानी पवन देवता के पुत्र हनुमान जी को बहुत आदर से 'वाइट मंकी केरापतीह' (Kerapatih) कहकर पुकारते हैं। बाली का विश्व प्रसिद्ध 'केचक डांस' (Kecak Dance) रामलीला का एक ऐसा मंत्रमुग्ध कर देने वाला प्रदर्शन है, जिसे देखकर आप एक अलग ही आध्यात्मिक आयाम (Spiritual Dimension) में प्रवेश कर जाते हैं। प्रसिद्ध 'पुरा लुहुर उलवाटू मंदिर' (Pura Luhur Uluwatu) में जब यह नृत्य होता है, तो हवाओं में जो ऊर्जा उत्पन्न होती है, उसे विज्ञान भले ही साउंड फ्रीक्वेंसी (Sound Frequency) कहे, लेकिन भक्त उसे हनुमान जी की प्रत्यक्ष उपस्थिति मानते हैं। मेरे दोस्त, मॉरीशस के शांत समुद्रों से लेकर कंबोडिया के रहस्यमयी मंदिरों तक, चीन के अजेय मंकी किंग से लेकर थाईलैंड के मार्शल आर्ट्स तक, और इंडोनेशिया की इस्लामिक भूमि पर गूंजती रामकथा तक—एक बात पूरी तरह स्पष्ट है। सनातन धर्म और भगवान हनुमान की ऊर्जा किसी एक देश, एक काल या एक सीमा में बांधी नहीं जा सकती। जैसे क्वांटम पार्टिकल्स (Quantum Particles) एक ही समय में कई जगहों पर मौजूद हो सकते हैं (Superposition), वैसे ही चिरंजीवी हनुमान जी हर उस जगह, हर उस देश और हर उस हृदय में विद्यमान हैं, जहां सत्य, शक्ति और समर्पण है। मैं हूँ आपका दोस्त धर्मेंद्र, और 'अध्यात्म गुरु की दुनिया' की इस लंबी और गहरी डॉक्यूमेंट्री के सफर में मेरे साथ जुड़े रहने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। हम आगे भी ऐसे ही ब्रह्मांडीय रहस्यों, इतिहास और विज्ञान के अनसुलझे पन्नों को एक साथ खोलते रहेंगे। तब तक के लिए, अपने भीतर की ऊर्जा को जगाए रखिए और सनातन की इस असीम शक्ति को महसूस करते रहिए। नमस्कार!
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