गार्गी याज्ञवल्क्य संवाद
दोस्तों, जरा अपनी आँखें बंद कीजिए और उस अनंत अंधेरे के बारे में सोचिए जो तारों के पार है। हम कौन हैं? हमें किसने बनाया है? और जिसने हमें बनाया है, उस परम सत्ता का उद्गम कहाँ से हुआ? क्या हमें बनाने वाला इसी ब्रह्मांड के किसी कोने में बैठा है, या वह इस ब्रह्मांड से परे, किसी 'मल्टीवर्स' यानी समानांतर ब्रह्मांड का हिस्सा है? आधुनिक विज्ञान आज 'स्ट्रिंग थ्योरी', 'क्वांटम मैकेनिक्स' और 'टाइम-ट्रैवल' के जरिए जिन डायमेंशन्स की बात कर रहा है, क्या यह संभव है कि हमारे सनातन ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही अपने ध्यान की असीम गहराइयों में उन 'क्वांटम पोर्टल्स' को खोज लिया था?
ब्रह्मलोक कहाँ है? क्या वह कोई भौतिक स्थान है जहाँ जाया जा सकता है, या वह स्पेस और टाइम से परे एक शुद्ध ऊर्जा का ऐसा केंद्र है जिसे केवल महसूस किया जा सकता है? ऐसे हजारों सवाल हर उस इंसान को घेरे रहते हैं जो इस जीवन से कुछ ज्यादा समझना चाहता है। पर आज भी हमारे सबसे आधुनिक विज्ञान के पास इनके पूरी तरह से सटीक उत्तर नहीं हैं। इन्हीं गूढ़ और ब्रह्मांडीय प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए, भारतीय सनातन इतिहास में जन्म हुआ 'शास्त्रार्थ' का। शास्त्रार्थ केवल दो लोगों के बीच की बहस या लड़ाई नहीं थी; यह उस युग की सबसे बड़ी 'साइंटिफिक कांफ्रेंस' हुआ करती थी। यह एक ऐसा मंच था जहाँ ब्रह्मांड के सबसे गहरे रहस्यों को कठोर तर्कों और ध्यान के अनुभवों की कसौटी पर परखा जाता था। और सनातन इतिहास में एक ऐसा ही महा-शास्त्रार्थ हुआ, जो अपने गहरे संवाद और ब्रह्मांडीय विज्ञान के उत्कृष्ट प्रश्नोत्तर के लिए हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया। वह था— ब्रह्मवादिनी गार्गी और महर्षि याज्ञवल्क्य के बीच का ऐतिहासिक शास्त्रार्थ। तो चलिए दोस्तों, बिना किसी विलंब के आज की यह विस्तृत और रहस्यमयी डॉक्यूमेंट्री शुरू करते हैं! साथियों, इससे पहले कि हम इस महान शास्त्रार्थ की गहराइयों में गोता लगाएँ और इसे क्वांटम विज्ञान के नजरिए से समझें, हमें यह जानना होगा कि यह ऐतिहासिक घटना घटी कहाँ थी। इसके लिए हमें बृहदारण्यक उपनिषद के तीसरे अध्याय के पन्नों को पलटना होगा, जहाँ हमें विदेह नरेश राजा जनक जी के बारे में पता चलता है। राजा जनक केवल एक शासक या क्षत्रिय राजा नहीं थे, वे स्वयं एक बहुत बड़े तत्वज्ञानी और सिद्ध पुरुष थे। एक बार राजा जनक ने अपने दरबार में एक विशाल और अभूतपूर्व यज्ञ का आयोजन करवाया। यह कोई साधारण यज्ञ नहीं था। इस यज्ञ में कुरु और पांचाल राज्यों से उस युग के सबसे बड़े-बड़े विद्वान, दार्शनिक, वेदपाठी और ऋषि आमंत्रित किए गए थे। आप इसकी कल्पना आज के नासा (NASA) या सर्न (CERN) के वैज्ञानिकों के सबसे बड़े सम्मलेन से कर सकते हैं, जहाँ दुनिया भर के सबसे तेज दिमाग एक छत के नीचे इकट्ठा हों। जब इतने सारे प्रकांड विद्वान एक जगह इकट्ठा हुए, तो राजा जनक के मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न हुई। वह जानना चाहते थे कि इस पूरी पृथ्वी पर सबसे बड़ा ब्रह्मज्ञानी कौन है? वह कौन सा मानव है जिसने ब्रह्मांड के 'सोर्स कोड' को पूरी तरह से डिकोड कर लिया है? इस सर्वोत्कृष्ट ज्ञानी को खोजने के लिए राजा जनक ने एक युक्ति निकाली। उन्होंने 1,000 अत्यंत हृष्ट-पुष्ट और उत्तम गाएं मंगवाईं। केवल गाएं ही नहीं, बल्कि हर एक गाय के दोनों सींगों में 10-10 स्वर्ण मुद्राएं यानी कुल 20,000 स्वर्ण मुद्राएं बंधवा दीं। इसके बाद उन्होंने भरी सभा में एक चुनौती भरी घोषणा की— "हे परम ज्ञानी ऋषियों! आप में से जो भी स्वयं को सबसे बड़ा विद्वान और ब्रह्मज्ञानी मानता हो, जिसे ब्रह्मांड के रहस्यों का सबसे स्पष्ट ज्ञान हो, वह आगे आए और इन एक हजार गायों को अपने साथ ले जाए।" सभा में एक से बढ़कर एक ज्ञानी और तपस्वी बैठे थे, लेकिन किसी का भी साहस नहीं हुआ कि वह आगे बढ़कर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर सके। वह भी इतने बड़े-बड़े महारथियों के सामने! जब काफी समय बीत गया और पूरी सभा में एक भारी सन्नाटा पसरा रहा, तब उस सन्नाटे को चीरते हुए महर्षि याज्ञवल्क्य अपने स्थान से उठे। उनके चेहरे पर ब्रह्मांडीय ज्ञान का वह तेज था, जो केवल उसी में हो सकता है जिसने परम सत्य को देख लिया हो। उन्होंने अत्यंत शांत और अटल स्वर में अपने शिष्य सामश्रवा से कहा— "हे सौम्य! इन गायों को हमारे आश्रम की ओर हांक ले चलो।" जैसे ही महर्षि याज्ञवल्क्य जी ने यह कहा, पूरी सभा में हाहाकार मच गया। बाकी ऋषियों को यह एक बहुत बड़ा अपमान लगा। उन्हें लगा कि याज्ञवल्क्य अत्यंत अहंकारी हो गए हैं। बिना अपने ज्ञान को प्रमाणित किए, बिना किसी से शास्त्रार्थ किए, वह सर्वश्रेष्ठ होने का दावा कैसे कर सकते हैं? और दोस्तों, ठीक यहीं से प्रारंभ हुई शास्त्रार्थ की वह ऐतिहासिक और महाविनाशकारी तर्कों की श्रृंखला। एक-एक करके बड़े-बड़े विद्वानों ने महर्षि याज्ञवल्क्य को चुनौती दी, लेकिन महर्षि ने अपने अचूक तर्कों और ब्रह्मांडीय विज्ञान से सबको निरुत्तर कर दिया। जब बड़े-बड़े महारथी हार गए और सभा में निराशा छाने लगी, तब उस विद्वत मंडली के मध्य से एक स्त्री उठीं। यह कोई साधारण स्त्री नहीं थीं। यह थीं वाचक्नवी गार्गी— उस काल की सबसे महान दार्शनिक, तपस्विनी और अगर आज की भाषा में कहें तो उस युग की सबसे बड़ी 'क्वांटम भौतिक विज्ञानी'। गार्गी जी का उद्देश्य केवल जीतना या गायें प्राप्त करना नहीं था, बल्कि वह ब्रह्मांड की उत्पत्ति की रिवर्स इंजीनियरिंग करना चाहती थीं। वह जानना चाहती थीं कि हर भौतिक वस्तु के पीछे का सूक्ष्म कारण क्या है। दोस्तों, गार्गी के वे प्रश्न इतने वैज्ञानिक और इतने गहरे थे कि आज भी आधुनिक कॉस्मोलॉजिस्ट जब उपनिषदों को पढ़ते हैं, तो दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं। गार्गी ने पहला ही प्रश्न सीधा ब्रह्मांड के मूल तत्व पर किया। उन्होंने महर्षि की आँखों में देखते हुए पूछा: "हे याज्ञवल्क्य! यह सम्पूर्ण दृश्यमान पृथ्वी, यह ठोस जगत, जो हमें नजर आता है, हम जानते हैं कि यह जल में ओत-प्रोत है। लेकिन वह जल किसमें ओत-प्रोत है?" साथियों, इस प्रश्न की गहराई को आज के विज्ञान से समझने का प्रयास कीजिए। हमारे सनातन दर्शन में यह माना गया है कि हर स्थूल तत्व यानी जो बड़ा और ठोस रूप हमें दिखता है, वह किसी सूक्ष्म तत्व यानी बहुत बारीक ऊर्जा या कण से उत्पन्न हुआ है। आदि शंकराचार्य जी के अनुसार भी पृथ्वी जल तत्व से प्रकट हुई है। आधुनिक स्पेस साइंटिस्ट जब किसी नए प्लेनेट या 'एक्सोप्लैनेट' की खोज करते हैं, तो जीवन की संभावना तलाशने के लिए सबसे पहले वहाँ पानी के मॉलिक्यूल्स ढूंढते हैं। जल ही किसी बंजर चट्टान को 'पृथ्वी' यानी जीवन योग्य बनाता है। गार्गी जी को यह भली-भांति पता था कि पृथ्वी का सूक्ष्म तत्व जल है। पर उनकी जिज्ञासा इसके आगे की थी। वह पूछ रही थीं कि इस जल की उत्पत्ति का सोर्स क्या है? जल का सूक्ष्म रूप क्या है? महर्षि याज्ञवल्क्य ने मुस्कुराते हुए और उसी गहराई से उत्तर दिया: "गार्गी, जल वायु में ओत-प्रोत है।" इस उत्तर में कितना गहरा विज्ञान छिपा है दोस्तों! अगर हम इसे आज के थर्मोडायनामिक्स और मौसम विज्ञान से समझें, तो वायु यानी गैस ही जल को वाष्प के रूप में होल्ड करती है। वायु जब जल वाष्प से भर जाती है, उसकी नमी बढ़ती है, तो वह बादलों का रूप ले लेती है और फिर ठंडे होकर वापस जल बन जाती है। यानी जल का अस्तित्व पूरी तरह से वायु तत्व पर निर्भर है।
लेकिन गार्गी जी यहाँ रुकने वाली नहीं थीं। उन्होंने इस उत्तर को सुना और तुरंत अपना अगला प्रश्न दागा— "अगर जल वायु में ओत-प्रोत है, तो वह वायु किसमें ओत-प्रोत है?" गार्गी जी का यह प्रश्न कि 'वायु किसमें ओत-प्रोत है', सीधे-सीधे उस समय के भौतिक विज्ञान की सीमाओं को चुनौती दे रहा था। वायु यानी गैस, जो हमें भले ही दिखती नहीं लेकिन महसूस होती है, उसे भी रहने के लिए, फैलने के लिए कोई जगह चाहिए। कोई तो ऐसा माध्यम होगा जहाँ यह वायु अपना विस्तार कर सके। महर्षि याज्ञवल्क्य ने अत्यंत शांत भाव से उत्तर दिया, "गार्गी, वायु अंतरिक्ष में ओत-प्रोत है।" दोस्तों, आज का विज्ञान भी हूबहू यही कहता है। वैक्यूम यानी स्पेस के बिना किसी भी गैस, किसी भी पदार्थ या ऊर्जा का अस्तित्व नहीं हो सकता। अंतरिक्ष वह आधार है, वह खाली कैनवस है जो हर स्थूल वस्तु को धारण करता है। लेकिन गार्गी जी की जिज्ञासा की उड़ान इतनी छोटी नहीं थी। वह स्पेस की हदों को पार करना चाहती थीं। उन्होंने तुरंत पूछा, "तो फिर हे याज्ञवल्क्य, यह अंतरिक्ष किसमें ओत-प्रोत है?" यहाँ से यह शास्त्रार्थ एक अलग ही डायमेंशन, यानी मल्टीवर्स और उच्च लोकों में प्रवेश कर गया। महर्षि याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि "अंतरिक्ष गंधर्व लोक में ओत-प्रोत है।" गार्गी जी ने बिना रुके फिर पूछा कि "गंधर्व लोक किसमें ओत-प्रोत है?" याज्ञवल्क्य जी ने कहा, "आदित्य लोक में।" गार्गी जी ने आदित्य लोक का आधार पूछा, तो महर्षि ने कहा "चंद्र लोक में।" इसी तरह गार्गी जी के एक के बाद एक तीखे प्रश्नों के उत्तर में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ब्रह्मांड की पूरी संरचना खोल कर रख दी। उन्होंने बताया कि चंद्र लोक नक्षत्र लोक में, नक्षत्र लोक देव लोक में, देव लोक इंद्र लोक में, इंद्र लोक प्रजापति लोक में और प्रजापति लोक अंततः ब्रह्म लोक में ओत-प्रोत है। साथियों, इसे अगर हम आज के क्वांटम फिजिक्स, स्ट्रिंग थ्योरी और कॉस्मोलॉजी के नजरिए से डिकोड करें, तो यह कोई साधारण सूची नहीं है। यह हमारी पृथ्वी से लेकर हमारे सोलर सिस्टम, फिर हमारी मिल्की वे गैलेक्सी, फिर लोकल ग्रुप ऑफ गैलेक्सीज, और फिर पूरे दृश्यमान ब्रह्मांड की यात्रा है। और सिर्फ भौतिक ब्रह्मांड नहीं, बल्कि यह 'डायमेंशन्स' यानी आयामों की यात्रा है। जैसे हम थ्री-डायमेंशनल दुनिया में रहते हैं, वैसे ही गंधर्व लोक, देव लोक और इंद्र लोक उन 4th, 5th या 6th डायमेंशन्स की तरफ इशारा करते हैं जिन्हें हमारी आँखें नहीं देख सकतीं, लेकिन उनका अस्तित्व है। और सबसे अंत में आता है ब्रह्मलोक। ब्रह्मलोक क्या है? ब्रह्मलोक इस ऑब्जर्वेबल यूनिवर्स, इस मल्टीवर्स या समानांतर ब्रह्मांडों के उस पार की वह सर्वोच्च अवस्था है, जो शुद्ध चेतना, यानी सुप्रीम कॉन्शियसनेस से बनी है। यह संवाद एक ऐसी गति से चल रहा था कि सभा में बैठे अन्य विद्वान बस अपनी सांसें रोके सुन रहे थे। गार्गी एक के बाद एक परतें खोल रही थीं। जब याज्ञवल्क्य जी ने कहा कि सब कुछ अंततः ब्रह्मलोक में ओत-प्रोत है, तो गार्गी जी के भीतर उस परम सत्य को जानने की वह उत्कंठा जाग उठी जिसने उन्हें वह प्रश्न पूछने पर मजबूर कर दिया जिसकी अनुमति विज्ञान और दर्शन की सीमाएं नहीं देतीं। उन्होंने पूछा, "हे याज्ञवल्क्य! तो फिर यह ब्रह्मलोक किसमें ओत-प्रोत है? इस ब्रह्मलोक का कारण क्या है?" इस प्रश्न को सुनते ही याज्ञवल्क्य जी का सौम्य चेहरा अत्यंत गंभीर हो गया। उनकी आँखों में एक अजीब सा तेज आ गया। उन्होंने कड़े और चेतावनी भरे शब्दों में कहा, "गार्गी! अतिप्रश्न मत करो। तुम अपनी सीमाओं को लांघ रही हो। तुम उस परम तत्व, उस देवता के विषय में पूछ रही हो जो तर्कों की सीमा से परे है, जो अनुमान का विषय नहीं है। यदि तुमने इसके आगे प्रश्न किया, तो तुम्हारा मस्तक फट जाएगा!" दोस्तों, जरा सोचिए, क्या सच में मस्तक फट जाता? क्या यह कोई श्राप था? नहीं दोस्तों, इसका विशुद्ध वैज्ञानिक अर्थ है 'कॉग्निटिव ओवरलोड' या चेतना का विखंडन। इसे ऐसे समझिए कि अगर आप किसी पुराने दशक के कंप्यूटर में आज का सबसे एडवांस क्वांटम अल्गोरिदम रन करने की कोशिश करेंगे, तो उसका प्रोसेसर जल जाएगा। हमारा इंसानी मस्तिष्क समय, स्थान और कार्य-कारण (Cause and Effect) के नियमों से बंधा है। हम हर चीज का कोई 'कारण' ढूंढते हैं। लेकिन जो परम सत्ता टाइम और स्पेस से परे है, जिसे कभी पैदा ही नहीं किया गया, जो शुरुआत और अंत से मुक्त है, उसका 'कारण' कैसे पूछा जा सकता है? वह स्थूल है ही नहीं। अगर हमारा सीमित 3D मस्तिष्क उस अनंत मल्टी-डायमेंशनल वास्तविकता को तर्कों के छोटे से खांचे में फिट करने की कोशिश करेगा, तो हमारे न्यूरॉन्स उस जानकारी को प्रोसेस नहीं कर पाएंगे। इंसान का मानसिक संतुलन टूट जाएगा, वह विक्षिप्त हो जाएगा।
गार्गी जी, जो स्वयं एक महान दार्शनिक और ज्ञानी थीं, महर्षि याज्ञवल्क्य की इस वैज्ञानिक चेतावनी को तुरंत समझ गईं। उन्हें एहसास हुआ कि तर्कों की एक सीमा होती है और सत्य को केवल तर्कों से नहीं बांधा जा सकता। उन्होंने सम्मानपूर्वक महर्षि को देखा और वहीं पर अपने पहले संवाद को पूर्ण विराम दे दिया। साथियों, गार्गी जी सभा में अपने स्थान पर वापस जाकर बैठ जरूर गई थीं और शांत दिख रही थीं, लेकिन उनके भीतर ज्ञान की वह ज्वाला अभी बुझी नहीं थी। वह हारी नहीं थीं; वह केवल अपने दिमाग की प्रयोगशाला में एक नए, अधिक सटीक और अचूक सूत्र का निर्माण कर रही थीं। कुछ समय बीता। महर्षि याज्ञवल्क्य ने राजा जनक की सभा में उपस्थित अन्य सभी महान विद्वानों को एक-एक करके शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया। जब यह सिद्ध होने लगा कि याज्ञवल्क्य ही अजेय हैं, तब गार्गी जी एक बार फिर अपने स्थान से उठीं और सभा के मध्य आ गईं।
उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ घोषणा की, "हे उपस्थित ब्राह्मणों! हे ऋषियों! आप सब ध्यान से सुनें। मैं याज्ञवल्क्य से केवल दो प्रश्न और पूछूंगी। ये मेरे अंतिम बाण हैं। अगर इन्होंने मेरे इन दो प्रश्नों का सही और सटीक उत्तर दे दिया, तो यह हमेशा के लिए मान लेना कि कोई भी ब्राह्मण इन्हें ब्रह्म ज्ञान में कभी पराजित नहीं कर सकता।" पूरी सभा में एक बार फिर सन्नाटा छा गया। सुई गिरने की आवाज भी सुनी जा सकती थी। गार्गी जी ने याज्ञवल्क्य जी की ओर स्थिर दृष्टि से देखते हुए अपना वह ब्रह्मास्त्र रूपी प्रश्न छोड़ा। उन्होंने पूछा, "हे महर्षि! जो कुछ भी स्वर्ग लोक के ऊपर है, जो कुछ भी इस पृथ्वी के नीचे है, और जो कुछ भी इन दोनों के बीच में मौजूद है— और इतना ही नहीं, जिसे लोग भूतकाल (Past), वर्तमान (Present) और भविष्य (Future) कहते हैं— वह सब कुछ आखिर किस ताने-बाने में बुना हुआ है? यह संपूर्ण सृष्टि किसमें ओत-प्रोत है?" दोस्तों, गार्गी जी के इस प्रश्न को हल्के में मत लीजिएगा। यहां वह संपूर्ण 'स्पेस' (सभी आयामों) और 'टाइम' (समय) को एक साथ समेट कर एक ही धागे में पिरो कर पूछ रही थीं। अल्बर्ट आइंस्टीन ने 20वीं सदी में आकर 'स्पेस-टाइम कॉन्टिनम' का सिद्धांत दिया था, जहां उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष और समय अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही चादर हैं। और हमारी उपनिषदों में, आज से हजारों साल पहले, एक भारतीय महिला, गार्गी जी, उसी स्पेस और टाइम के फैब्रिक पर सवाल कर रही थीं! वह जानना चाहती थीं कि यह पूरा ब्रह्मांड, चाहे वह किसी भी डायमेंशन में हो, और वह समय जो इसे भूत, वर्तमान और भविष्य की गति देता है, उन दोनों का आधार क्या है? वह कौन सा कैनवस है जिस पर यह पूरी फिल्म चल रही है? महर्षि याज्ञवल्क्य ने गार्गी के इस अत्यंत गूढ़ प्रश्न को सुना, उनकी बुद्धिमत्ता की मन ही मन सराहना की, और अत्यंत गंभीरता से उत्तर दिया, "हे गार्गी, यह सब कुछ— ऊपर, नीचे, बीच में, और भूत, भविष्य तथा वर्तमान— यह सब आकाश तत्व में ओत-प्रोत है।" साथियों, यहां महर्षि जिस 'आकाश' की बात कर रहे हैं, उसे कृपया हमें दिखने वाला नीला आसमान या बादलों वाली साधारण खाली जगह समझने की भूल मत कीजिएगा। इस आकाश तत्व को क्वांटम फिजिक्स की भाषा में 'क्वांटम वैक्यूम' (Quantum Vacuum), 'हिग्स फील्ड' (Higgs Field) या 'ईथर' (Aether) कहा जा सकता है। हमारे सनातन दर्शन के अनुसार, आकाश अत्यंत सूक्ष्म, अविनाशी और अनंत है। आप जल को अग्नि से सुखा सकते हैं, अग्नि को जल से बुझा सकते हैं, वायु को रोक सकते हैं, पृथ्वी को तोड़ सकते हैं। ये चारों तत्व आपस में क्रिया करते हैं, एक दूसरे को बदलते हैं और नष्ट करते हैं। लेकिन आकाश? आप स्पेस को कैसे तोड़ेंगे? आप आकाश को कैसे जलाएंगे? आकाश हमेशा अछूता रहता है। आकाश किसी क्रिया में भाग नहीं लेता, वह केवल एक बैकग्राउंड है, जो हर ब्रह्मांडीय घटना, हर जन्म और हर मृत्यु का मूक साक्षी है। वह किसी से प्रभावित नहीं होता।
याज्ञवल्क्य जी समझा रहे थे कि जो कुछ भी इस ब्रह्मांड में प्रकट हुआ है, चाहे वह ग्रह हों, तारे हों, समय का चक्र हो, या ब्लैक होल हों— वह सब इसी सूक्ष्मतम आकाश तत्व के गर्भ में ही मौजूद हैं। बिना इस आकाश तत्व के, किसी भी वस्तु या समय का कोई वजूद ही नहीं हो सकता। गार्गी जी को अपना पहला उत्तर मिल गया था। उन्हें समझ आ गया कि सब कुछ स्पेस और टाइम के फैब्रिक यानी सूक्ष्मतम आकाश तत्व में बुना है। लेकिन वह सत्य के अंतिम छोर तक जाना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने वह प्रश्न किया, जो उन्हें उस परम सत्य से मिलाने वाला था। दोस्तों, जब गार्गी को यह समझ आ गया कि भूत, वर्तमान, भविष्य और यह पूरी दुनिया 'आकाश तत्व' यानी खाली जगह (Space) में बुनी हुई है, तो उन्होंने महर्षि याज्ञवल्क्य से अपना दूसरा और सबसे आखिरी सवाल पूछा। यही वो सवाल था जिस पर पूरी दुनिया का ज्ञान टिका हुआ था। गार्गी ने पूछा, "हे महर्षि! अगर यह सारा ब्रह्मांड, तारे, समय और यह सब कुछ आकाश में टिका है, तो फिर वह अनंत आकाश किस पर टिका हुआ है? वह खाली जगह किसमें बुनी हुई है? इस दुनिया का असली कारण क्या है?" यह सवाल इतना गहरा था कि पूरी सभा की सांसें रुक गईं। महर्षि याज्ञवल्क्य ने गार्गी की तरफ एक गहरी शांति के साथ देखा और कहा, "हे गार्गी! यह आकाश तत्व जिसमें बुना हुआ है, ब्रह्मज्ञानी (यानी भगवान को जानने वाले) उसे 'अक्षर' कहते हैं।" अक्षर! दोस्तों, 'अक्षर' का मतलब क्या होता है? 'अ' का मतलब होता है 'नहीं', और 'क्षर' का मतलब होता है 'नष्ट होना' या 'बदलना'। यानी वह परम सत्य जिसका कभी नाश ना हो, जो कभी खत्म ना हो, और जो कभी ना बदले। याज्ञवल्क्य जी ने इसे बहुत ही आसान भाषा में गार्गी को समझाया। उन्होंने कहा, "गार्गी, यह अक्षर ना तो मोटा है ना पतला, ना छोटा है ना बड़ा। इसका कोई रंग नहीं है। यह आग की तरह जलता नहीं है, पानी की तरह गीला नहीं होता। इसकी कोई छाया नहीं है, इसके अंदर कोई गंध या स्वाद नहीं है। इसकी कोई आँख, कान या शरीर नहीं है। इसका ना कोई अंदर है और ना ही बाहर। यह किसी भी दूसरी चीज पर टिका हुआ नहीं है।" दोस्तों, जरा सोचिए! महर्षि हजारों साल पहले उस परम शक्ति के बारे में बता रहे थे, जिसका कोई रूप या आकार नहीं है। जिसे हम इंसान अपने छोटे से दिमाग से पूरी तरह से समझ भी नहीं सकते। फिर महर्षि याज्ञवल्क्य ने एक बहुत ही कमाल की बात कही। उन्होंने कहा, "हे गार्गी! इसी 'अक्षर' के आदेश से, इसी के बनाए गए कड़े नियमों से यह सूरज और चाँद अपनी-अपनी जगह पर टिके हुए हैं। इसी अक्षर के नियम से यह धरती और स्वर्ग एक दूसरे से जुड़े हैं। इसी के नियम से पल, मिनट, घंटे, दिन, रात, महीने और साल अपनी सही गति से चलते हैं।" साथियों, अगर इसे आज के विज्ञान की भाषा में समझें, तो महर्षि याज्ञवल्क्य बता रहे थे कि इस पूरी दुनिया को चलाने वाला एक 'यूनिवर्सल लॉ' (Universal Law) है। एक ऐसा पक्का नियम है जिससे पूरी दुनिया बिना किसी गलती के काम कर रही है। जैसे गुरुत्वाकर्षण (Gravity) का नियम है कि आप कोई भी चीज ऊपर फेकेंगे तो वह नीचे ही आएगी। पृथ्वी सूरज का चक्कर लगा रही है, दिन और रात अपने सही समय पर होते हैं। ये सारे नियम जिस परम शक्ति के कंट्रोल में हैं, वही 'अक्षर' है। महर्षि ने आगे कहा, "गार्गी, सबसे बड़ी बात यह है कि तुम इस अक्षर को अपनी आँखों से नहीं देख सकती, क्योंकि तुम्हारी आँखों के अंदर बैठकर देखने वाला भी वही है। तुम उसे कानों से सुन नहीं सकती, क्योंकि तुम्हारे कानों से सुनने वाला भी वही है। वह किसी और चीज से नहीं बना, बल्कि सब कुछ उसी से बना है। और ज्ञानियों ने इसी अक्षर ब्रह्म को 'ॐ' (OM) कहा है।" दोस्तों, जब महर्षि याज्ञवल्क्य ने भगवान के इस असली और सच्चे रूप के बारे में बताया, तो गार्गी जी पूरी तरह से संतुष्ट हो गईं। उन्हें वह परम ज्ञान मिल गया जिसकी उन्हें तलाश थी। वह समझ गईं कि भगवान कोई इंसान नहीं है जो बादलों पर बैठा हो, बल्कि वह तो एक ऐसी परम ऊर्जा है, एक ऐसा नियम है, जो इस ब्रह्मांड के हर एक कण में बसा हुआ है। गार्गी जी ने पूरे सम्मान के साथ महर्षि याज्ञवल्क्य को प्रणाम किया। इसके बाद वह राजा जनक और सभा में बैठे सभी महान ऋषियों की तरफ मुड़ीं और बहुत ही तेज और स्पष्ट आवाज में घोषणा की: "हे ब्राह्मणों! हे महान ऋषियों! आप सब मेरी बात ध्यान से सुनें। ब्रह्म यानी परम सत्य को जानने के इस महान शास्त्रार्थ में महर्षि याज्ञवल्क्य को कोई भी नहीं हरा सकता। यह साक्षात परम ज्ञानी हैं। आप लोगों के लिए यही बहुत बड़ी बात होगी कि आप इन्हें केवल प्रणाम कर लें।" गार्गी जी की इस अटल घोषणा के बाद पूरी सभा में किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि वह महर्षि याज्ञवल्क्य से कोई और सवाल पूछ सके। और इस तरह, ज्ञान, विज्ञान और तर्कों पर आधारित यह सबसे महान शास्त्रार्थ महर्षि याज्ञवल्क्य की जीत के साथ पूरा हुआ। साथियों, इस कहानी से हमें क्या सीखने को मिलता है? इससे हमें यह पता चलता है कि हमारा सनातन धर्म सिर्फ कहानियों पर नहीं टिका है। हमारे धर्म की जड़ें बहुत गहरी और वैज्ञानिक हैं। यहाँ भगवान को सिर्फ डर कर मानने के लिए नहीं कहा जाता, बल्कि भगवान को 'जानने' और 'समझने' के लिए कहा जाता है। बेझिझक होकर सवाल पूछने की आज़ादी और उन सवालों का विज्ञान और तर्क के नजरिए से जवाब देना, यही हमारे सनातन धर्म की असली खूबसूरती है। दोस्तों, मुझे उम्मीद है कि इस डॉक्यूमेंट्री के जरिए आप हमारे महान इतिहास की एक नई और वैज्ञानिक सच्चाई से जुड़े होंगे। आपको यह जानकारी और यह किस्सा कैसा लगा, यह मुझे कमेंट करके जरूर बताइयेगा। आपकी बातों और आपके विचारों का मुझे हमेशा इंतजार रहता है। मैं हूँ आपका दोस्त धर्मेन्द्र, और 'अध्यात्म गुरु की दुनिया' के इस सफर में मैं आगे भी आपके लिए ऐसे ही गहरे और रहस्यमयी विषय लेकर आता रहूंगा। तब तक के लिए, अपना और अपनों का ख्याल रखिए। जय श्री राम!
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