आखिर कौन हैं 17 चिरंजीवी

17 चिरंजीवी जो आज भी इस धरती पर निवास करते हैं तो आखिर कौन हैं वो 17 चिरंजीवी। आज हम समय की परतों को खोलकर एक ऐसा रहस्य आपके सामने रखने जा रहे हैं, जिसे सुनकर शायद आपको अपनी ही वास्तविकता पर संदेह होने लगे। जरा सोचिए, क्या यह संभव है कि जो धरती आज से हजारों-लाखों साल पहले थी, जिन योद्धाओं ने त्रेता और द्वापर युग में युद्ध लड़े, वे आज भी हमारे बीच, इसी कलयुग के शोर-शराबे से दूर, किसी एकांत में सांस ले रहे हों? पद्म पुराण का एक प्रसिद्ध श्लोक है: *"अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषण:। कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविन:॥"* आमतौर पर यह माना जाता है कि सनातन धर्म में केवल सात चिरंजीवी (अमर) हैं। लेकिन आज हम आपको जो कथा सुनाने जा रहे हैं, वह इस अधूरे सच को पूरा करेगी। हमारे वेदों, पुराणों और महाकाव्यों के गहरे अध्ययन से यह साक्ष्य मिलते हैं कि सात नहीं, बल्कि **17 चिरंजीवी हैं जो आज भी इस धरती पर निवास करते हैं। ये वे महान आत्माएं हैं जो देव अंश या मनुष्य रूप में पैदा हुईं, जिन्हें या तो उनके महान कर्मों के लिए अमरता का वरदान मिला, या फिर उनके किसी भयंकर पाप के लिए युगों-युगों तक इस धरती पर भटकने का श्राप।
आइए, एक दिव्य यात्रा पर चलते हैं और अध्याय दर अध्याय जानते हैं इन 17 अमर योद्धाओं, ऋषियों और अवतारों की अनकही कहानी, जो कलयुग के अंत और कल्कि अवतार के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। नम्बर 1 परशुराम, कल्पना कीजिए एक ऐसे योद्धा की, जिसके क्रोध से पूरी पृथ्वी कांप उठती थी। भगवान विष्णु के छठे अवतार, महर्षि जमदग्नि के पुत्र—परशुराम जी। वह सभी अस्त्रों-शस्त्रों और ब्रह्मांड के सबसे रहस्यमयी दिव्य हथियारों के स्वामी हैं। त्रेता युग में जब धरती पर अधर्मी राजाओं का अत्याचार चरम पर था, तब परशुराम जी ने अपने अजेय 'फरसे' (जिसे उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या करके प्राप्त किया था) से अधर्मियों का विनाश किया। आज परशुराम जी कहां हैं? साक्ष्यों के अनुसार, वह आज भी महेंद्र पर्वत की रहस्यमयी गुफाओं में गहन तपस्या में लीन हैं। कल्कि पुराण में यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि जब कलयुग अपने चरम पर होगा और भगवान विष्णु कल्कि अवतार लेंगे, तब परशुराम जी एक बार फिर उनके गुरु के रूप में प्रकट होंगे। वे ही कल्कि अवतार को दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की विद्या देंगे, ताकि भयंकर कलि पुरुष का वध किया जा सके। 2. रामदूत हनुमान जी, जब भी बात अमरता और असीम शक्ति की होती है, तो भगवान शिव के रुद्रावतार और श्री राम के परम भक्त हनुमान जी का नाम सबसे पहले आता है। रामायण काल में माता सीता की खोज से लेकर, लंका दहन और रावण वध तक, हनुमान जी ने श्री राम के हर कदम पर अपनी निष्काम सेवा दी। कहते हैं कि अशोक वाटिका में जब हनुमान जी ने माता सीता को श्री राम का संदेश दिया, तब माता सीता ने गदगद होकर उन्हें अजर-अमर होने का वरदान दिया था—*"अजर अमर गुन निधि सुत होहू।"* जब तक इस सृष्टि में राम का नाम लिया जाएगा, तब तक हनुमान जी जीवित रहेंगे। आज भी हनुमान जी को कलयुग का 'जागृत देवता' माना जाता है। साक्ष्य बताते हैं कि श्रीलंका के घने जंगलों में रहने वाले 'मातंग कबीले' के लोगों से हनुमान जी हर 41 साल में मिलने आते हैं और उन्हें ब्रह्म ज्ञान देते हैं। जब कलि पुरुष से कल्कि अवतार का अंतिम युद्ध होगा, तब हनुमान जी उनके मुख्य अंगरक्षक के रूप में रणभूमि में गदा लेकर फिर से उतरेंगे। 3. दानवीर राजा बलि,
प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र, असुर राज बलि। बलि इतने वीर थे कि उन्होंने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। जब वे स्वर्ग के स्वामी बनने के लिए अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तब देवताओं के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने 'वामन अवतार' (एक बौने ब्राह्मण) का रूप धरा। वामन देव ने राजा बलि से दान में केवल तीन पग भूमि मांगी। बलि के गुरु शुक्राचार्य ने उन्हें चेतावनी भी दी, लेकिन एक दानवीर पीछे कैसे हटता? जैसे ही बलि ने संकल्प लिया, वामन देव ने अपना आकार इतना विशाल कर लिया कि ब्रह्मांड छोटा पड़ गया। पहले पग में पूरी पृथ्वी और दूसरे में स्वर्ग नाप लिया। तीसरा पग रखने के लिए जगह नहीं बची, तो बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। वामन देव ने जैसे ही उनके सिर पर पैर रखा, बलि पाताल लोक पहुंच गए। उनकी इस असीम दानवीरता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अमरता का वरदान दिया और पाताल का राजा बना दिया। आज भी केरल में मनाए जाने वाले 'ओणम' पर्व के पीछे यही मान्यता है कि राजा बलि वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने आते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार, अगले कालचक्र (सतयुग) में राजा बलि ही स्वर्ग के नए इंद्र बनेंगे। 4. महर्षि वेदव्यास, अगर आज हम अपने धर्म, इतिहास और वेदों को जानते हैं, तो उसका श्रेय महर्षि वेदव्यास को जाता है। ऋषि पराशर और माता सत्यवती के पुत्र वेदव्यास केवल एक मुनि नहीं, बल्कि साक्षात भगवान विष्णु के ज्ञान अवतार माने जाते हैं। उन्होंने ही वेदों को चार भागों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) में विभाजित किया और अठारह पुराणों तथा 'महाभारत' जैसे महान महाकाव्य की रचना की। वेदव्यास जी एक दर्शक के रूप में महाभारत के हर पात्र और घटना के साक्षी रहे हैं। आज भी वे एक चिरंजीवी के रूप में सूक्ष्म रूप में जीवित हैं। आने वाले युग में वे नए सप्तऋषियों के मंडल में शामिल होंगे और कल्कि अवतार के आध्यात्मिक गुरुओं में से एक कहलाएंगे। 5. लंकाधिपति विभीषण, रावण का भाई होने के बावजूद विभीषण ने धर्म का मार्ग चुना। जब रावण ने माता सीता का हरण किया, तो विभीषण ने उन्हें बहुत समझाया, लेकिन रावण के अहंकार ने उन्हें लात मारकर लंका से निकाल दिया। विभीषण ने श्री राम की शरण ली। रावण की मृत्यु का रहस्य (नाभि में अमृत) श्रीराम को विभीषण ने ही बताया था। उनके इसी धर्म-परायण आचरण से प्रसन्न होकर श्री राम ने उन्हें अजर-अमर होने का वरदान दिया। आज भी विभीषण चिरंजीवी हैं और कलयुग के अंत में जब धर्म और अधर्म का महायुद्ध होगा, तब वह भी कल्कि अवतार के पक्ष में खड़े नजर आएंगे। 6. कुल गुरु कृपाचार्य, महर्षि गौतम के पुत्र शरद्वान और अप्सरा जानपदी के पुत्र कृपाचार्य, जिनका जन्म एक असाधारण तरीके से हुआ था। राजा शांतनु ने उन्हें वन में पाकर गोद लिया था। कृपाचार्य कुरुवंश के राजगुरु बने। उन्होंने कौरवों और पांडवों, दोनों को समान रूप से शिक्षा दी। वे पूर्ण रूप से निष्पक्ष और तटस्थ थे। महाभारत के युद्ध में उन्होंने कौरवों की ओर से लड़ाई लड़ी, लेकिन वे उन गिने-चुने महारथियों में से एक थे जो इस भयंकर प्रलय के बाद भी जीवित बच गए। उनकी निष्पक्षता और धर्म के प्रति सत्यनिष्ठा के कारण उन्हें चिरंजीवी होने का वरदान मिला।
7. श्रापित योद्धा अश्वत्थामा, यह कहानी सबसे ज्यादा दर्दनाक है। गुरु द्रोणाचार्य ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी, जिसके बाद उन्हें शिव के रुद्रांश के रूप में अश्वत्थामा पुत्र रूप में प्राप्त हुए। अश्वत्थामा के माथे पर जन्म से ही एक दिव्य मणि थी, जो उन्हें भूख, प्यास, थकान और हर अस्त्र-शस्त्र से सुरक्षित रखती थी।
महाभारत युद्ध के अंत में, अपने पिता की छल से हुई मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए अश्वत्थामा ने रात के अंधेरे में पांडवों के शिविर पर हमला किया और उनके सोते हुए पुत्रों का वध कर दिया। इतना ही नहीं, उसने अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु (परीक्षित) पर 'ब्रह्मास्त्र' चला दिया। इस कायरतापूर्ण कृत्य पर भगवान श्री कृष्ण का क्रोध फूट पड़ा। उन्होंने अश्वत्थामा के माथे से वह दिव्य मणि निकाल ली और उसे एक खौफनाक श्राप दिया: *"तुम 3000 वर्षों से भी अधिक समय तक इस धरती पर भटकोगे। तुम्हारे शरीर से पीब और रक्त बहेगा, तुम मृत्यु मांगोगे, लेकिन मृत्यु तुम्हें नहीं मिलेगी।"* कहा जाता है कि आज भी मध्य प्रदेश के असीरगढ़ किले और नर्मदा नदी के आसपास के जंगलों में एक बहुत ऊंचे कद का व्यक्ति भटकता है, जिसके माथे से खून रिसता रहता है। लेकिन भविष्य मालिका की भविष्यवाणियां कहती हैं कि जब कल्कि अवतार होगा, तब अश्वत्थामा को उनके पापों से मुक्ति मिलेगी। उनकी मणि उन्हें लौटाई जाएगी, और वह अंतिम बार धर्म के पक्ष से लड़कर अपना उद्धार करेंगे।
ये तो थे वे सात चिरंजीवी जिन्हें दुनिया जानती है, लेकिन अब कहानी उस गहराई में उतरती है जहां बाकी 10 अमर आत्माओं का रहस्य छिपा है। 8. ऋक्षराज जाम्बवंत, ब्रह्मा जी के जम्हाई लेने से प्रकट हुए जाम्बवंत जी, जो सतयुग से लेकर द्वापर युग तक जीवित रहे। रामायण में उन्होंने राम-रावण युद्ध में सेनापति की भूमिका निभाई। लेकिन द्वापर युग में स्यमंतक मणि को लेकर उनका भगवान श्री कृष्ण से एक गुफा में भयंकर युद्ध हुआ। 28 दिनों तक चले इस युद्ध में जब जाम्बवंत थकने लगे, तब उन्हें अहसास हुआ कि उनके सामने कोई और नहीं, बल्कि उनके अराध्य श्री राम ही कृष्ण रूप में खड़े हैं। अपनी भूल का प्रायश्चित करते हुए उन्होंने अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह कृष्ण जी से कर दिया। आज भी वे किसी गुप्त गुफा में चिरंजीवी के रूप में निवास करते हैं। 9. महर्षि मार्कंडेय, महादेव के परम भक्त। जब उनका जन्म हुआ, तो भगवान शिव ने उनके पिता से पूछा था कि तुम्हें 100 वर्ष का मूर्ख पुत्र चाहिए या 16 वर्ष का महाज्ञानी? पिता ने ज्ञानी पुत्र मांगा। जब मार्कंडेय 16 वर्ष के हुए, तो यमदूत उनके प्राण लेने आए। लेकिन मार्कंडेय शिवलिंग से लिपट गए और उन्होंने उस समय 'महामृत्युंजय मंत्र' की रचना की। स्वयं यमराज आए, लेकिन भगवान शिव प्रकट हो गए और यमराज को खाली हाथ लौटना पड़ा। शिव जी ने मार्कंडेय को कल्प के अंत तक चिरंजीवी होने का वरदान दिया। आज भी वे अपनी तपस्या में लीन हैं। 10. राजा देवापी, कुरुवंश के राजा प्रतीप के पुत्र और राजा शांतनु के बड़े भाई देवापी। कुछ शारीरिक दोषों के कारण उन्हें राजसिंहासन नहीं मिला, तो वे तपस्या करने वन में चले गए। पुराणों के अनुसार, देवापी आज भी सुमेरु पर्वत के कलाप ग्राम में एक योगी के रूप में जीवित हैं। जब कलयुग अपने अंत पर होगा, तब देवापी वापस लौटकर सतयुग में पुनः 'चंद्रवंश' की स्थापना करेंगे। 11: सृष्टि के पितामह - महर्षि कश्यप दोस्तों, जब हम बचे हुए सात चिरंजीवियों की बात करते हैं, तो वे कोई और नहीं बल्कि हमारे वर्तमान मन्वंतर के 'सप्तऋषि' हैं। इनमें सबसे पहला नाम आता है महर्षि कश्यप का। जरा सोचिए, आज हम धरती पर जो कुछ भी देखते हैं—देवता, असुर, नाग, गरुड़, यक्ष, किन्नर और यहाँ तक कि संपूर्ण मानव जाति—इन सबकी उत्पत्ति कहाँ से हुई? साक्ष्य बताते हैं कि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप ही वह प्रजापति हैं, जिनसे इस पूरी सृष्टि का विस्तार हुआ। उनकी 13 पत्नियाँ थीं, जिनमें अदिति से देवताओं का और दिति से दैत्यों का जन्म हुआ। महर्षि कश्यप का तपोबल इतना असीम था कि उन्होंने अपने ज्ञान से सृष्टि के संतुलन को बनाए रखा। वे एक चिरंजीवी के रूप में आज भी अंतरिक्ष के किसी अज्ञात आयाम में मौजूद हैं। कलयुग के अंत में जब पूरी मानव जाति विनाश के कगार पर होगी, तब महर्षि कश्यप अपने उसी पितामह स्वरूप में कल्कि अवतार के साथ खड़े होंगे, ताकि प्रलय के बाद एक नई, शुद्ध और धर्म-परायण सृष्टि की नींव फिर से रखी जा सके। 12: जिन्होंने त्रिदेवों को बालक बना दिया - महर्षि अत्रि=सप्तऋषियों के मंडल में दूसरे चिरंजीवी हैं—महर्षि अत्रि। वे ब्रह्मा जी के नेत्रों से उत्पन्न हुए थे। महर्षि अत्रि की कहानी केवल उनके ज्ञान की नहीं, बल्कि उनकी पत्नी माता अनुसूया के असीम पातिव्रत्य धर्म की भी है। श्रीमद्भागवत पुराण में एक अत्यंत रोचक साक्ष्य मिलता है। जब माता अनुसूया की परीक्षा लेने के लिए स्वयं त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) साधु वेश में उनके आश्रम आए और बिना वस्त्र के भिक्षा मांगने लगे, तब महर्षि अत्रि के तपोबल और माता अनुसूया के सतीत्व ने उन तीनों महाशक्तियों को छोटे-छोटे शिशुओं में बदल दिया था। इसी असीम शक्ति और भक्ति के कारण महर्षि अत्रि को अमरता प्राप्त हुई। वे आज भी चिरंजीवी अवस्था में अपने ज्ञान की रश्मियां ब्रह्मांड में फैला रहे हैं। जब सतयुग का सवेरा होगा, तब वे मनुष्य को फिर से 'कर्म और परिवार' का सही अर्थ सिखाने के लिए धरती पर प्रत्यक्ष रूप से अवतरित होंगे। 13: धैर्य और क्षमा के सर्वोच्च प्रतीक - महर्षि वशिष्ठ सप्तऋषियों में तीसरा स्थान महर्षि वशिष्ठ का है, जो रघुकुल (सूर्यवंश) के कुलगुरु थे। भगवान श्री राम ने भी इन्हीं से वेद और शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण की थी। महर्षि वशिष्ठ केवल एक गुरु नहीं थे; वे क्षमा और सहनशीलता की एक जीती-जागती मिसाल थे। उनके पास 'कामधेनु' और 'नंदिनी' जैसी दिव्य गाएं थीं, जो पलक झपकते ही पूरी सेना का पेट भर सकती थीं। महर्षि विश्वामित्र ने जब बलपूर्वक नंदिनी गाय को ले जाना चाहा और वशिष्ठ जी के सौ पुत्रों का वध कर दिया, तब भी महर्षि वशिष्ठ ने अपना आपा नहीं खोया। उन्होंने क्रोध के बदले क्षमा को चुना। उनका यही गुण उन्हें अमर बनाता है। एक चिरंजीवी के रूप में महर्षि वशिष्ठ आज भी ब्रह्मांड में 'अरुंधती' तारे के साथ विराजमान हैं। कल्कि अवतार को धर्म और शांति का गूढ़ अर्थ समझाने के लिए, युद्ध के पश्चात वशिष्ठ जी का मार्गदर्शन सबसे अहम होने वाला है। 14: संकल्प की शक्ति और गायत्री मंत्र के रचयिता - महर्षि विश्वामित्र
दोस्तों, अब बात करते हैं चौथे सप्तऋषि की, जिनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि इंसान का दृढ़ संकल्प उसके भाग्य की रेखाएं भी बदल सकता है—महर्षि विश्वामित्र। विश्वामित्र जन्म से ब्राह्मण नहीं, बल्कि एक क्षत्रिय राजा (कौशिक) थे। लेकिन जब उन्हें एहसास हुआ कि आध्यात्मिक शक्ति और ब्रह्मज्ञान के आगे भौतिक अस्त्र-शस्त्र कुछ भी नहीं हैं, तो उन्होंने हजारों वर्षों की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या इतनी भयानक थी कि स्वर्ग का राजा इंद्र भी कांप उठा था। मेनका जैसी अप्सराएं भी उनके संकल्प को पूरी तरह नहीं तोड़ पाईं। अंततः उन्होंने अपने तपोबल से वह मुकाम हासिल किया जो असंभव था—वे 'ब्रह्मर्षि' कहलाए। इतना ही नहीं, उन्होंने ही हमें वह महामंत्र दिया जो आज भी सनातन धर्म की आत्मा है—**गायत्री मंत्र**। विश्वामित्र का चिरंजीवी स्वरूप हमें बताता है कि कलयुग के उस घोर अंधकार में जब लोग अपना कर्म भूल जाएंगे, तब विश्वामित्र जी कल्कि अवतार की सेना में संकल्प और तेज भरने का कार्य करेंगे। 15: न्याय के प्रणेता और गोदावरी के उद्गमकर्ता - महर्षि गौतम
सप्तऋषियों की सूची में पांचवें स्थान पर हैं—महर्षि गौतम। रामायण काल में अहिल्या के उद्धार की कहानी तो आपने सुनी ही होगी। महर्षि गौतम वही महान ऋषि थे जिन्होंने अपनी पत्नी अहिल्या को श्राप दिया था, लेकिन साथ ही उनके उद्धार का मार्ग (श्री राम के चरणों की धूल) भी बताया था। गौतम ऋषि न्याय, धर्म और कठोर अनुशासन के प्रतीक हैं। साक्ष्यों के अनुसार, जब धरती पर भयानक सूखा पड़ा था, तब महर्षि गौतम ने ही भगवान शिव की घोर आराधना करके 'गोदावरी नदी' (जिसे गौतमी गंगा भी कहा जाता है) को धरती पर प्रकट किया था, ताकि लोगों की प्यास बुझ सके। महर्षि गौतम आज भी सूक्ष्म रूप में इस ब्रह्मांड में मौजूद हैं। जब कलयुग में प्राकृतिक आपदाएं अपने चरम पर होंगी और नदियां सूख जाएंगी, तब महर्षि गौतम फिर से प्रकट होकर प्रकृति और मनुष्य के बीच का संतुलन स्थापित करेंगे। 16: अस्त्र और शास्त्रों के ज्ञाता - महर्षि जमदग्नि
छठे चिरंजीवी सप्तऋषि हैं—महर्षि जमदग्नि। जो केवल अपने ज्ञान के लिए नहीं, बल्कि अपने प्रचंड तेज और क्रोध के लिए भी जाने जाते थे। ये भगवान परशुराम जी के पिता थे। महर्षि जमदग्नि के पास न केवल वेदों का अथाह ज्ञान था, बल्कि वे दिव्य अस्त्रों-शस्त्रों के भी बहुत बड़े ज्ञाता थे। जब हैहय वंश के राजा सहस्त्रबाहु ने उनके आश्रम को नष्ट कर दिया और कामधेनु गाय का हरण किया, तब इसी घटना ने परशुराम जी के क्रोध को जन्म दिया था। महर्षि जमदग्नि ने अपने जीवन में यह सिद्ध किया कि एक ब्राह्मण या तपस्वी केवल ग्रंथों का ज्ञानी नहीं होता, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर वह शस्त्र विद्या का भी जनक हो सकता है। वे आज भी अमर अवस्था में हैं और सतयुग की नई पीढ़ी को वेद और अस्त्र विद्या का संतुलित ज्ञान देने के लिए अपनी प्रतीक्षा पूरी कर रहे हैं।
17: आयुर्वेद और विज्ञान के जनक - महर्षि भारद्वाज
और अब, सातवें और अंतिम सप्तऋषि—महर्षि=भारद्वाज। दोस्तों, आज की आधुनिक दुनिया जिस विज्ञान, एविएशन (विमानन) और मेडिकल साइंस पर गर्व करती है, महर्षि भारद्वाज ने आज से हजारों-लाखों साल पहले उन रहस्यों को अपने ग्रंथों में लिख दिया था। वे 'आयुर्वेद' के सबसे बड़े जानकारों में से एक थे। इसके साथ ही, 'विमान शास्त्र' (Yantra Sarvasva) की रचना भी महर्षि भारद्वाज ने ही की थी, जिसमें उन्होंने ऐसे-ऐसे विमानों का वर्णन किया है जो एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जा सकते थे। त्रेता युग में वनवास के दौरान भगवान श्री राम ने प्रयागराज में इनके आश्रम में विश्राम किया था। महर्षि भारद्वाज एक ऐसे चिरंजीवी हैं जिनका ज्ञान आज भी जीवित है। कलयुग के नष्ट होने के बाद जब दुनिया की सारी तकनीक और विज्ञान खाक हो जाएगा, तब सतयुग में शून्य से फिर से विज्ञान और आयुर्वेद की शुरुआत महर्षि भारद्वाज ही करेंगे। तो मेरे दोस्तों, ये हैं वो 17 चिरंजीवी—योध्दा, राजा, भक्त और वे सात महाऋषि (सप्तऋषि)—जो इस समय धरती के अलग-अलग कोनों, गुफाओं, पर्वतों और ब्रह्मांड के अलग-अलग आयामों में निवास कर रहे हैं।
ये सिर्फ पौराणिक पात्र नहीं हैं, बल्कि ये समय के वो प्रहरी हैं जिन्हें ब्रह्मांड ने एक विशेष कार्य के लिए बचा कर रखा है। जब कलि पुरुष अपनी चरम सीमा पर होगा, जब धरती पर चारो तरफ हाहाकार मचेगा, तब भगवान विष्णु के कल्कि अवतार के साथ ये 17 महाशक्तियां एकजुट होंगी। परशुराम और अश्वत्थामा अस्त्र उठाएंगे, हनुमान और जाम्बवंत गदा घुमाएंगे, और ये सप्तऋषि अपने तपोबल से एक अभेद्य सुरक्षा चक्र बनाएंगे।
कलयुग का अंत तय है, और उसके बाद ये ही चिरंजीवी मिलकर पुनः एक नए चक्र की तरफ प्रस्थान करेंगे—जो होगा **सतयुग**। इस रहस्यमयी और गहरी विषय-वस्तु पर आपका क्या मानना है? क्या आपको लगता है कि हम उस महायुद्ध के बहुत करीब पहुँच चुके हैं? कमेंट बॉक्स में मैं, आपका दोस्त धर्मेंद्र, आपकी राय का इंतज़ार करूँगा। अगर आपको हमारी यह खास डॉक्यूमेंट्री, यह 1 घंटे की महा-कथा अच्छी लगी है, तो इसे सिर्फ अपने तक मत रखिएगा। इसे लाइक कीजिए, हमारे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए और ज्यादा से ज्यादा लोगों के साथ शेयर कीजिए। मिलेंगे अगली बार एक नए रहस्य, एक नए साक्ष्य और एक नई खास डॉक्यूमेंट्री के साथ। तब तक के लिए अपना ख्याल रखें, और देखते रहें... **अध्यात्म गुरु की दुनिया**।
धन्यवाद!

टिप्पणियाँ