अर्जुन का पाताल लोक रहस्यमई यात्रा
बचपन से लेकर आज तक, जब भी 'पाताल लोक' का नाम आता है, तो हमारे दिमाग में क्या छवि बनती है? एक भयंकर, खौफनाक और अंधकार से भरी हुई जगह। एक ऐसा नर्क जहां खौलते हुए तेल के विशाल कढ़ाहे हैं, जहां पापी आत्माओं को रोंगटे खड़े कर देने वाली यातनाएं दी जाती हैं, जहां भयानक सींगों वाले राक्षस हैं और जहां सिर्फ दर्दनाक चीखें गूंजती हैं। सदियों से हमारे जहन में यह डर बिठाया गया है। लेकिन मेरे दोस्तों, अगर मैं आपसे कहूं कि यह अब तक का बोला गया सबसे बड़ा झूठ है? अगर मैं पूरे दावे के साथ कहूं कि हमारे ही वेदों, पुराणों और प्राचीन ग्रंथों में जिस पाताल लोक का वास्तविक और गूढ़ वर्णन किया गया है, वह कोई नर्क नहीं बल्कि आज की हमारी 21वीं सदी की आधुनिक और एडवांस दुनिया से भी लाखों-करोड़ों गुना अधिक विकसित, चमत्कारी और सुंदर आयाम है? कल्पना कीजिए एक ऐसे अंडरग्राउंड ब्रह्मांड की जहां सूर्य की तपिश या चंद्रमा की चांदनी की कोई आवश्यकता ही नहीं है। क्योंकि वहां की गगनचुंबी इमारतें, वहां के रहस्यमयी रास्ते और वहां के निवासियों के मुकुटों में जड़ी अलौकिक मणियों का प्रकाश चौबीसों घंटे उस पूरी दुनिया को जगमगाता रहता है। एक ऐसी सभ्यता जिसका विज्ञान, जिनकी तकनीक, जिनकी जेनेटिक इंजीनियरिंग और जिनका स्पेस-टाइम का ज्ञान आज के हमारे क्वांटम फिजिक्स और मॉडर्न साइंस के लिए भी एक ऐसी पहेली है जिसे सुलझाने में शायद हमें हजारों साल और लग जाएं। आज हम उसी पाताल लोक, उसी खोखली पृथ्वी और उस महागाथा के पन्ने बहुत गहराई से पलटेंगे, जिसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।
इस महा-डॉक्यूमेंट्री की शुरुआत होती है आज से हजारों साल पहले, द्वापर युग में, महाभारत के आदि पर्व के उस रहस्यमयी कालखंड से। यह वह समय था जब धरती के सर्वश्रेष्ठ और अजेय धनुर्धर, पांडुपुत्र अर्जुन एक बहुत ही अजीब और कठोर परिस्थिति से गुजर रहे थे। अपने ही बनाए एक कड़े नियम के उल्लंघन के कारण, अर्जुन 12 वर्ष के कठिन वनवास और अखंड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रहे थे। सोचिए उस व्यक्ति की मानसिकता को, जिसके बाहुबल से देवता भी खौफ खाते थे, जिसके पास दुनिया के सबसे विध्वंसक अस्त्र थे, वह अपना राजसी ठाट-बाट, अपने रेशमी वस्त्र और अपना मुकुट त्याग कर एक साधारण सन्यासी की तरह जंगलों, बीहड़ों और तीर्थों की खाक छान रहा था। अपने इसी प्रायश्चित और तीर्थाटन के दौरान, भटकते हुए अर्जुन हिमालय की तलहटी में स्थित एक अत्यंत पावन, लेकिन रहस्यों से घिरी जगह पर पहुंचे। इस जगह को ग्रंथों में 'गंगा द्वार' कहा गया है, जिसे आज हम आधुनिक दुनिया में हरिद्वार के नाम से जानते हैं। वह रात कोई साधारण रात नहीं थी। वह बेहद शांत लेकिन एक अजीब से रहस्य से भरी हुई रात थी। आकाश में अनगिनत तारे टिमटिमा रहे थे, परंतु धरती पर एक ऐसा सन्नाटा पसरा था जो काटने को दौड़ता था। उस गहरी निस्तब्धता को सिर्फ मां गंगा की तेज, उफनती और बर्फीली लहरों की कलकल करती आवाज़ ही चीर रही थी। उस रात की हवा में एक ऐसा भारीपन था, एक ऐसा खिंचाव था मानो प्रकृति स्वयं किसी बहुत बड़ी ब्रह्मांडीय घटना, किसी इंटर-डायमेंशनल यात्रा के शुरू होने की प्रतीक्षा कर रही हो। अर्जुन, जिनका पूरा अस्तित्व उस वक्त तपस्या, पश्चाताप और ईश्वर की गहरी भक्ति की अग्नि में तप रहा था, उन्होंने अपने मन और शरीर की पूर्ण शुद्धि के लिए उसी आधी रात के घुप अंधेरे में गंगा की उस बर्फीली और तेज जलधारा में स्नान करने का निश्चय किया। उन्होंने किनारे पर अपने वस्त्र रखे, अपने मन को एकाग्र किया और आंखें मूंदकर उस कंपा देने वाले ठंडे जल में एक गहरी डुबकी लगा ली। लेकिन दोस्तों, जैसे ही अर्जुन का सिर पानी की सतह के नीचे गया, भौतिक विज्ञान के सारे नियम टूट गए। कुछ ऐसा घटित हुआ जिसकी इस महान योद्धा ने अपने सबसे भयानक सपनों में भी कल्पना नहीं की थी। पानी के भीतर जो एक प्राकृतिक शांति और शून्यता होनी चाहिए थी, उसकी जगह अचानक अर्जुन को महसूस हुआ कि किसी असीमित, विशाल और अदृश्य बल ने उनके पैरों को लोहे की जंजीरों की तरह जकड़ लिया है। यह कोई मगरमच्छ, विशालकाय मछली या जल में रहने वाला कोई साधारण हिंसक जीव नहीं था। यह एक ऐसा खौफनाक गुरुत्वाकर्षण खिंचाव था, एक ऐसी मैग्नेटिक फोर्स थी जिसने अर्जुन जैसी असीम शारीरिक ताकत को एक ही माइक्रो-सेकंड में शून्य कर दिया। दुनिया का वह अजेय योद्धा, जिसकी पकड़ से बड़े-बड़े दानव और महारथी नहीं बच पाते थे, आज पानी के भीतर एक सूखे पत्ते की तरह बेबस और लाचार था। वह रहस्यमयी ताकत अर्जुन को गंगा की अथाह गहराई में, पाताल की ओर नीचे और नीचे खींचती चली जा रही थी।
पानी के भीतर अब भयंकर घुप अंधेरा छा चुका था। सतह से आने वाली तारों की हल्की रोशनी बहुत पीछे छूट गई थी। पानी का दबाव बढ़ने लगा था। अर्जुन की सांस घुटने लगी थी। ऑक्सीजन की भारी कमी से उनके फेफड़ों की नसें फटने की कगार पर आ गई थीं। उस महान योद्धा के मन में पहली बार मौत का खौफ नहीं, बल्कि एक अजीब से 'अज्ञात' का खौफ पनपने लगा था। क्या यही अर्जुन का अंत था? क्या दुनिया का सबसे बड़ा धनुर्धर बिना कोई युद्ध लड़े गंगा की इन ठंडी गहराइयों में हमेशा के लिए दफन हो जाएगा? सांसें बस उखड़ने ही वाली थीं, आंखों के आगे मौत का अंधेरा छाने ही वाला था कि तभी गहराई के उस घनघोर अंधकार में एक ऐसा अकल्पनीय चमत्कार हुआ जो आज के विज्ञान की समझ से पूरी तरह बाहर है। अचानक अर्जुन के शरीर के इर्द-गिर्द एक जादुई, नीले रंग की ऊर्जा का एक अभेद्य सुरक्षा कवच बन गया। पानी का वह जानलेवा दबाव, वह दमघोंटू एहसास एक ही पल में एक अजीब सी शीतल शांति में बदल गया। अर्जुन ने घबराहट में अपने फेफड़ों में सांस खींचने का प्रयास किया और वह पूरी तरह से अवाक रह गए। उनके फेफड़े पानी के अंदर भी बिल्कुल वैसे ही काम कर रहे थे जैसे वे खुली हवा में किसी पहाड़ की चोटी पर करते हैं। उन्हें पानी के भीतर ऑक्सीजन प्राप्त हो रही थी। यह कोई प्राकृतिक चमत्कार या दैवीय माया नहीं थी। यह पाताल लोक की राजकुमारी, नाग कन्या उलूपी द्वारा रचा गया एक अत्यधिक उन्नत, बायोलॉजिकल और मायावी जाल था। उलूपी के रहस्यमयी रसायनों और उन्नत जेनेटिक विज्ञान ने अर्जुन के शरीर के डीएनए को कुछ पलों के लिए पानी के पूरी तरह अनुकूल बना दिया था। अब अर्जुन डूब नहीं रहे थे। अब वे एक ऐसे डायमेंशन की यात्रा की ओर बढ़ रहे थे जो इंसानी दुनिया की सभी भौतिक सीमाओं को पार कर जाने वाली थी। दोस्तों, इस रोमांचक सफर में आगे बढ़ने और पाताल लोक के उस हाई-टेक साम्राज्य के दरवाजे खोलने से पहले, एक छोटी सी बात। अगर आपको हमारी यह डॉक्यूमेंट्री और यह गहरा रहस्य पसंद आ रहा है, तो इस वीडियो को अभी लाइक कर दें और मेरे इंस्टाग्राम 🆔 को भी जरूर फॉलो कर लें। आप लोगों का साथ ही मुझे ऐसी और गहरी रिसर्च करने की हिम्मत देता है। डिस्क्रिप्शन में लिंक दिया हुआ है, उसे भी आप फॉलो कर लीजिए। चलिए, अब हम अपनी चेतना को वापस पाताल की गहराइयों में ले चलते हैं। कुछ ही पलों के बाद, वह तेज रहस्यमयी खिंचाव अचानक थम गया। अर्जुन को महसूस हुआ कि अब वह जल के भीतर तैर नहीं रहे हैं, बल्कि उनके दोनों पैर किसी बहुत ही ठोस, चिकनी और धातु जैसी सतह पर टिक गए हैं। उन्होंने बहुत धीरे-धीरे अपनी पलकें खोलीं। और उनके सामने जो विहंगम और खौफनाक हद तक सुंदर नजारा था, उसने अर्जुन की सोच के, उनके दिमाग के सारे दायरे हमेशा के लिए तोड़ दिए। उन्होंने सोचा था कि मौत के बाद वह किसी अंधेरी, दमघोंटू गुफा, किसी कीचड़ से भरी सुरंग या किसी डरावने नर्क में गिरेंगे। परंतु उनकी आंखें एक ऐसे विशालकाय, सूखे और चमचमाते हुए आयाम में खुलीं जिसकी कोई सीमा, कोई क्षितिज नजर ही नहीं आ रहा था। जब अर्जुन ने अपना सिर ऊपर उठाया, तो वहां कोई नीला आसमान नहीं था, वहां कोई बादल नहीं तैर रहे थे, बल्कि हजारों फीट ऊपर एक अनंत गुफा की छत थी जो किसी चमत्कारी और पारदर्शी धातु से निर्मित लग रही थी। लेकिन जिस बात ने अर्जुन को सबसे ज्यादा झकझोर कर रख दिया, वह थी वहां की रोशनी। ना तो वहां दिन करने वाला कोई विशाल सूरज था, और ना ही रात को रोशन करने वाला कोई चांद। फिर भी, वह पूरी की पूरी अंडरग्राउंड दुनिया दोपहर की चिलचिलाती धूप से भी ज्यादा स्पष्ट और उज्जवल थी। यह कोई आग, मशाल या लावे की जलती हुई रोशनी नहीं थी। यह एक बेहद ठंडी, आंखों को एक अजीब सा सुकून देने वाली और रहस्यमयी नीली-सफेद चमक थी। यह अकल्पनीय प्रकाश वहां बनी हुई गगनचुंबी इमारतों, महलों की छतों, रास्तों और वहां मौजूद उच्च कोटि के नागों के मुकुटों में जड़ी विशालकाय 'नाग मणियों' से आ रहा था। दोस्तों, यह कोई साधारण चमकने वाले पत्थर नहीं थे। यह आज के विज्ञान की भाषा में कहें तो 'कोल्ड फ्यूजन' (Cold Fusion) या किसी असीमित न्यूक्लियर ऊर्जा का स्रोत था। वे मणियां बिना एक भी कतरा गर्मी या रेडिएशन पैदा किए पूरे के पूरे अंडरग्राउंड साम्राज्य को एक समान रोशनी से नहला रही थीं। वहां किसी भी चीज की कोई परछाई नहीं बन रही थी। वहां अंधकार का कोई कोना मौजूद ही नहीं था। अर्जुन उस नजारे को देखकर एक बुत की तरह स्तब्ध खड़े थे। बचपन से उनके मन में पाताल को लेकर जो नर्क का भ्रम बैठा हुआ था, वह एक ही सेकंड में कांच की तरह चकनाचूर हो गया था। उन्होंने धरती पर देवराज इंद्र के समान वैभवशाली हस्तिनापुर देखा था, उन्होंने मयासुर द्वारा बनाए गए जादुई इंद्रप्रस्थ के महल देखे थे, लेकिन पाताल लोक के उस आर्किटेक्चर के सामने इंसानों के वे सबसे महान शहर किसी आदिमानव की गुफा जैसे लग रहे थे।
वहां की सड़कें कीमती रत्नों और ऐसी धातुओं से जड़ी थीं जिन्हें धरती के विज्ञान ने कभी देखा तक नहीं था। हवा में एक अलौकिक सुगंध तैर रही थी जो सीधे दिमाग की नसों को शांत कर रही थी। हर एक चीज इतनी परफेक्ट, इतनी स्वच्छ और इतनी ज्यामितीय (Geometrical) आकार में थी कि देवताओं का स्वर्ग भी उसके आगे फीका पड़ जाए। यह कोई डरने या सजा पाने की जगह नहीं थी। यह तो वास्तुकला, विज्ञान, अध्यात्म और सौंदर्य का वह चरम शिखर था जहां तक इंसानी बुद्धि के पहुंचने में अभी लाखों साल और लगेंगे।
दुनिया के सर्वश्रेष्ठ योद्धा को अब समझ में आ रहा था कि उसे अगवा करके किसी काल कोठरी में नहीं लाया गया है, बल्कि उसे ब्रह्मांड के सबसे उन्नत, सबसे छिपे हुए और रहस्यमयी साम्राज्य के बिल्कुल बीचों-बीच लाकर खड़ा कर दिया गया है। अर्जुन अभी उस अलौकिक दृश्य को देखकर सदमे में ही थे कि तभी उनके कानों में किसी के कदमों की हल्की सी आहट गूंजी। उन्होंने सतर्क होकर पलट कर देखा तो उनके सामने एक स्त्री खड़ी थी। बचपन से कहानियों में अर्जुन ने नागों के बारे में जो सुन रखा था कि वे खूंखार होते हैं, डरावने होते हैं, विषैले और इंसानों को खाने वाले होते हैं... वह छवि एक ही पल में धरी की धरी रह गई। उनके सामने कोई डरावनी, रेंगने वाली नागिन नहीं, बल्कि एक बेहद खूबसूरत, तेजस्विनी, और एक ईश्वरीय आभा से भरी हुई स्त्री खड़ी थी। उसके चेहरे पर एक ऐसी अजीब सी शांति थी जो सिर्फ गहरे ध्यान से आती है, और उसकी आंखों में पूरे ब्रह्मांड का गहरा ज्ञान झलक रहा था। उस स्त्री ने बड़े ही सम्मान के साथ अर्जुन को प्रणाम किया और अपना परिचय देते हुए कहा कि वह नागराज कौरव्य की पुत्री 'उलूपी' है।
उलूपी ने अर्जुन के चेहरे पर तैर रहे आश्चर्य और भ्रम को भांप लिया। उसने मुस्कुराकर अपनी गहरी और शांत आवाज़ में बताया कि, "हे श्रेष्ठ धनुर्धर, आप इस समय पाताल के सातवें और सबसे सुरक्षित तल में हैं। ऊपर धरती पर रहने वाले इंसानों को लगता है कि उनके पैरों के नीचे सिर्फ मिट्टी, लावा और नर्क है। लेकिन असल में धरती के नीचे सात अलग-अलग डायमेंशन या आयाम मौजूद हैं—अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और सबसे अंत में यह पाताल, जिसे हम नागलोक भी कहते हैं। इसके बाद उलूपी अर्जुन को उस विशाल अंडरग्राउंड साम्राज्य के एक बहुत बड़े भ्रमण पर ले गई। और दोस्तों, जैसे-जैसे अर्जुन उन रहस्यमयी रास्तों पर आगे बढ़े, उनका इंसानी अहंकार और उनके युग का सारा ज्ञान बौना पड़ता चला गया। यह वह दुनिया थी जहां का विज्ञान आज के हमारे मॉडर्न साइंस और भविष्य के सबसे एडवांस 'साइ-फाई' (Sci-Fi) विजन से भी लाखों साल आगे था। उलूपी ने उन्हें ऐसे विशालकाय महल दिखाए जो हवा में तैर रहे थे। महान विश्वकर्मा और दानवराज मयासुर द्वारा डिजाइन की गई वे इमारतें गुरुत्वाकर्षण (Gravity) के सभी नियमों को पूरी तरह से झुठला रही थीं। अर्जुन ने देखा कि धरती के नीचे बनी हुई विशालकाय, पारदर्शी और चमकदार सुरंगों के भीतर से कुछ मायावी विमान (Vimanas) बिना एक भी आवाज़ किए, बिना कोई धुआं छोड़े पलक झपकते ही एक लोक से दूसरे लोक की यात्रा कर रहे थे। वहां जानवरों द्वारा खींचे जाने वाले पहियों वाले रथ नहीं थे, बल्कि इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक ऊर्जा और मणियों की शक्ति से चलने वाले ऐसे यान थे जो ध्वनि की गति (Speed of Sound) को भी आसानी से मात दे रहे थे। तभी उलूपी अर्जुन को एक ऐसी रहस्यमयी जगह ले गई जो पाताल की रसायन विद्या, जेनेटिक इंजीनियरिंग और मेडिकल साइंस का मुख्य केंद्र था। वहां की हवा में जड़ी-बूटियों और रसायनों की एक दिव्य सुगंध थी। उलूपी ने अर्जुन की ओर देखकर कहा, "ऊपर धरती पर इंसान और जानवर समय के साथ बूढ़े होते हैं, उनकी कोशिकाएं मरती हैं, वे तरह-तरह की बीमारियों का शिकार होते हैं और अंततः मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। लेकिन अर्जुन, पाताल में ऐसा नहीं है। यहां के नागों और दानवों ने प्रकृति के रसायनों, अर्क और 'सोम रस' के जरिए मानव शरीर की कोशिकाओं (Cells) को हमेशा जवां रखने का, और एंटी-एजिंग (Anti-aging) का रहस्य पूरी तरह से सुलझा लिया है। यहां ऐसी औषधियां और अमृत तुल्य रसायन मौजूद हैं जो किसी भी लाइलाज बीमारी को जड़ से खत्म कर सकते हैं। यहां समय का प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ता। इसीलिए, यहां कोई बूढ़ा नहीं होता।" यह सब देखकर अर्जुन का क्षत्रिय दिमाग सवालों के भंवर में फंस गया। एक महान योद्धा होने के नाते, सत्ता, साम्राज्य का विस्तार और विजय उनकी रगों में बहती थी। वे खुद को रोक नहीं पाए और उन्होंने हैरानी से उलूपी से पूछ ही लिया, "उलूपी, मैं सचमुच हैरान हूँ। अगर तुम्हारे पास इतनी उन्नत तकनीक है, इतना चमत्कारिक विज्ञान है, मृत्यु और बीमारियों को हराने वाली रसायन विद्या है, और हवा से बातें करने वाले ये मायावी विमान हैं... तो तुम लोग इस घुप अंधेरे में, धरती के इतने नीचे छिपकर क्यों रहते हो? अपनी इस असीमित शक्ति के बल पर तो तुम पूरी पृथ्वी, यहां तक कि देवताओं के स्वर्ग पर भी आसानी से राज कर सकते हो। फिर तुम लोग सतह पर आकर दुनिया पर कब्ज़ा क्यों नहीं करते?" अर्जुन का यह सवाल सुनते ही उलूपी के चेहरे पर एक बहुत गहरी, लेकिन अर्थपूर्ण मुस्कान छा गई। उसने अर्जुन की आंखों में सीधे देखते हुए जो जवाब दिया, वह इंसानी सोच, हमारे आज के समाज और क्षत्रिय अहंकार पर एक बहुत गहरी चोट थी।
उलूपी ने कहा, "अर्जुन... सत्ता की भूख, साम्राज्यों का विस्तार और दूसरों पर राज करने की लालसा सिर्फ सतह पर रहने वालों की, यानी इंसानों और देवताओं की सबसे बड़ी मानसिक बीमारी है। तुम लोग जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों के लिए, खोखले अहंकार को संतुष्ट करने के लिए और चंद दिनों के क्षणिक सुख के लिए एक दूसरे का बेरहमी से खून बहाते हो। पाताल के वासी यह बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि असली शांति विस्तार में नहीं, बल्कि गहराई में है। बाहरी दुनिया को, कमजोरों को जीतना तो बहुत आसान है, लेकिन हमने यह बाहरी दुनिया छोड़ दी है। हम अपने अंतर्मन की गहराइयों में उतरकर इस पूरे ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने में लगे हैं। हम वह ज्ञान खोज रहे हैं जो समय और मृत्यु से भी परे है। अर्जुन, जब कोई चेतना, कोई सभ्यता अपने विकास के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच जाती है, तो उसे दूसरों को गुलाम बनाने या उन पर राज करने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती।" उलूपी की इन गहरी दार्शनिक बातों ने अर्जुन को पूरी तरह निशब्द कर दिया। उन्हें अपने जीवन में पहली बार यह महसूस हुआ कि धरती के सबसे महान साम्राज्य, बड़ी-बड़ी सेनाएं और चक्रवर्ती सम्राट भी इस नागलोक के दार्शनिक ज्ञान और शांति के आगे कितने तुच्छ और छोटे हैं। दोस्तों, उलूपी की यह बात आज के समय में कितनी सच साबित होती है, जहां हम सिर्फ ताकत के पीछे भाग रहे हैं। कहानी के उस हिस्से पर जाने से पहले जहां समय का पहिया ही पलट जाता है, मैं आपको याद दिला दूं कि अगर आप इस गहराई तक मेरे साथ जुड़े हुए हैं, तो वीडियो को लाइक करें और मेरे इंस्टाग्राम 🆔 को जरूर फॉलो करें ताकि हम ऐसी ही रहस्यमयी दुनिया की बातें करते रहें। डिस्क्रिप्शन में जो लिंक है उसे भी आप फॉलो कर लीजिए। चलिए अब देखते हैं कि आगे पाताल में क्या हुआ। इस गहरे दार्शनिक संवाद के तुरंत बाद, उलूपी ने अर्जुन के सामने एक ऐसा अप्रत्याशित प्रस्ताव रखा जिसने अर्जुन को एक भयंकर धर्म संकट में डाल दिया। उलूपी ने बहुत ही शांत स्वर में अर्जुन को बताया कि जब उसने उन्हें आधी रात को गंगा में डुबकी लगाते हुए देखा था, तो वह उनके दिव्य रूप, उनके तेज और उनके योग पर मोहित हो गई थी। उसने अर्जुन को मृत्यु के मुंह से बाहर खींचने के लिए नहीं, बल्कि अपना जीवनसाथी, अपना पति बनाने के लिए पाताल की गहराइयों में खींचा था। उलूपी ने अर्जुन के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया। यह सुनते ही अर्जुन चौंक कर दो कदम पीछे हट गए। उन्होंने उलूपी को बताया कि वे एक क्षत्रिय हैं और वर्तमान में अपने ही बनाए एक कड़े नियम के कारण 12 वर्ष के कठोर वनवास और अखंड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रहे हैं। यदि वे उलूपी से इस पाताल लोक में विवाह करते हैं, तो उनका ब्रह्मचर्य टूट जाएगा, उनका व्रत खंडित हो जाएगा और एक योद्धा के रूप में उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। नियमों से बंधे एक कठोर इंसान होने के कारण अर्जुन ने उस प्रेम प्रस्ताव को सिरे से ठुकरा दिया। यहीं पर, उस अंडरग्राउंड दुनिया में, उलूपी ने अर्जुन को शास्त्रों का वह सूक्ष्म और सबसे बड़ा ज्ञान दिया जिसके बारे में हम इंसान अक्सर अज्ञानता का शिकार हो जाते हैं। उलूपी ने अर्जुन की आंखों में देखकर कहा, "धर्म क्या है अर्जुन? क्या केवल कुछ लकीरों को पीटना, कुछ कठोर नियमों को आंख बंद करके मानना ही सच्चा धर्म है? हमारे शास्त्रों के अनुसार धर्म का सबसे बड़ा और सर्वोच्च उद्देश्य किसी के प्राणों की रक्षा करना है। मैंने अपने पूरे मन से तुम्हें अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया है। यदि तुम आज मुझे अस्वीकार करके यहां से चले जाओगे, तो मैं इसी क्षण अपने प्राण त्याग दूंगी। जरा सोचो अर्जुन, तुम्हारे एक नियम, एक ब्रह्मचर्य को बचाने की झूठी जिद में एक निर्दोष स्त्री की हत्या का भयानक पाप तुम्हारे माथे पर लगेगा। क्या वह प्राण लेने का पाप तुम्हारे ब्रह्मचर्य के पुण्य से कहीं ज्यादा बड़ा नहीं होगा?"
उलूपी ने आगे समझाते हुए कहा, "धर्म कोई लोहे की जंजीर नहीं है जो इंसान की आत्मा को जकड़ दे। किसी महान उद्देश्य के लिए, किसी की जान बचाने के लिए नियमों को लचीला बनाना ही असली बुद्धिमानी और सच्चा धर्म है। किसी एक व्रत को निभाने के लिए किसी दूसरे के जीवन को दांव पर लगा देना धर्म नहीं, बल्कि तुम्हारा अहंकार और हठ है। सच्चा धर्म करुणा में है, दया में है और समय की मांग के अनुसार सही फैसला लेने में है।" उलूपी के इन अकाट्य तर्कों और सूक्ष्म धर्म के इस ज्ञान ने अर्जुन के दिमाग के सारे जाले साफ कर दिए। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ योद्धा को आज पाताल की गहराइयों में एक स्त्री ने जीवन, ब्रह्मांड और धर्म का वह असली मतलब सिखा दिया था जो धरती के किसी भी गुरुकुल, किसी भी ऋषि ने उन्हें कभी नहीं पढ़ाया था। अजेय योद्धा को यह स्वीकार करना ही पड़ा कि नियमों की लकीर पीटने से बड़ा धर्म, करुणा और प्राणों की रक्षा करना है। अर्जुन ने अपना हठ त्याग दिया और उलूपी के उस पवित्र प्रेम और विवाह के प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। पाताल लोक के उस अकल्पनीय, नीले-सफेद प्रकाश से जगमगाते रहस्यमय और हाई-टेक साम्राज्य में अर्जुन ने वह रात बिताई। लेकिन, जब वापस धरती पर लौटने का समय आया, तो उलूपी ने अर्जुन को विदाई में कोई सोना, चांदी, हीरे या जवाहरात नहीं दिए। उसने एक ऐसा चमत्कारिक वरदान दिया जिसने भविष्य में होने वाले महाभारत के उस विनाशकारी युद्ध का पूरा रुख ही पलट कर रख दिया। उलूपी ने अपने दोनों हाथ अर्जुन के सिर पर रखे और एक महा-वरदान देते हुए कहा, "हे श्रेष्ठ, आज से 'जल तत्व' पूरी तरह तुम्हारे अधीन रहेगा। पानी के भीतर तुम्हें कोई भी, चाहे वह कितना भी बड़ा मायावी, शूरवीर या दानव क्यों ना हो, कभी हरा नहीं पाएगा। धरती के सारे जलचर आज से तुम्हारे आदेशों के गुलाम होंगे और पानी तुम्हारा सबसे बड़ा रक्षक बनेगा।"
यही वह अचूक वरदान था जिसने बाद में अज्ञातवास के दौरान और महाभारत के युद्ध में कई बार अर्जुन के प्राण बचाए और उन्हें जल तत्व पर संपूर्ण विजय दिलाई।
इसके बाद अर्जुन ने उलूपी से विदा ली। और जिस रहस्यमयी, गुरुत्वाकर्षण को झुठलाने वाले रास्ते से वे उस असीम गहराई में आए थे, उसी तकनीक के सहारे वापस सतह की ओर लौट पड़े। जब अर्जुन ने गंगा के उसी घाट पर पानी की सतह को चीरते हुए बाहर की ओर गहरी सांस ली, तो बाहर का नज़ारा कुछ बदला हुआ सा था। यहां एक बहुत बड़ा ब्रह्मांडीय सच, एक बहुत बड़ा क्वांटम फिजिक्स का नियम अर्जुन का इंतजार कर रहा था—जिसे आज हम 'टाइम डायलेशन' (Time Dilation) या समय के खिंचाव का सिद्धांत कहते हैं।
पाताल लोक में बिताई गई वह एक रात क्या धरती के एक दिन के बराबर थी? या कई हफ्तों के? या महीनों के? अर्जुन ने गहराई से महसूस किया कि घाट की मिट्टी का रंग, पेड़ों के पत्ते, हवा का रुख और तारों की स्थिति कुछ अलग थी। समय धरती पर बहुत तेज़ी से आगे बढ़ चुका था। डायमेंशन बदलने से समय की गति बदल जाती है, यह बात आज अल्बर्ट आइंस्टीन कहते हैं, लेकिन हमारे शास्त्रों में यह घटना अर्जुन के साथ हो चुकी थी। लेकिन इन सबसे परे, जो चीज़ सबसे ज्यादा बदल चुकी थी, वह खुद अर्जुन थे। गंगा में डुबकी लगाने वाला वह क्षत्रिय राजकुमार जो दुनिया को अपने बाहुबल से नापता था, अब बाहर आ चुका था। उसका दिमाग पूरी तरह खुल चुका था। उसका सारा घमंड टूट चुका था। ब्रह्मांड को देखने का उसका नजरिया हमेशा के लिए बदल गया था। वह जान चुका था कि असली ताकत हथियारों, तीरों या सेनाओं में नहीं, बल्कि चेतना की गहराई में है। अब आप सोच रहे होंगे कि क्या यह सिर्फ एक पौराणिक कथा है? क्या यह सिर्फ एक मिथक है? दर्शकों, अब समय आ गया है इस प्राचीन रहस्य को आज के युग यानी कलियुग (Kaliyug) और भविष्य के सबसे बड़े महाविनाश से जोड़ने का। आज की आधुनिक दुनिया में विज्ञान 'होलो अर्थ थ्योरी' (Hollow Earth Theory) यानी खोखली पृथ्वी के सिद्धांत पर लगातार बहस कर रहा है। इंटरनेट इस बात की थ्योरीज से भरा पड़ा है कि धरती अंदर से ठोस नहीं है। याद कीजिए साल 1947 का वह खौफनाक और सबसे रहस्यमय मिशन जिसे 'ऑपरेशन हाईजंप' भी कहा जाता है। जब अमेरिकी नौसेना के एडमिरल रिचर्ड ई. बर्ड अपने विमान से उत्तरी ध्रुव (North Pole) के ऊपर से उड़ान भर रहे थे। उन्होंने अपनी सीक्रेट डायरी में और रेडियो ट्रांसमिशन पर जो बताया, उसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और सरकारों के होश उड़ा दिए थे। उन्होंने बताया कि उन्होंने बर्फ के बीच एक बहुत विशालकाय छेद देखा था। और जब उनका विमान उस छेद के अंदर की तरफ गया, तो वहां कोई नर्क नहीं था, कोई लावा नहीं था। उन्होंने अंदर एक अलग ही दुनिया देखी। हरे-भरे जंगल, विशालकाय नदियां, मैमथ जैसे विलुप्त हो चुके जानवर, उनके विमान के इर्द-गिर्द उड़ने वाली रहस्यमय तश्तरियां (UFOs) और एक ऐसी उन्नत सभ्यता जिसके शहर चमचमा रहे थे। पश्चिमी दुनिया ने इसे 'अगार्था' (Agartha) का नाम दिया। हमारे तिब्बती ग्रंथों में इसे 'शंभाला' (Shambhala) कहा जाता है। क्या यह अगार्था, यह शंभाला वही पाताल लोक नहीं है जिसका सटीक वर्णन हमारे आदि पर्व में किया गया है? आज
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