विश्वामित्र

ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्। इस मंत्र की गूंज हम सब रोज़ सुनते हैं। मंदिरों की घंटियों के बीच, सुबह की पहली किरण के साथ, और अपने घरों के शांत कोनों में। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रह्मांड की इस सबसे शक्तिशाली ऊर्जा को समेटे इस महामंत्र को संसार में लाने वाला जन्म से कोई साधारण ऋषि नहीं था? वो एक क्षत्रिय था। एक ऐसा योद्धा जिसने अपनी तलवार की धार को मोड़कर तपस्या की वेदी पर रख दिया। जिसने अपने क्रोध, अपने असीमित अहंकार और अपनी वासनाओं की धधकती आग में खुद को जलाकर ऐसा ब्रह्मत्व प्राप्त किया कि खुद काल (समय) भी उसके सामने नतमस्तक हो गया। आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसे चक्रवर्ती सम्राट की, जिसके मुकुट के हीरों में सूरज अपनी किरणें तलाशता था। जिसका नाम सुनकर स्वयं देवराज इंद्र के हाथ से वज्र कांपने लगता था। यह कहानी सिर्फ तपस्या की नहीं है। यह कहानी है उस भटकाव की जहाँ अप्सरा मेनका के घुंघरुओं की एक झंकार ने हज़ारों साल का तप तोड़ दिया। यह कहानी है उस गुरु की जिसने श्रीराम को वो अस्त्र सौंपे जिनसे रावण जैसे महाज्ञानी और अत्याचारी का अंत हुआ। और सबसे बढ़कर, यह कहानी है एक ऐसे ऋषि की, जिसने अपनी तपस्या के बल पर समय की सीमाओं को लांघकर (Time Travel) भविष्य के उस घोर अंधकार को देख लिया था जिसे हम आज 'कलयुग' कहते हैं, और जहाँ उन्होंने रहस्यमयी नगरी शाम्भला के दर्शन किए। नमस्कार, आज मैं आपके लिए जो महागाथा लेकर आया हूँ, वो किसी भी मानवीय कल्पना से परे है। किसी भव्य महाकाव्य की तरह, सुनहरी आभा और दिव्य शक्तियों से सजी यह कहानी है राजा कौशिक के महर्षि विश्वामित्र बनने की, और उस रहस्यमयी काल-यात्रा की जिसने विधाता का लिखा बदल दिया। विश्वामित्र की कहानी को समझना है, तो हमें समय के उस पन्ने पर जाना होगा जब वो महर्षि नहीं, बल्कि आर्यावर्त के सबसे प्रतापी 'राजा कौशिक' थे। एक दिन सम्राट कौशिक अपनी चतुरंगिणी सेना—जिसमें हज़ारों हाथी, घोड़े और लाखों सैनिक थे—के साथ शिकार पर निकले। जंगल पार करते हुए वे महर्षि वशिष्ठ के शांत, अलौकिक और साधारण से आश्रम में पहुंचे।
वहां उन्होंने जो देखा, वो उनकी क्षत्रिय बुद्धि के परे था। महर्षि वशिष्ठ जी ने अपनी दिव्य गाय 'नंदिनी' (जो कामधेनु की पुत्री थी) का आह्वान किया। पलक झपकते ही उस चमत्कारी गाय ने राजा की लाखों की सेना के लिए सोने के थालों में छप्पन भोग प्रकट कर दिए।
राजा कौशिक की आँखें फटी रह गईं। उनके मन में लालच का एक ऐसा बीज बोया गया जिसने उनके पूरे जीवन का रुख बदल दिया। उन्होंने सोचा, "एक संन्यासी को इस गाय की क्या आवश्यकता? ऐसी दिव्य शक्ति तो मेरे राजमहल में होनी चाहिए ताकि मेरी प्रजा की दरिद्रता सदा के लिए मिट सके!" कौशिक ने वशिष्ठ से गाय मांगी। बदले में अपना आधा राज्य और लाखों स्वर्ण मुद्राओं का प्रलोभन दिया। लेकिन महर्षि वशिष्ठ तो वैरागी थे, उन्होंने शांति से मुस्कुराकर मना कर दिया। एक चक्रवर्ती सम्राट को यह अपना घोर अपमान लगा। क्रोध से अंधे होकर कौशिक ने बलपूर्वक नंदिनी को ले जाने का आदेश दिया। तब उसी शांत आश्रम में एक ऐसा युद्ध हुआ जिसने इतिहास बदल दिया। नंदिनी ने रंभाते हुए ऋषि के तपोबल से एक ऐसी मायावी और विशाल सेना उत्पन्न की, जिसने कौशिक की लाखों की सेना को गाजर-मूली की तरह काट कर रख दिया। एक तरफ अस्त्र-शस्त्रों का भयानक शोर था, और दूसरी तरफ वशिष्ठ की हिमालय जैसी अडिग शांति। राजा कौशिक के छोड़े गए ब्रह्मास्त्र तक वशिष्ठ के एक साधारण से 'ब्रह्मदंड' (लकड़ी के डंडे) के सामने तिनके की तरह भस्म हो गए। उस दिन उस धूल भरे मैदान में राजा कौशिक को समझ आ गया कि शारीरिक और सैन्य बल, आत्मा और ब्रह्म बल के सामने कितना बौना है। इसी करारी हार ने उनके भीतर से राजा को मार दिया और 'विश्वामित्र' बनने की ज्वाला को जन्म दिया। राजपाट और राजसी वस्त्र त्यागकर, उन्होंने घोर तप का मार्ग चुन लिया। तपस्या के दौरान विश्वामित्र की ज़िद और शक्ति का सबसे खौफनाक और अद्भुत उदाहरण बना 'राजा त्रिशंकु' का प्रसंग। राजा त्रिशंकु सदेह (अपने मानव शरीर के साथ) स्वर्ग जाना चाहते थे। महर्षि वशिष्ठ ने इसे प्रकृति और विधाता के नियमों के विरुद्ध बताकर त्रिशंकु को श्राप दे दिया था। निराश त्रिशंकु विश्वामित्र की शरण में आए। विश्वामित्र के भीतर वशिष्ठ को हराने की आग अभी बुझी नहीं थी। अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने और अपनी ज़िद पूरी करने के लिए, विश्वामित्र ने अपने तपोबल का एक बड़ा हिस्सा दांव पर लगा दिया और त्रिशंकु को सीधे स्वर्ग की ओर धकेल दिया। कल्पना कीजिए उस दृश्य की—एक नश्वर इंसान बादलों को चीरता हुआ स्वर्ग के द्वार पर पहुँचता है! लेकिन देवराज इंद्र और अन्य देवताओं ने त्रिशंकु को अपवित्र मानकर उसे उल्टे मुंह स्वर्ग से नीचे फेंक दिया। त्रिशंकु अंतरिक्ष से चीखते हुए धरती की ओर गिर रहे थे।
तभी विश्वामित्र ने अपना हाथ उठाया और एक हुंकार भरी—"ठहर जाओ!" उनकी असीमित शक्ति से त्रिशंकु बीच अंतरिक्ष में ही उल्टे लटक गए। यहीं से शुरू होता है ब्रह्मांड के नियमों के साथ उनका पहला महा-खिलवाड़। जब देवताओं ने त्रिशंकु को नहीं अपनाया, तो विश्वामित्र का क्रोध ज्वालामुखी बनकर फूटा। उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी तपस्या की ऊर्जा से एक 'समानांतर ब्रह्मांड' (Parallel Universe) की रचना शुरू कर दी। आसमान में नए तारे जन्म लेने लगे, नए नक्षत्र गढ़े जाने लगे, यहाँ तक कि विश्वामित्र ने अपने स्वर्ग के लिए नए देवता तक बनाने शुरू कर दिए। यह एक ऐसा दृश्य था मानो कोई महामानव स्वयं ब्रह्मा को चुनौती दे रहा हो! हाहाकार मच गया। अंततः विधाता ब्रह्मा जी को स्वयं धरती पर आना पड़ा। संधि हुई, और त्रिशंकु उसी नवनिर्मित स्वर्ग (त्रिशंकु-स्वर्ग) में हमेशा के लिए उल्टे लटके हुए तारों के बीच स्थापित हो गए। विश्वामित्र केवल तपस्या नहीं करते थे, वो मानवीय आत्मा की अंतिम सीमाओं को भी परखते थे। उनका मानना था कि सोना तभी कुंदन बनता है जब उसे सबसे तेज़ आंच में तपाया जाए। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा इसका सबसे क्रूर लेकिन पवित्र अध्याय है।विश्वामित्र देखना चाहते थे कि क्या कोई मनुष्य अपने धर्म और सत्य के लिए ब्रह्मांड का सबसे बड़ा त्याग कर सकता है? स्वप्न में विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र से उनका पूरा राज्य दान में मांग लिया। और हरिश्चंद्र? उस महान सत्यवादी ने बिना एक पल सोचे जागते ही अपना पूरा साम्राज्य ऋषि के चरणों में रख दिया। लेकिन विश्वामित्र की परीक्षा यहाँ नहीं रुकी। उन्होंने राज्य के साथ-साथ 'दक्षिणा' मांग ली। जब राज्य ही नहीं रहा, तो दक्षिणा कहाँ से आती? उस दक्षिणा को चुकाने के लिए हरिश्चंद्र को अपनी अर्धांगिनी रानी शैव्या और अपने लाडले पुत्र रोहित को एक ब्राह्मण के यहाँ बेचना पड़ा। और स्वयं एक चक्रवर्ती सम्राट को काशी के श्मशान में एक चांडाल का दास बनना पड़ा। दिन-रात मुर्दों को जलाना, उनसे कर (Tax) वसूलना, यही उस राजा का जीवन बन गया। परीक्षा का चरम तब आया जब एक सर्पदंश से बालक रोहित की मृत्यु हो गई। रानी शैव्या अपने मरे हुए बच्चे को गोद में लिए रोती-बिलखती श्मशान पहुंची। हरिश्चंद्र ने अपनी ही पत्नी से अपने ही बेटे के अंतिम संस्कार के लिए कर माँगा, क्योंकि यही उनका धर्म था। जब शैव्या ने अपनी साड़ी का आधा हिस्सा फाड़कर कर के रूप में देना चाहा, तब जाकर ब्रह्मांड काँप उठा। विश्वामित्र का कठोर हृदय पसीज गया। देवता पुष्प बरसाने लगे। विश्वामित्र ने रोहित को पुनर्जीवित किया और हरिश्चंद्र को उनका खोया हुआ सारा वैभव और यौवन लौटा दिया। विश्वामित्र की यह कठोरता उनकी क्रूरता नहीं थी; यह सत्य की वो कसौटी थी जिसने हरिश्चंद्र के नाम को इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर दिया। जब विश्वामित्र का तप अपनी चरम सीमा को छूने लगा, तो देवराज इंद्र का सिंहासन फिर से डोलने लगा। इंद्र को भय था कि यह ज़िद्दी तपस्वी कहीं स्वर्ग का राज्य ही न मांग ले। इंद्र ने अपनी सबसे खूबसूरत अप्सरा, मेनका को विश्वामित्र का तप भंग करने धरती पर भेजा। पुष्कर के शांत तट पर, जहाँ केवल हवाओं की सरसराहट थी, वहां मेनका के घुंघरुओं की झंकार गूंजी। वसंत ऋतु अपने पूरे यौवन पर आ गई। हज़ारों वर्षों से एकांत में साधना कर रहे विश्वामित्र ने जैसे ही अपनी आँखें खोलीं, वो मेनका के अलौकिक सौंदर्य और मायाजाल में ऐसे उलझे कि अपना असली मार्ग ही भूल गए। वो तपस्वी जो ब्रह्मा को चुनौती दे रहा था, एक अप्सरा के प्रेम में हार गया। कई वर्षों तक वो मेनका के साथ रहे, और इसी मिलन से कन्या 'शकुंतला' का जन्म हुआ (जिनके पुत्र सम्राट भरत के नाम पर हमारे देश का नाम 'भारत' पड़ा)। लेकिन एक दिन विश्वामित्र की चेतना पर पड़ी माया की परत हटी। उन्हें आत्मबोध हुआ कि वो तो इंद्र के बिछाए जाल में फंस गए हैं। उन्हें घोर पश्चाताप हुआ। उन्होंने मेनका और अपनी नवजात पुत्री का त्याग किया और एक बार फिर, पहले से भी अधिक कठोर तपस्या के लिए हिमालय की कंदराओं में चले गए। इंद्र ने फिर चाल चली और इस बार अप्सरा रंभा को भेजा। लेकिन इस बार विश्वामित्र सचेत थे। रंभा के लुभाने के प्रयास पर विश्वामित्र का क्रोध भड़क उठा और उन्होंने रंभा को हज़ारों वर्षों तक पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। रंभा तो पत्थर बन गई, लेकिन विश्वामित्र को फिर ग्लानि हुई। उन्होंने वासना तो जीत ली थी, लेकिन 'क्रोध' ने उनका तप फिर से शून्य कर दिया था। तब उन्होंने संकल्प लिया कि अब चाहे प्रलय आ जाए, वो मौन रहेंगे और कभी क्रोध नहीं करेंगे।
कालचक्र का टूटना और भविष्य का विहंगम दृश्य (The Time Travel & Kalyug) यहीं से शुरू होती है उनके मौन और परम समाधि की वो अवस्था, जहाँ भौतिक दुनिया के नियम खत्म हो जाते हैं। अपनी श्वास और चेतना को ब्रह्मांड के केंद्र में केंद्रित करते हुए, विश्वामित्र का सूक्ष्म शरीर कालचक्र (Time) को चीरता हुआ भविष्य के गर्भ में पहुँच गया। समय यात्रा (Time Travel) करते हुए उनकी चेतना ने युगों को पार किया। उन्होंने द्वापर युग का भीषण महाभारत युद्ध देखा, और फिर उनका सामना हुआ एक ऐसे युग से जिसने उनके रोंगटे खड़े कर दिए। उन्होंने देखा 'कलयुग'। विश्वामित्र ने देखा कि भविष्य में नदियाँ सूख रही हैं, गंगा मैली हो गई है। हवा में विष घुल गया है। मंदिर तो बहुत हैं लेकिन धर्म केवल दिखावा और व्यापार बन गया है। मनुष्य ही मनुष्य का भक्षक बन चुका है। सत्ता पर लालची और क्रूर लोगों का कब्ज़ा है। उन्होंने देखा कि वेद और मंत्रों की शक्ति लुप्त हो रही है और धरती पाप के बोझ से कराह रही है। लेकिन इसी भयावह अंधकार के बीच, समय की इस यात्रा में, उन्हें कलयुग के अंत का एक दिव्य दृश्य दिखाई दिया। उन्होंने हिमालय की बर्फीली वादियों के पीछे छिपी एक रहस्यमयी, प्रकाशवान और अलौकिक नगरी देखी—'शाम्भला' (Shambhala)। उन्होंने देखा कि जब कलयुग अपनी चरम सीमा पर होगा, और धर्म पूरी तरह नष्ट होने की कगार पर होगा, तब इसी शाम्भला नगरी में भगवान विष्णु का दसवां और अंतिम अवतार जन्म लेगा—'कल्कि'। विश्वामित्र ने अपनी दिव्य दृष्टि से कल्कि भगवान को देखा—सुनहरी आभा से दमकता शरीर, सफेद अश्व (देवदत्त) पर सवार, और उनके हाथ में एक ऐसी धधकती हुई तलवार जो अंधकार के सीने को चीर रही थी। उन्होंने देखा कैसे कल्कि अवतार माता वैष्णवी के साथ मिलकर एक नए सत्युग (सतयुग) की नींव रखेंगे।
गायत्री मंत्र की उत्पत्ति: कलयुग के अंधकार का ब्रह्मास्त्र
भविष्य के इस सत्य और संताप को देखकर विश्वामित्र की चेतना झटके से वर्तमान में लौट आई। उनका शरीर पसीने से लथपथ था। उन्हें समझ आ गया था कि कलयुग के उस घोर अंधकार और पाप के प्रभाव में, आम मनुष्यों को दिशा दिखाने के लिए अस्त्र-शस्त्र काम नहीं आएंगे। उन्हें एक ऐसे प्रकाश की आवश्यकता होगी, जो उनकी बुद्धि को शुद्ध रख सके। उसी करुणा, भविष्य के संताप, और अपने हज़ारों सालों के तप की राख से, विश्वामित्र के भीतर से एक दिव्य नाद (Sound) प्रकट हुआ। साक्षात् सूर्य के तेज और ब्रह्मांड की शुद्धतम ऊर्जा से जुड़कर उन्होंने एक ऐसे महामंत्र को जन्म दिया, जो हर युग में मनुष्य की ढाल बनेगा—गायत्री मंत्र (ॐ भूर्भुवः स्वः...)। विश्वामित्र ने यह मंत्र मानवता को इसलिए भेंट किया ताकि भविष्य के कलयुग में जब इंसान का मन भटके, लालच उसे घेरे, तो यह मंत्र उसकी बुद्धि (धी) को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे। आज जो हम गायत्री मंत्र पढ़ते हैं, वह सिर्फ कुछ शब्दों का मेल नहीं है, वह विश्वामित्र की उस 'टाइम ट्रैवल' और उनकी कठोर तपस्या का वो निचोड़ है, जो सीधा हमें ईश्वर से जोड़ता है।
अहंकार का अंतिम पतन और श्रीराम का मार्गदर्शन
हज़ारों वर्षों की तपस्या, नए ब्रह्मांड की रचना और गायत्री मंत्र के निर्माण के बाद भी विश्वामित्र 'ब्रह्मर्षि' नहीं बन पाए थे। क्यों? क्योंकि उनके मन के किसी गहरे कोने में महर्षि वशिष्ठ के प्रति शत्रुता की राख अभी भी दबी थी।
एक अमावस्या की रात वो हाथ में तलवार लेकर वशिष्ठ की हत्या करने उनके आश्रम गए। लेकिन वहां छिपकर उन्होंने जो सुना, उसने उनके जीवन की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। वशिष्ठ अपनी पत्नी अरुंधति से विश्वामित्र की प्रशंसा कर रहे थे। वशिष्ठ कह रहे थे, "अरुंधति, आसमान के तारों की चमक भी आज फीकी लग रही है, क्योंकि विश्वामित्र की तपस्या का तेज आज पूर्णिमा के चाँद सा प्रबल है।" अपने सबसे बड़े शत्रु के मुख से अपनी बड़ाई सुनकर विश्वामित्र का सदियों पुराना, पहाड़ जैसा अहंकार उसी क्षण टूट कर चकनाचूर हो गया। उनके हाथ से तलवार छूट गई। वो वशिष्ठ के चरणों में गिरकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगे। जब वशिष्ठ ने मुस्कुराकर उन्हें सीने से लगाया और मधुर स्वर में कहा, "उठो ब्रह्मर्षि!" तब जाकर एक राजा कौशिक का सफर वास्तव में विश्वामित्र बनने पर पूर्ण हुआ। ब्रह्मर्षि बनने के बाद उनका जीवन केवल लोक कल्याण को समर्पित हो गया। समय यात्रा में कल्कि अवतार और धर्म युद्ध को देखने के बाद, विश्वामित्र जानते थे कि हर युग में भगवान को धरती पर एक मार्गदर्शक की ज़रूरत होती है। जब त्रेता युग में ताड़का, मारीच और सुबाहु जैसे राक्षसों का आतंक बढ़ा, तो वो सीधे अयोध्या पहुंचे और राजा दशरथ से उनके प्राणों से प्यारे राम और लक्ष्मण को मांग लिया। विश्वामित्र जानते थे कि श्रीराम साक्षात नारायण हैं। लेकिन मानव रूप में उन्हें अपनी शक्तियों का बोध कराना आवश्यक था। विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को 'बला' और 'अतिबला' जैसी गुप्त और चमत्कारी विद्याएं दीं, जिनसे भूख-प्यास और थकान उन पर हावी नहीं हो सकती थी। उन्होंने श्रीराम को वो समस्त दिव्यास्त्र और ब्रह्मास्त्र सौंपे, जिनकी ऊर्जा उन्होंने अपनी काल-यात्राओं और तपस्या से ब्रह्मांड के अलग-अलग आयामों से बटोरी थी। विश्वामित्र ही वो गुरु थे जिन्होंने राम को ताड़का का वध करना सिखाया, अहिल्या को श्राप मुक्त करने का माध्यम बनाया, और फिर जनकपुर ले जाकर सीता स्वयंवर में शिव धनुष तोड़ने की प्रेरणा दी। सच तो यह है कि राम को एक राजकुमार से 'मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम' बनाने का सबसे बड़ा श्रेय महर्षि विश्वामित्र को ही जाता है। विश्वामित्र जी की यह भव्य महागाथा हमें सिखाती है कि इंसान का अतीत चाहे जितना भी हिंसक, अहंकारी या भटका हुआ क्यों न हो, एक दृढ़ संकल्प उसे भगवान के बराबर खड़ा कर सकता है। समय के पार जाकर भविष्य (कलयुग) को देखने वाले, शाम्भला के रहस्य को जानने वाले और मानवता को गायत्री मंत्र का अजेय सुरक्षा कवच देने वाले विश्वामित्र के जीवन से पता चलता है कि राह में वासना, क्रोध और अहंकार की कितनी ही बाधाएं क्यों न आएं—गिरकर हार मान लेना सबसे बड़ा पाप है। हम सबके भीतर एक विश्वामित्र छिपा है, जिसे बस अपनी बुराइयों से लड़ने के लिए एक साहसी ज़िद की तलाश है। आपको महर्षि विश्वामित्र के जीवन का कौन सा हिस्सा सबसे ज़्यादा रोमांचित करता है? क्या उनकी वो ब्रह्मांड रचने वाली ज़िद? कलयुग और कल्कि अवतार को देखने वाली उनकी टाइम-ट्रैवलिंग समाधि? गायत्री मंत्र की रचना? या श्रीराम को दिव्यास्त्र सौंपकर उन्हें भगवान बनाने का सफर? कमेंट सेक्शन में अपनी राय ज़रूर लिखिएगा। धर्म, आध्यात्म और ऐसी ही अद्भुत व भव्य कहानियों के लिए हमसे जुड़े रहने के लिए चैनल को सब्सक्राइब कीजिए और घंटी के निशान को आल पर सेट कीजिए। अगर वीडियो पसंद आया तो इसे लाइक भी कीजिए।
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