अश्वत्थामा जिंदा है

क्या आप यह कल्पना कर सकते हैं कि कुरुक्षेत्र के उस महाविनाश का एक प्रत्यक्षदर्शी आज भी हमारे बीच मौजूद है? एक ऐसा अजेय योद्धा, जो पिछले ५००० वर्षों से मृत्यु की प्रतीक्षा में युगों को बदलते देख रहा है। जिसके शरीर से आज भी मवाद और रक्त बहता है, जो अपने असहनीय घावों को शांत करने के लिए राहगीरों से तेल और हल्दी मांगता है। वह मृत्यु की भीख मांगता है, लेकिन स्वयं मृत्यु भी उससे दूर भागती है। आधुनिक विज्ञान इसे असंभव कह सकता है, लेकिन हमारे धर्मग्रंथ, युगों से चली आ रही लोककथाएं और उस पीड़ा का अहसास कुछ और ही गवाही देते हैं। यह कहानी है गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र, शिव के अंश और महाभारत के सबसे श्रापित योद्धा—अश्वत्थामा की। यह केवल एक श्राप की कहानी नहीं है, बल्कि कलयुग के अंत में भगवान कल्कि के साथ होने वाले अंतिम धर्मयुद्ध और मोक्ष की एक अद्भुत गाथा है। एक दरिद्र बचपन से अजेय योद्धा बनने तक इस महाविनाश की नींव कुरुक्षेत्र में नहीं, बल्कि गुरु द्रोणाचार्य की एक टूटी हुई कुटिया में पड़ी थी। एक समय था जब महान धनुर्धर द्रोणाचार्य अत्यंत निर्धन थे। निर्धनता ऐसी कि उनके पास अपने बालक अश्वत्थामा को पिलाने के लिए गौ-दुग्ध तक नहीं था। एक दिन जब नन्हे अश्वत्थामा ने अपने मित्रों को दूध पीते देखा, तो वह भी रोता हुआ अपनी माता कृपी के पास गया। माता का हृदय विदीर्ण हो गया। घर में दूध की एक बूंद नहीं थी, इसलिए उन्होंने चावल के आटे को जल में घोलकर उसे दूध बताकर अपने पुत्र को पिला दिया। उस श्वेत जल को पीकर अश्वत्थामा खुशी से नाचने लगा कि उसने दूध पी लिया है। जब गुरु द्रोण ने यह दृश्य देखा, तो उनका स्वाभिमान रो उठा। उन्हें लगा कि दरिद्रता के कारण उनका पुत्र उपहास का पात्र बन रहा है। उसी क्षण द्रोणाचार्य ने हस्तिनापुर जाने का निर्णय लिया, और यहीं से महाभारत के उस महाकाव्य का बीजारोपण हुआ।
अश्वत्थामा कोई साधारण मनुष्य नहीं था। उसका जन्म स्वयं भगवान शिव के वरदान से हुआ था। जन्म लेते ही उसने अश्व (घोड़े) के समान गर्जना की थी, इसलिए उसका नाम 'अश्वत्थामा' पड़ा। उसके मस्तक पर जन्म से ही एक दिव्य मणि सुशोभित थी। यह मणि कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि एक अभेद्य कवच था, जो उसे भूख, प्यास, रोग, और किसी भी अस्त्र-शस्त्र के प्रहार से सुरक्षित रखता था। जब तक वह मणि उसके पास थी, वह अजर और अमर था। महाभारत के उस भीषण युद्ध में अश्वत्थामा ने कौरवों का पक्ष लिया, क्योंकि वह दुर्योधन का परम मित्र था। युद्ध के १५वें दिन कुरुक्षेत्र की लाल मिट्टी पर एक ऐसी घटना घटी जिसने अश्वत्थामा की आत्मा को अंधकार से भर दिया। पांडवों को यह ज्ञात हो चुका था कि जब तक गुरु द्रोण के हाथ में शस्त्र हैं, उन्हें पराजित करना असंभव है। तब भगवान श्री कृष्ण की नीति से एक भ्रम फैलाया गया— "अश्वत्थामा मारा गया।" धर्मराज युधिष्ठिर के मुख से यह सुनकर कि अश्वत्थामा मारा गया (परंतु नर नहीं, कुंजर), गुरु द्रोण ने पुत्र मोह में टूटकर अपने शस्त्र त्याग दिए। उसी निहत्थी अवस्था में धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया। जब अश्वत्थामा को पिता के साथ हुए इस छल का ज्ञान हुआ, तो उसका विवेक नष्ट हो गया। उसने प्रतिशोध की ज्वाला में नारायणस्त्र का संधान कर दिया, जिससे पांडव सेना में हाहाकार मच गया। कौरव सेना का अंत हो चुका था। दुर्योधन अपनी जंघा टूटने के बाद रक्त रंजित भूमि पर अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। केवल तीन कौरव महारथी शेष थे— अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा।
एक बरगद के वृक्ष के नीचे बैठा अश्वत्थामा क्रोध और ग्लानि की अग्नि में जल रहा था। तभी रात के अंधकार में उसने एक दृश्य देखा— एक उल्लू ने सो रहे कौवों के घोंसले पर आक्रमण कर दिया। जो कौवे दिन के उजाले में उल्लू पर भारी पड़ते थे, वे रात के अंधेरे में मारे गए। इस दृश्य ने अश्वत्थामा के भीतर सोए हुए प्रतिशोध को एक भयंकर दिशा दे दी। कृपाचार्य के लाख समझाने के बाद भी, युद्ध के सभी नियमों और धर्म को ताक पर रखकर, अश्वत्थामा रात्रि के गहन अंधकार में पांडवों के शिविर में घुस गया। वह साक्षात काल बन चुका था। अंधेरे में उसे पांच लोग सोते हुए दिखाई दिए। उसने उन्हें पांचों पांडव समझकर अपनी तलवार से उनके सिर धड़ से अलग कर दिए और उन कटे हुए सिरों को लेकर दुर्योधन के पास पहुंचा। दुर्योधन पहले तो प्रसन्न हुआ, लेकिन जब उसने उन चेहरों को पहचाना, तो वह चीख पड़ा, "मूर्ख! तूने क्या कर दिया? ये पांडव नहीं, द्रौपदी के पांच अबोध पुत्र हैं। तूने हमारे ही वंश का समूल नाश कर दिया!" यह कहते हुए दुर्योधन ने प्राण त्याग दिए और अश्वत्थामा सन्न रह गया। प्रातःकाल जब द्रौपदी ने अपने पांचों पुत्रों के कटे हुए शीश देखे, तो उसका विलाप सुनकर आसमान भी कांप उठा। अर्जुन ने प्रतिज्ञा ली कि वह अश्वत्थामा का वध करके उसके मस्तक की मणि द्रौपदी के चरणों में लाएगा। अर्जुन और श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा का पीछा किया। मृत्यु को निकट देखकर, महर्षि व्यास के आश्रम में अश्वत्थामा ने वह अपराध कर दिया जिसकी क्षमा ब्रह्मांड में किसी के पास नहीं थी। उसने सृष्टि के सबसे विनाशकारी अस्त्र 'ब्रह्मास्त्र' का संधान कर दिया। अर्जुन ने भी अपना ब्रह्मास्त्र निकाला, लेकिन ऋषियों के हस्तक्षेप के बाद अर्जुन ने अपना अस्त्र वापस ले लिया। अश्वत्थामा को अस्त्र वापस लेना नहीं आता था। क्रूरता की सारी सीमाएं लांघते हुए, उसने उस महाविनाशकारी अस्त्र की दिशा अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ दी। एक अजन्मे शिशु की हत्या का यह प्रयास देख भगवान श्री कृष्ण का क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उत्तरा के गर्भ की रक्षा की (वह बालक बाद में राजा परीक्षित बना), लेकिन अश्वत्थामा को वह दंड दिया जो मृत्यु से भी अधिक भयावह था। श्री कृष्ण ने आगे बढ़कर अश्वत्थामा के मस्तक से वह दिव्य मणि बलपूर्वक उखाड़ ली। मणि निकलते ही वहां एक अत्यंत गहरा घाव बन गया। श्री कृष्ण ने उसे श्राप दिया: "हे अश्वत्थामा! तूने जीवन का अपमान किया है। जा, मैं तुझे श्राप देता हूं कि तू कलयुग के अंत तक इस पृथ्वी पर जीवित रहेगा। तेरे शरीर से युगों-युगों तक मवाद और रक्त बहता रहेगा। तेरे शरीर से इतनी दुर्गंध आएगी कि कोई मनुष्य तेरे समीप नहीं जाएगा। तू वनों और बीहड़ों में भटकेगा, मृत्यु मांगेगा, परंतु तुझे मृत्यु नहीं मिलेगी!" युगों-युगों का भटकाव कहा जाता है कि उसी दिन से अश्वत्थामा का नरक पृथ्वी पर ही आरंभ हो गया। ५००० वर्ष बीत गए। द्वारका समुद्र में समा गई, हस्तिनापुर खंडहर बन गया, कई साम्राज्य आए और मिट गए, लेकिन अश्वत्थामा का वह घाव आज भी हरा है। इतिहास और आज के समय में भी अश्वत्थामा के देखे जाने के कई दावे हैं: १२वीं सदी में जब पृथ्वीराज चौहान शब्दभेदी बाण विद्या सीखने जंगल गए, तो उन्हें एक विशालकाय वृद्ध मिला जिसके माथे पर गहरा घाव था। वह कोई और नहीं, अश्वत्थामा ही थे। असीरगढ़ का किला (मध्य प्रदेश): यहाँ स्थित गुप्तेश्वर महादेव मंदिर में आज भी यह रहस्य बना हुआ है कि रात में मंदिर बंद होने के बाद, सुबह शिवलिंग पर ताजे गुलाब और बेलपत्र कौन चढ़ाता है? स्थानीय लोगों का दृढ़ विश्वास है कि अश्वत्थामा नित्य यहां शिव की आराधना करने आते हैं। मध्य प्रदेश के एक गांव में एक डॉक्टर के पास एक ऐसा मरीज आया जिसके माथे के बीचों-बीच एक गहरा गड्ढा था, जिससे विचित्र दुर्गंध आ रही थी। पलक झपकते ही वह मरीज वहां से अदृश्य हो गया। नर्मदा की परिक्रमा करने वाले साधु-संतों ने भी कई बार एक असाधारण, विशालकाय साधु को पल भर में ओझल होते देखा है। संभाला नगरी, कल्कि अवतार और दिव्य मणि की वापसी भविष्य पुराण और शास्त्रों के अनुसार, अश्वत्थामा का यह अमरत्व केवल एक दंड नहीं है। इस श्राप के पीछे नियति का एक बहुत बड़ा उद्देश्य छिपा है। जब कलयुग अपने अंतिम चरण में होगा, और पृथ्वी पर अधर्म, पाप और अत्याचार अपनी चरम सीमा को पार कर जाएंगे, तब भगवान विष्णु अपना दसवां और अंतिम अवतार 'कल्कि' के रूप में लेंगे। इस महाविनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए भगवान कल्कि को सप्त चिरंजीवियों (सात अमर योद्धाओं) के मार्गदर्शन और सहायता की आवश्यकता होगी। यहीं से अश्वत्थामा के प्रायश्चित का अंतिम अध्याय प्रारंभ होगा।
वह रहस्यमयी और अभेद्य नगरी 'संभाला' (Shambhala), जो आम मनुष्यों की दृष्टि से ओझल है, वहीं भगवान कल्कि का जन्म होगा। अश्वत्थामा अपने ५००० वर्षों के कष्ट और तपस्या के बाद संभाला नगरी पहुंचेंगे। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा के मस्तक से जो दिव्य मणि निकाली थी, वह उसी अलौकिक नगरी संभाला में सुरक्षित रखी गई है।
जब कल्कि अवतार अपने पूर्ण रूप में प्रकट होंगे, तब वे अश्वत्थामा को क्षमा दान देंगे और वह दिव्य मणि उसे पुनः सौंप दी जाएगी। लेकिन इस बार वह मणि किसी अहंकार का प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा का शस्त्र होगी। मणि मिलते ही अश्वत्थामा का वह युगों पुराना घाव भर जाएगा, उसका शरीर पुनः एक दिव्य और अजेय योद्धा के रूप में परिवर्तित हो जाएगा। कलियुग के दानव (कलि) और उसकी आसुरी शक्तियों के विरुद्ध होने वाले उस भयंकर अंतिम धर्मयुद्ध में, अश्वत्थामा भगवान कल्कि के प्रधान सेनापति के रूप में रणभूमि में उतरेंगे। ५००० वर्षों का संचित ज्ञान, परशुराम जी का मार्गदर्शन और शिव का तेज अश्वत्थामा को अजेय बना देगा। वह अपने हर उस पाप का प्रायश्चित करेगा जो उसने द्वापर युग की उस १८वीं रात को किया था। नाश हो जाएगा और सतयुग की नई भोर होगी, तब अश्वत्थामा का उद्देश्य पूर्ण हो जाएगा। चूंकि अश्वत्थामा का जन्म भगवान शिव के वरदान और उनके ही अंश से हुआ था, इसलिए अपने कर्मों का हिसाब चुकता करने के बाद, साक्षात महादेव उनके समक्ष प्रकट होंगे। भगवान शिव की कृपा से, अश्वत्थामा अपने उस नश्वर और श्रापित शरीर को त्याग देंगे। एक दिव्य प्रकाश के रूप में वह शिव के उसी अनंत स्वरूप में विलीन हो जाएंगे जहां से उनकी उत्पत्ति हुई थी। इस प्रकार, युगों की पीड़ा सहने के बाद महाभारत के इस अमर योद्धा को चिरकाल के लिए मोक्ष की प्राप्ति होगी। अश्वत्थामा की यह कथा केवल एक रहस्य नहीं है। यह ब्रह्मांड का सबसे बड़ा सत्य है कि कर्म का फल हर किसी को भोगना पड़ता है— चाहे आप देवताओं के अंश ही क्यों न हों। अहंकार में किया गया एक भी अधर्म आपको युगों-युगों के लिए अंधकार में धकेल सकता है। लेकिन यह कथा यह भी सिखाती है कि यदि प्रायश्चित सच्चा हो, तो कलयुग के अंत में ही सही, मोक्ष का द्वार अवश्य खुलता है।

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