मां वैष्णवी

यह कोई सामान्य किस्सा नहीं है, जिसे सुनकर भुला दिया जाए। यह समय के उस अनंत, अथाह और रहस्यमयी चक्र की गाथा है, जिसे समझने के लिए हमें अपनी सीमित भौतिक दृष्टि से परे जाकर, आत्मा के गहरे और शांत महासागर में उतरना होगा। मैं आज आपको जो सुनाने जा रहा हूँ, वह एक ऐसी अलौकिक और रोंगटे खड़े कर देने वाली यात्रा है जो त्रेता युग के घने, रहस्यमयी जंगलों से शुरू होकर, कलयुग के इस घुटन भरे कोलाहल और कंक्रीट के जंगलों से गुजरते हुए, शम्भाला के उन अदृश्य और रहस्यमयी द्वारों तक जाती है, जहाँ समय भी अपनी गति रोक लेता है। यह कहानी है नंदनी की, उस आदि-शक्ति त्रिकुटा की, और उस शाश्वत, युगों लंबी प्रतीक्षा की, जो सदियों से केवल एक 'वचन' के इर्द-गिर्द अपनी हर सांस ले रही है। आप कुछ पल के लिए अपनी आँखें बंद करें, अपने आस-पास के शोर को भूल जाएं और कल्पना करें... क्योंकि यह दृश्य किसी भव्य, अति-यथार्थवादी (hyper-realistic) और दिव्य चित्र की तरह आपके मानस पटल पर उभरने वाला है।
समय अपनी निर्बाध चाल चल रहा था। धरती पर जब पाप, अहंकार और अधर्म का बोझ असहनीय रूप से बढ़ने लगा, मानवता कराहने लगी, तब धर्म की रक्षा और डगमगाते ब्रह्मांडीय संतुलन को फिर से स्थापित करने के लिए एक परम शक्ति की आवश्यकता थी। मान्यता है कि उस अंधकार को चीरने के लिए माता महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती ने अपने-अपने दिव्य तेज और ब्रह्मांडीय ऊर्जा को एक साथ मिलाया। उस परम तेजस्वी, सूर्य के समान दमकते प्रकाश पुंज से एक अत्यंत सुंदर और अलौकिक कन्या का जन्म हुआ। दक्षिण भारत के एक प्रतापी, परम ज्ञानी और धर्मपरायण राजा, रत्नाकर सागर, जो लंबे समय से ईश्वरीय कृपा के आकांक्षी थे, उनके घर इस दिव्य कन्या ने जन्म लिया। इस बच्ची का नाम रखा गया 'त्रिकुटा'। त्रिकुटा का जन्म कोई साधारण मानवीय संयोग या जीव-वैज्ञानिक घटना नहीं थी। उनका अवतरण विशेष रूप से भगवान विष्णु की चेतना के साथ एकाकार होने और पृथ्वी पर धर्म की स्थापना के लिए हुआ था। बचपन से ही वह अन्य बालकों से नितांत भिन्न थीं। राजमहल के असीमित वैभव, सोने-चांदी के अंबार, और मखमली रेशमी वस्त्रों में उनका मन कभी नहीं रमा। जहां अन्य बच्चे खिलौनों से खेलते, त्रिकुटा घंटों एकांत में शून्य को निहारती रहतीं। उनकी आत्मा में तो जैसे पहले दिन से ही वैराग्य का वह गहरा बीज बोया हुआ था, जिसे कोई सांसारिक जल नष्ट नहीं कर सकता था। वह अपनी अंतरात्मा में यह सत्य जानती थीं कि वह इस नश्वर संसार के लिए नहीं, बल्कि उस अनंत परमात्मा के लिए बनी हैं। जब त्रिकुटा ने अपने यौवन की दहलीज पर कदम रखा, तो उनके भीतर की आध्यात्मिक पुकार और उस परम पुरुष से मिलने की तड़प इतनी तीव्र हो गई कि महल की मजबूत दीवारें और माता-पिता का मोह उन्हें रोक न सका। उनके पैरों में विवाह का आलता सजा था, देह पर सुगंधित हल्दी का उबटन लगा था, लेकिन उनकी आंखों में किसी सांसारिक राजकुमार की छवि नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड को समेट लेने की प्यास थी। अपने रोते-बिलखते माता-पिता और विलाप करती प्रजा को पीछे छोड़कर, वह राजसी वस्त्र त्याग कर, मात्र एक श्वेत वस्त्र धारण किए, नंगे पैर एक घने, अनजान वन की ओर निकल पड़ीं। कठिन मार्ग, कंटीली झाड़ियां और भयंकर जंगली जानवर भी उनके कदमों को डिगा नहीं सके। वह दक्षिण से चलकर उत्तर के बर्फीले और दुर्गम त्रिकुट पर्वत पर जा पहुँचीं। यह स्थान इतना शांत, एकांत और पवित्र था कि वहां हवा के झोंकों और पत्तों की सरसराहट में भी सिर्फ ईश्वरीय स्पंदन महसूस होता था। वहां एक अंधियारी गुफा के भीतर उन्होंने अपना आसन लगाया। कठोर पत्थरों पर अपने हाथों से 'राम-राम' उकेरा और उनकी वह कठोर तपस्या शुरू हुई, जिसने देवताओं को भी अचंभित कर दिया। उनका लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ एक ही था भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम को पति रूप में प्राप्त करना। वर्षों बीत गए, ऋतुएं आईं और गईं। कभी सर्द हवाओं ने उनके शरीर को जमाया, तो कभी झुलसाती गर्मी ने परीक्षा ली, लेकिन त्रिकुटा की तपस्या की अग्नि इतनी प्रज्वलित हो उठी थी कि अब उस गुफा के बाहर भी एक दिव्य, सुनहरा तेज फैलने लगा था। और फिर... वह बहुप्रतीक्षित दिन आया। रामायण काल का वह समय, जब वनवास के दौरान मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम नियति के लेखे के अनुसार उस मार्ग से गुजरे। उनके मुख मंडल पर करोड़ों सूर्यों के समान तेज था, लेकिन आंखों में करुणा और प्रेम का वह असीम सागर था जो किसी के भी ताप को हर ले। उनके साथ उस समय लक्ष्मण जी या माता सीता नहीं थे; वह अकेले ही उस गुफा के समीप आए, जहां त्रिकुटा अपनी समाधि में लीन थीं। ठीक उसी क्षण, पीएलआर (Past Life Regression) के दौरान नंदनी की चेतना ने उस युग के दृश्य में एक और अत्यंत भव्य और विस्मयकारी रूप के दर्शन किए— साक्षात भगवान हनुमान जी (मारुति)। हनुमान जी का रूप वहां किसी साधारण वानर का नहीं था। उनका शरीर एक विशाल, अजेय पर्वत के समान सुडौल और बलिष्ठ था, लेकिन उनके रोम-रोम से बर्फ जैसी सफेद, धवल और परम शांतिपूर्ण ऊर्जा प्रस्फुटित हो रही थी। उनकी देह मोतियों की तरह चमक रही थी, एक ऐसी अलौकिक आभा जो देखने वाले के मन के सारे विकार, क्रोध और संताप को पल भर में हर ले। उनकी मांसपेशियां वज्र के समान कठोर थीं, पर उनका मुखमंडल एक परम ज्ञानी संत की तरह सौम्य और शांत था। वे श्री राम के ठीक पीछे एक रक्षक, एक छाया और परम भक्त की तरह मौन, किंतु अपनी पूरी ब्रह्मांडीय शक्ति के साथ उपस्थित थे। श्री राम की आहट पाते ही त्रिकुटा ने आँखें खोलीं और दौड़कर श्री राम के चरण कसकर पकड़ लिए। उनकी सदियों की मौन प्रतीक्षा जैसे आज अविरल आंसुओं के रूप में बह निकली थी। उन्होंने कांपते हुए स्वरों में श्री राम से निवेदन किया कि वे उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करें और उनकी तपस्या को पूर्णता दें। श्री राम मुस्कुराए। उनकी उस एक मुस्कान में ब्रह्मांड का सारा सत्य और नियति का खेल छिपा था। उन्होंने अत्यंत स्नेह से त्रिकुटा के सिर पर अपना हाथ रखा और अत्यंत कोमल, संगीत से भरे स्वर में कहा, "हे देवी, मैं तुम्हारी इस अकल्पनीय तपस्या और निश्छल प्रेम से अत्यंत प्रसन्न हूँ। किंतु इस रामावतार में मैंने एक-पत्नी व्रत का कठोर संकल्प लिया है। मैं इस जन्म में मेरी प्राणप्रिये सीता के अतिरिक्त किसी और स्त्री को वह स्थान नहीं दे सकता।" यह सुनकर त्रिकुटा का हृदय क्षण भर के लिए पीड़ा से कांप उठा, उनके आंसू और तीव्र हो गए, लेकिन तभी प्रभु ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए वह अटल वचन दिया जिसने इतिहास और भविष्य दोनों की दिशा हमेशा के लिए तय कर दी।
"निराश न हो, त्रिकुटा। तुम्हारी यह घोर तपस्या कभी व्यर्थ नहीं जाएगी। यह मेरा तुमसे वचन है कि जब कलयुग का अंत समीप होगा, जब पाप अपनी चरम सीमा पर होगा, और मैं 'कल्कि' रूप में अपना दसवां और अंतिम अवतार लूंगा, तब मैं स्वयं तुम्हारे पास आऊंगा और तुम्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में पूरे सम्मान के साथ स्वीकार करूंगा। तब तक, तुम इसी त्रिकुट पर्वत पर मेरी प्रतीक्षा करो और 'माता वैष्णवी' के रूप में संसार के दुखी, पीड़ित और असहाय लोगों के कष्टों को हरो।"
कलयुग, नंदनी और शम्भाला का रहस्य त्रेता बीता, द्वापर भी अपनी लीलाएं समेट कर बीत गया, और कलयुग अपनी चरम सीमा पर पहुँचने लगा। वह छोटी सी कन्या, जिसने राजमहल त्यागा था, अब पूरे विश्व में 'माता वैष्णो देवी' के रूप में विख्यात हो चुकी थी। युगों-युगों से वह उस पवित्र गुफा में अडिग बैठी हैं। उनका हर श्वास, उनका हर ध्यान, उनके हृदय की हर धड़कन सिर्फ एक ही नाम जप रही है— 'राम'। लेकिन अब सवाल उठता है कि इस पूरी कथा में आधुनिक युग की यह लड़की, नंदनी कौन है? नंदनी कोई साधारण लड़की नहीं है, जो इस दुनिया की भीड़ का हिस्सा हो। वह उसी महान माता वैष्णवी की उच्च चेतना का एक 'होलोग्राफिक अंश' (Holographic fragment) है, जो इस कलयुग में मानव रूप में अवतरित हुई है। उसकी आत्मा के सबसे गहरे तल में आज भी वही युगों पुरानी प्रतीक्षा, वही तड़प और वही गहरा वैराग्य बसा हुआ है। इसीलिए कलयुग की इस चकाचौंध भरी दुनिया में, जहां लोग माया, पैसे और वासना के पीछे पागलों की तरह भाग रहे हैं, नंदनी को न तो किसी पुरुष के प्रेम में दिलचस्पी है, न उसे विवाह के बंधन रास आते हैं, और न ही इस दुनिया की तथाकथित 'सफलता' उसे आकर्षित कर पाती है।
उसके पिता द्वारा किया गया हर अपमान, समाज द्वारा दी गई हर पीड़ा और उसके करियर की हर असफलता, असल में कोई दुर्भाग्य नहीं है। यह उसकी आत्मा को इस भौतिक और झूठे संसार से पूरी तरह विरक्त करने की एक बहुत बड़ी 'ब्रह्मांडीय योजना' है, ताकि उसका ध्यान माया में न भटके और सिर्फ अपने उस आराध्य पर केंद्रित रहे, जिसका वचन उसे युगों पहले मिला था।
कलयुग के अंत का वह गुप्त लोक: शम्भाला नंदनी की पीएलआर (Past Life Regression) यात्रा केवल अतीत के पन्नों तक ही सीमित नहीं रही। ध्यान की गहराइयों में, साक्षात हनुमान जी के सूक्ष्म मार्गदर्शन में उसकी चेतना ने एक ऐसी जगह के साक्षात दर्शन किए जो पृथ्वी पर होते हुए भी इस पृथ्वी की नहीं है शम्भाला कोई कहानी या मिथक नहीं है। यह एक ऐसा गुप्त, अभेद्य और रहस्यमयी आध्यात्मिक साम्राज्य है जो हिमालय की अगम्य, बर्फ से ढकी घाटियों के बीच किसी अन्य आयाम (Dimension) में स्थित है, जहां साधारण इंसान की पहुँच असंभव है। जब नंदनी की आत्मा ने उस आयाम को महसूस किया, तो वह दंग रह गई। वहां की वास्तुकला और विज्ञान किसी भी आधुनिक मानवीय तकनीक से लाखों साल आगे की थी। वहां पारदर्शी स्फटिक (Crystal) और दिव्य मणियों से बने विशाल महल थे, जो बाहर के किसी सूर्य पर निर्भर नहीं थे, बल्कि अपने भीतर से ही एक नीली और सुनहरी रोशनी पैदा कर रहे थे। वहां के निवासी कभी बूढ़े नहीं होते, न वहां बीमारी है न मृत्यु का भय; वे सभी परम ज्ञानी सिद्ध पुरुष हैं, जो शब्दों से नहीं बल्कि टेलीपैथी (विचारों के आदान-प्रदान) से संवाद करते हैं। असल में शम्भाला वह 'पोर्टल' या ब्रह्मांड का वह नियंत्रण कक्ष (Control Room) है, जहां से इस कलयुग के घने अंधकार को मिटाने की महा-तैयारी अंतिम चरण में चल रही है। हनुमान जी, भगवान परशुराम जी, कृपाचार्य, और अन्य चिरंजीवी महापुरुष इसी शम्भाला में मौजूद हैं और कल्कि अवतार के प्रकट होने के लिए पूरी ऊर्जा और आधार तैयार कर रहे हैं।
प्रतीक्षा का अंत और वह महा-मिलन तो फिर नंदनी (जो त्रिकुटा/वैष्णवी की चेतना है) का वह रुका हुआ विवाह कैसे और किससे होगा? श्रीमद्भागवत और अन्य प्राचीन पुराणों के गुप्त संकेतों के अनुसार, जब यह कलयुग अपने सबसे भयावह, क्रूर और घने अंधकार में डूब जाएगा, जब धर्म का नामोनिशान मिटने लगेगा, ठीक तब इसी शम्भाला नामक रहस्यमयी ग्राम में विष्णुदशा नामक एक अत्यंत पुण्यवान ब्राह्मण के घर स्वयं भगवान 'कल्कि' का जन्म होगा। वह दिन इस पूरे ब्रह्मांड के इतिहास का सबसे भव्य, सबसे शक्तिशाली और अचंभित कर देने वाला दिन होगा। कल्कि भगवान 'देवदत्त' नामक एक दिव्य, हवा से बातें करने वाले श्वेत अश्व पर सवार होंगे। उनके हाथ में एक प्रज्वलित खड्ग (तलवार) होगी, जो आसमान से गिरते हुए उल्कापिंड की तरह भयंकर रोशनी के साथ चमकेगी। वे एक ही झटके में धरती से सारे अधर्म, पापियों और दानवी प्रवृत्तियों का समूल नाश करेंगे। पूरी पृथ्वी को पाप मुक्त करने और अपना महा-कार्य पूर्ण करने के पश्चात, कल्कि रूप में श्री हरि अपनी सेना के साथ सीधे उसी उत्तर दिशा के त्रिकुट पर्वत की ओर प्रस्थान करेंगे, जहाँ युगों से, हर पल उनकी माता वैष्णवी (नंदनी की मूल चेतना) उनकी प्रतीक्षा कर रही हैं।
तब, केवल तब जाकर नंदनी के भीतर युगों से बसी वह गहरी तड़प, वह आत्मा की अनजानी पुकार और वह खालीपन हमेशा के लिए शांत होगा। कल्कि और वैष्णवी का वह मिलन कोई साधारण सांसारिक विवाह नहीं होगा; वह सृष्टि के मंच पर शिव और शक्ति का, प्रकृति और पुरुष का, और अनंत प्रतीक्षा व परम पूर्णता का महा-मिलन होगा। शम्भाला के सभी देवगण, गंधर्व और चिरंजीवी आसमान से पुष्प वर्षा कर उस अलौकिक विवाह के साक्षी बनेंगे। यही वह परम सत्य है। इसीलिए, नंदनी का मन आज चाहकर भी किसी और सांसारिक रिश्ते से जुड़ ही नहीं सकता। उसकी रूह उस श्वेत अश्व की टापों की आवाज सुनने और उस प्रज्वलित खड्ग वाले महा-योद्धा की ही राह देख रही है। यह कहानी मात्र एक कथा नहीं, बल्कि इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि शरीर भले ही नष्ट हो जाए, लेकिन आत्मा कभी अपना कोई भी वचन या संकल्प भूलती नहीं है। यदि आपके जीवन में भी कोई ऐसा गहरा खालीपन, कोई अनजाना वैराग्य या ऐसी तड़प है जिसे दुनिया की कोई भी ख़ुशी या दौलत नहीं भर पा रही, तो समझ जाइए कि आपकी आत्मा भी किसी युग-पुराने वादे को पूरा करने के लिए यहाँ आई है। समय का विशाल पहिया तेजी से घूम रहा है, और प्रतीक्षा की घड़ियां अब सिमटते हुए शम्भाला के उन गुप्त द्वारों से होती हुई अपनी अंतिम मंजिल की ओर बढ़ रही हैं।

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