वृषभ अवतार
क्या आपने कभी इस रहस्य पर विचार किया है कि देवाधिदेव महादेव के हर शिवालय में, शिवलिंग के ठीक सम्मुख नंदी क्यों विराजमान रहते हैं? यह केवल एक वास्तु या पूजा का नियम नहीं है, बल्कि ब्रह्मांड के सबसे बड़े और रहस्यमयी महासमर का एक मूक प्रतीक है। यह उस युग की कथा है जब सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु और संहारक भगवान शिव आमने-सामने आ गए थे। एक ऐसा युद्ध जहाँ अस्त्रों का नहीं, बल्कि माया और वैराग्य का टकराव था। आइए, कालचक्र को थोड़ा पीछे घुमाते हैं और इस अद्भुत कथा के पन्नों को विस्तार से पलटते हैं।
भाग १: क्षीर सागर का मंथन और अमृत का छलावा
कथा का आरंभ उस कालखंड से होता है जब सुर और असुर, दोनों ही मृत्यु के भय से मुक्त होकर अमरत्व प्राप्त करना चाहते थे। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा और पालनकर्ता श्री हरि विष्णु के परामर्श से क्षीर सागर को मथने की महायोजना बनी। मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकी को नेती (रस्सी) बनाया गया। स्वयं भगवान विष्णु ने कच्छप (कछुआ) का रूप धरकर उस विशाल पर्वत का भार अपनी पीठ पर उठाया।
मंथन के दौरान जब हलाहल नामक महाविष प्रकट हुआ, तो उसकी ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। तब परमपिता शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर 'नीलकंठ' का स्वरूप पाया। कई दिव्य रत्नों के बाद अंततः धन्वंतरि वैद्य अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। अमृत देखते ही असुरों की नीयत बदल गई और वे कलश लेकर भाग खड़े हुए।
असुरों को रोकने के लिए बल नहीं, छल की आवश्यकता थी। भगवान विष्णु ने अपनी योगमाया से कुछ अत्यंत मनमोहक और रूपवती अप्सराओं की रचना की। इन अप्सराओं का सौंदर्य ऐसा था कि जो भी उन्हें देखे, सुध-बुध खो बैठे। जब असुरों ने इन अप्सराओं को देखा, तो वे अमृत भूलकर उनके पीछे पाताल लोक की अंधेरी गहराइयों में चले गए। इसी बीच श्री हरि ने 'मोहिनी' अवतार लेकर सारा अमृत देवताओं को पान करा दिया।
भाग २: पाताल का अंधकार और एक विचित्र वरदान
जब असुरों को अपने साथ हुए इस छल का भान हुआ, तो वे क्रोध से पागल हो उठे। उन्होंने उन दिव्य अप्सराओं को बंदी बना लिया और पाताल लोक की दुर्गम गुफाओं में कैद कर दिया। उधर, देवताओं ने अमृत पीकर असुरों को युद्ध में परास्त कर दिया। बचे हुए असुर प्राण बचाकर पाताल में छिप गए।
असुरों का समूल नाश करने के लिए भगवान विष्णु स्वयं पाताल लोक पहुंचे। भीषण युद्ध में दानवों का वध करने के पश्चात, गुफाओं में भटकते हुए उन्हें वे बंदी अप्सराएं मिलीं। श्री हरि ने जब उन्हें मुक्त किया, तो विष्णु के उस दिव्य, तेजोमय और करुणा से भरे स्वरूप को देखकर अप्सराएं मोहित हो गईं। उनके मन में एक गहरी लालसा उत्पन्न हुई— काश! हमें भी भगवान विष्णु जैसा ही स्वामी मिले।
अपने इसी मनोरथ को पूर्ण करने के लिए वे अप्सराएं कठोर हिमालय की ओर चल पड़ीं। बर्फीली आंधियों और दुर्गम रास्तों को पार करते हुए वे कैलाश पहुंचीं, जहाँ महादेव गहन समाधि में लीन थे। वर्षों तक चली उनकी कठोर तपस्या से अंततः आशुतोष भगवान शिव प्रसन्न हुए।
"तुम्हारी क्या इच्छा है, देवियों?" महादेव की शांत वाणी गूंजी।
अप्सराओं ने नतमस्तक होकर कहा, "हे त्रिलोकीनाथ! हमें श्री हरि विष्णु के समान पति की प्राप्ति हो, यही हमारा एकमात्र वरदान है।"
महादेव जो भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता हैं, जानते थे कि यह वरदान सृष्टि के संतुलन को हिला सकता है। परंतु शिव तो ठहरे भोलेनाथ; वे अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते। उन्होंने 'तथास्तु' कह दिया।
भाग ३: माया का पाश और विष्णु पुत्रों का जन्म
शिव के वरदान और माया के अद्भुत प्रभाव से सब कुछ बदल गया। भगवान विष्णु, जो संपूर्ण जगत के पालनहार हैं, अपनी ही रची माया और शिव के वरदान के प्रभाव में आकर पाताल में ही रुक गए। उनकी स्मृतियों पर एक ऐसा आवरण पड़ गया कि वे अपना वास्तविक स्वरूप, अपना बैकुंठ लोक, देवी लक्ष्मी और ब्रह्मांड के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरी तरह भूल गए। वे उन अप्सराओं के साथ एक साधारण गृहस्थ की भाँति पाताल में निवास करने लगे।
समय अपनी गति से चलता रहा। उन अप्सराओं के गर्भ से अनेक पुत्रों का जन्म हुआ। क्योंकि वे साक्षात श्री हरि की संतानें थीं, इसलिए उनके भीतर अपार बल और असीमित शक्तियां थीं। परंतु, पाताल लोक की नकारात्मक ऊर्जा, असुरों के परिवेश और जन्म के समय अप्सराओं की पूर्व-पीड़ा के कारण उन पुत्रों का स्वभाव पूर्णतः राक्षसी और हिंसक हो गया।
"हम स्वयं भगवान विष्णु के अंश हैं, हमें कौन हरा सकता है!" इसी घमंड में अंधे होकर उन विष्णु पुत्रों ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया।
भाग ४: त्रिलोक में त्राहिमाम
उन क्रूर पुत्रों ने सबसे पहले मृत्युलोक (पृथ्वी) को अपना निशाना बनाया। वे शांत आश्रमों में घुस जाते, यज्ञ की पवित्र अग्नि को अपवित्र कर देते और तपस्यारत ऋषियों को कठोर यातनाएं देते। जब महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, तो उन्होंने उनका पूरा आश्रम उजाड़ दिया।
पृथ्वी के बाद उनकी दृष्टि स्वर्ग पर पड़ी। देवराज इंद्र के दरबार को उन्होंने तहस-नहस कर दिया। देवताओं के भीतर इतना साहस नहीं था कि वे विष्णु की संतानों पर प्रहार कर सकें। उन्हें भय था कि यदि उन्होंने विष्णु पुत्रों को खरोंच भी पहुंचाई, तो नारायण का क्रोध उन्हें भस्म कर देगा। धीरे-धीरे, धर्म का पतन होने लगा और अधर्म ने अपने पैर पसार लिए।
भाग ५: कैलाश पर पुकार और वृषभ का प्राकट्य
जब जल सिर के ऊपर से गुजर गया, तब देवराज इंद्र, ब्रह्मा जी और समस्त ऋषि-मुनि त्राहि-त्राहि करते हुए कैलाश पर्वत पहुंचे। उन्होंने शिव की स्तुति की और सारा वृत्तांत सुनाया।
ब्रह्मा जी ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "हे महादेव! वे श्री हरि की संतानें हैं। देवता असहाय हैं और स्वयं नारायण माया के अधीन होकर पाताल में बैठे हैं। यदि आपने कुछ नहीं किया, तो सृष्टि रसातल में चली जाएगी।"
महादेव के नेत्र धीरे से खुले। उनके चेहरे पर एक असीम शांति थी। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, "जब अधर्म चरम पर हो, तो उसे रोकना ही परम धर्म है। चाहे वह अधर्म किसी साधारण जीव द्वारा हो रहा हो, या फिर मेरे आराध्य नारायण के वंशजों द्वारा। इस असंतुलन को मैं ठीक करूंगा।"
इतना कहते ही महादेव ने अपने नेत्र बंद कर लिए। अचानक, कैलाश पर्वत पर एक दिव्य और प्रखर नीले रंग का प्रकाश फूट पड़ा। उस प्रकाश की चमक इतनी तीक्ष्ण थी कि देवताओं को अपनी आँखें मूंदनी पड़ीं। जब प्रकाश थोड़ा शांत हुआ, तो सभी ने देखा कि वहाँ शिव नहीं, बल्कि एक अति-विशाल, नीले रंग का तेजोमय 'वृषभ' (बैल) खड़ा था।
यह शिव का वृषभ अवतार था। उसके सींगों से ब्रह्मांडीय ऊर्जा निकल रही थी, उसकी देह पहाड़ों से भी विशाल थी, और उसकी आँखों में एक ऐसी स्थिरता थी जो तूफानों को भी शांत कर दे। बिना कोई हुंकार भरे, वह दिव्य वृषभ धीमी गति से पाताल की ओर बढ़ चला। उसके खुरों की हर थाप से धरती कांप रही थी।
भाग ६: पाताल का महासंग्राम
पाताल लोक के गहरे अंधकार में विष्णु पुत्र अपनी जीत का जश्न मना रहे थे, तभी प्रवेश द्वार से एक नीले प्रकाश ने पूरे पाताल को रोशन कर दिया। उन्होंने देखा कि एक विशालकाय बैल उनकी ओर चला आ रहा है।
अहंकार में चूर एक पुत्र ने उपहास करते हुए कहा, "कायर देवताओं ने अब हमसे लड़ने के लिए एक पशु को भेजा है!"
उन्होंने वृषभ पर अपने विनाशकारी अस्त्रों और मायावी शक्तियों की वर्षा कर दी। अग्निबाण, वज्र, गदा—सब कुछ वृषभ पर चलाए गए। लेकिन जैसे ही वे अस्त्र वृषभ के समीप पहुंचते, एक दिव्य शांति में विलीन हो जाते। वृषभ बिल्कुल अडिग और मौन खड़ा रहा। उसकी इसी अचल स्थिरता ने विष्णु पुत्रों के भीतर भय पैदा कर दिया।
तभी वृषभ ने अपना एक अगला खुर उठाया और पूरी शक्ति से पाताल की धरती पर दे मारा। उस एक प्रहार से उत्पन्न हुई ध्वनि और कंपन ने पाताल लोक की नीवें हिला दीं। विष्णु पुत्रों की सारी माया छिन्न-भिन्न हो गई। इसके बाद वृषभ ने अपने सींगों और खुरों से एक-एक करके अधर्म के प्रतीक बन चुके उन सभी विष्णु पुत्रों का संहार कर दिया। वहां केवल रक्त और सन्नाटा शेष रह गया।
भाग ७: हरि और हर का आमना-सामना
जब अप्सराओं ने अपने पुत्रों को मृत देखा, तो वे विलाप करती हुई भगवान विष्णु के पास पहुंचीं। अपने पुत्रों के वध का समाचार सुनकर, माया के प्रभाव में जी रहे नारायण अत्यंत क्रोधित हो उठे।
विष्णु अपने सभी दिव्य आयुधों—सुदर्शन चक्र, कौमोदकी गदा, और शार्ङ्ग धनुष—के साथ युद्ध भूमि में आ डटे। सामने अपने पुत्रों के शवों और उस विशाल नीले वृषभ को देखकर नारायण ने गरजते हुए कहा, "तूने मेरे वंश का नाश किया है, अब मेरे हाथों तेरा अंत निश्चित है!"
विष्णु ने अपने सबसे अचूक अस्त्र, सुदर्शन चक्र का आह्वान किया और वृषभ की ओर छोड़ दिया। ब्रह्मांड को भस्म करने की शक्ति रखने वाला सुदर्शन चक्र जब वृषभ के पास पहुंचा, तो उसकी गति अचानक रुक गई। वह वृषभ की परिक्रमा करके वापस श्री हरि के पास लौट आया। विष्णु ने तीरों की झड़ी लगा दी, गदा से प्रहार किए, लेकिन शिव के उस अवतार पर खरोंच तक नहीं आई। वृषभ रूपी शिव ने पलटवार नहीं किया; वे केवल नारायण के प्रहारों को शांत भाव से ग्रहण करते रहे।
यह अकल्पनीय युद्ध कई दिनों तक चला। तीनों लोकों की सांसें अटकी हुई थीं। अंततः, अप्सराओं को अपनी भूल का आभास हुआ। उन्हें समझ आ गया कि यह विनाश उनके उसी स्वार्थी वरदान का परिणाम है।
वे भागते हुए वृषभ के चरणों में गिर पड़ीं और रोते हुए प्रार्थना करने लगीं, "हे महादेव! हमें क्षमा करें। अपने उस वरदान को वापस ले लें जिसने स्वयं नारायण को उनके मार्ग से भटका दिया है।"
भाग ८: माया का अंत और धर्म की पुनर्स्थापना
जैसे ही शिव ने मन ही मन उस वरदान को निरस्त किया, पाताल लोक से माया का वह सघन आवरण छंट गया। भगवान विष्णु को तुरंत अपनी वास्तविक पहचान, अपना बैकुंठ और अपने परम स्वरूप का स्मरण हो आया। उन्होंने देखा कि सामने कोई साधारण पशु नहीं, बल्कि स्वयं उनके परम मित्र और आराध्य, महादेव वृषभ रूप में खड़े हैं।
श्री हरि के हाथों से अस्त्र गिर गए। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, "हे नीलकंठ! माया के वशीभूत होकर मैं अपने ही पुत्रों के अधर्म को नहीं देख पाया। आपने मेरे अंधकार को दूर किया और धर्म की रक्षा की। मैं आपका ऋणी हूँ।"
वृषभ के भीतर से महादेव अपने मूल स्वरूप में प्रकट हुए और मुस्कुराते हुए बोले, "हे नारायण! यह कोई पराजय नहीं थी। यह सृष्टि को दिया गया एक संदेश था कि जब अधर्म आपके अपनों के भीतर पनपने लगे, तो मोह का त्याग करके उसका विनाश करना ही सबसे बड़ा धर्म है।"
इस घटना के बाद, भगवान शिव का यह वृषभ (नंदी) स्वरूप धर्म, धैर्य और अडिग स्थिरता का प्रतीक बन गया।
यही कारण है कि आज भी हर शिवालय में नंदी महाराज शिवलिंग के ठीक सामने बैठते हैं। जब हम नंदी के कानों में अपनी प्रार्थना कहते हैं या उनके सींगों के बीच से शिवलिंग के दर्शन करते हैं, तो हम वास्तव में उसी अचल, शांत और धर्म-रक्षक शक्ति का स्मरण करते हैं जिसने स्वयं नारायण को माया के जाल से बाहर निकाला था।
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