क्या आप जानते हैं कि हजारों वर्ष पूर्व एक ऐसे महान ऋषि का जन्म हुआ था, जिन्होंने न केवल भगवान वेदव्यास जैसे दिव्य पुत्र को जन्म दिया, बल्कि कलयुग की उन भयंकर और हृदयविदारक सच्चाइयों को भी अपनी दिव्य दृष्टि से पहले से ही देख लिया और लिपिबद्ध कर दिया, जो आज हम अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देख रहे हैं? एक ऐसा बालक, जिसकी रक्षा नियति ने स्वयं की, और जिसका प्रारंभिक क्रोध पूरे ब्रह्मांड को थर्रा देने वाला था। इस गहन कथा को लिखते समय मैंने पूरे हृदय से प्रयास किया है। यदि आपको यह पसंद आए, तो कृपया लाइक अवश्य करें, कमेंट में हर हर महादेव लिखें और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें। सृष्टि के आदि काल से ही भारत की यह पावन भूमि ऋषि-मुनियों की तपस्या, ज्ञान और करुणा से सुगंधित रही है। लेकिन कभी-कभी अधर्म की छाया इतनी घनी हो जाती है कि वह ऋषि कुलों तक पहुँचकर उनकी शांति भंग कर देती है। यह महाकथा आरंभ होती है ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के दिव्य आश्रम से, जहाँ चारों ओर वेदों की ध्वनि गूँजती थी और शांति का साम्राज्य था। वशिष्ठ, जो ब्रह्मा के मानस पुत्र थे, उनके तेज से दिशाएँ सदैव प्रकाशित रहती थीं। उनके ज्येष्ठ पुत्...
क्या आप जानते हैं कि हजारों वर्ष पूर्व एक ऐसे महान ऋषि का जन्म हुआ था, जिन्होंने न केवल भगवान वेदव्यास जैसे दिव्य पुत्र को जन्म दिया, बल्कि कलयुग की उन भयंकर और हृदयविदारक सच्चाइयों को भी अपनी दिव्य दृष्टि से पहले से ही देख लिया और लिपिबद्ध कर दिया, जो आज हम अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देख रहे हैं? एक ऐसा बालक, जिसकी रक्षा नियति ने स्वयं की, और जिसका प्रारंभिक क्रोध पूरे ब्रह्मांड को थर्रा देने वाला था। इस गहन कथा को लिखते समय मैंने पूरे हृदय से प्रयास किया है। यदि आपको यह पसंद आए, तो कृपया लाइक अवश्य करें, कमेंट में हर हर महादेव लिखें और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें। सृष्टि के आदि काल से ही भारत की यह पावन भूमि ऋषि-मुनियों की तपस्या, ज्ञान और करुणा से सुगंधित रही है। लेकिन कभी-कभी अधर्म की छाया इतनी घनी हो जाती है कि वह ऋषि कुलों तक पहुँचकर उनकी शांति भंग कर देती है। यह महाकथा आरंभ होती है ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के दिव्य आश्रम से, जहाँ चारों ओर वेदों की ध्वनि गूँजती थी और शांति का साम्राज्य था। वशिष्ठ, जो ब्रह्मा के मानस पुत्र थे, उनके तेज से दिशाएँ सदैव प्रकाशित रहती थीं। उनके ज्येष्ठ पुत्र थे शक्ति मुनि—शास्त्रों में पारंगत, धैर्य और तप में पिता के समान। शक्ति मुनि की पत्नी अदृश्यंती भी तपस्विनी थीं, जिनका हृदय शुद्धता और प्रेम से भरा था।
एक दिन शक्ति मुनि एक संकरे वन पथ से गुजर रहे थे। उसी समय इक्ष्वाकु वंश के राजा कल्माषपाद अपनी विशाल सेना के साथ शिकार से लौट रहे थे। पथ इतना तंग था कि एक समय में केवल एक व्यक्ति ही गुजर सकता था। शास्त्रों में स्पष्ट है कि ऐसे मार्ग पर पहले अधिकार ब्राह्मण और तपस्वी का होता है। लेकिन अहंकार से अंधा राजा कल्माषपाद ने शक्ति मुनि को हटने का कठोर आदेश दिया। शक्ति मुनि ने शांत स्वर में कहा, "हे राजन, शास्त्रों की मर्यादा का पालन कीजिए। एक तपस्वी को मार्ग देना राजा का परम कर्तव्य है।" राजा का क्रोध भड़क उठा। उन्होंने आवेश में आकर कोड़े से शक्ति मुनि पर प्रहार किया। यह प्रहार केवल एक ऋषि के शरीर पर नहीं, बल्कि समस्त ऋषि परंपरा की गरिमा पर था।
उस क्रोध के क्षण में शक्ति मुनि के मुख से शाप निकला, "अज्ञानी राजन, तूने निरपराध तपस्वी का अपमान किया है। इसी क्षण से तू नरभक्षी राक्षस बन जाएगा।" शाप होते ही राजा का रूप विकृत हो गया—खाल काली पड़ गई, दाँत बाहर निकल आए, आँखें रक्त से लाल हो गईं। लेकिन कहानी में बड़ा मोड़ तब आया, जब एक मायावी राक्षस किंकर ने राजा के शरीर में प्रवेश कर लिया। राक्षस बनते ही कल्माषपाद ने सबसे पहले शक्ति मुनि को अपना शिकार बना लिया और उन्हें खा गया।
यह दुःखद समाचार जब महर्षि वशिष्ठ तक पहुँचा, तो उनके चरण काँप उठे। उस शापित राक्षस ने एक-एक करके उनके सभी सौ पुत्रों का वध कर दिया। एक पिता के लिए इससे बड़ा दुख क्या हो सकता था? वशिष्ठ शोक में डूब गए। उन्होंने प्राण त्यागने का दृढ़ निश्चय किया। वे सुमेरु पर्वत की सबसे ऊँची चोटी पर गए और कूद पड़े, लेकिन धरती ने उन्हें रुई की तरह थाम लिया। अग्नि कुंड में प्रवेश किया, तो अग्नि शीतल हो गई। समुद्र में छलांग लगाई, तो लहरों ने उन्हें तट पर लौटा दिया। विपाशा नदी में गिरे, लेकिन नदी ने उनके बंधन खोल दिए और उन्हें डूबने नहीं दिया।
हताश और थके हुए वे आश्रम की ओर लौट रहे थे। पीछे-पीछे उनकी पुत्रवधू अदृश्यंती चुपचाप चल रही थी। अचानक हवाओं में वेदों का मधुर स्वरूप उच्चारण गूँजने लगा। वशिष्ठ चौंक उठे। इस निर्जन वन में इतनी शुद्धता से वेद कौन पढ़ रहा है? उन्होंने पीछे मुड़कर देखा—केवल अदृश्यंती खड़ी थीं। उन्होंने पूछा, "पुत्री, यह दिव्य ध्वनि कहाँ से आ रही है?" अदृश्यंती की आँखें आँसुओं से भर आईं। उन्होंने कहा, "पिताश्री, यह ध्वनि मेरे गर्भ से आ रही है। आपके पुत्र शक्ति मुनि का अंश मेरे गर्भ में 12 वर्षों से पल रहा है। वह गर्भ में ही वेदों का अभ्यास कर रहा है, जैसे कोई सिद्ध पुरुष तप में लीन हो।"
यह सुनकर वशिष्ठ के हृदय में जीवन की नई किरण जागी। उन्हें लगा कि वंश का दीपक अभी बुझा नहीं है—वह और अधिक तेजस्वी बनकर जलेगा। समय बीतता गया। एक दिन आकाश में दिव्य प्रकाश फैला और एक अत्यंत तेजस्वी बालक का जन्म हुआ। जन्मते ही चारों ओर अमृत-सी सुगंध फैल गई, फूल खिल उठे और पक्षी मधुर स्वर में गाने लगे। वशिष्ठ ने उस बालक का नाम रखा—पराशर, क्योंकि उसने दादा को मृत्यु के पाश से मुक्त (पराशर) किया था।
बालक पराशर आश्रम के शांत वातावरण में बड़े होने लगे। वशिष्ठ उन्हें स्वयं वेद, शास्त्र और योग की शिक्षा देते। पराशर की बुद्धि अत्यंत कुशाग्र थी। वे वशिष्ठ को "तात" कहकर पुकारते, और वशिष्ठ उनमें अपने पुत्र शक्ति की छवि देखकर हृदय से प्रसन्न होते। आश्रम के हर पशु-पक्षी पराशर के मित्र बन गए। वे उन्हें फल खिलाते, उनके साथ खेलते। लेकिन अदृश्यंती ने सालों तक एक गहन सत्य अपने सीने में छिपाए रखा—उन्हें नहीं चाहती थीं कि उनका पुत्र प्रतिशोध की अग्नि में जल जाए।
एक दिन, जब पराशर की आयु मात्र पाँच-छह वर्ष थी, वे खेलते-खेलते माँ के पास आए। बोले, "माता, मैंने आश्रम के बाहर अन्य बालकों को देखा। वे अपने पिताओं के साथ हँसते-खेलते थे। मेरे पिता कहाँ हैं? क्या वे दूर किसी तीर्थ में तपस्या कर रहे हैं? आप मुझे कब उनके पास ले चलेंगी?" अदृश्यंती का हृदय काँप उठा। वे कुछ बोल नहीं पाईं। उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। नन्हा पराशर माँ की व्याकुलता देखकर सहम गया। वे दौड़कर वशिष्ठ के पास पहुँचे। वशिष्ठ उस समय संध्या वंदन कर रहे थे। पराशर ने उनके वस्त्र खींचे और पूछा, "तात, माता मेरे पिता का नाम सुनते ही रोने लगती हैं। मुझे सत्य बताइए—मेरे पिता कौन हैं? वे हमसे दूर क्यों हैं?"
वशिष्ठ ने गहरी साँस ली। उन्हें लगा कि अब बालक से सत्य छिपाना उचित नहीं। उन्होंने पराशर को गोद में बिठाया और उनकी आँखों में झाँकते हुए कहा, "पुत्र, तुम्हारे पिता महर्षि शक्ति थे। वे परम ज्ञानी, तपस्वी और शांत स्वभाव के थे। लेकिन एक क्रूर राक्षस ने छल से उनका वध कर दिया।" राक्षस और वध शब्द सुनते ही पराशर का कोमल चेहरा बदल गया। उनकी आँखें धधकते अंगारों-सी लाल हो गईं। वे गोद से उतरे, छोटे-छोटे हाथ मुट्ठियों में भींच लिए। उनके शरीर से एक दिव्य लेकिन भयानक तेज निकलने लगा। उनकी मधुर आवाज अचानक गंभीर गर्जना-सी हो गई। बोले, "राक्षस ने मेरे पिता को खा लिया और यह संसार अभी भी शांत है? यह आकाश क्यों नहीं फट जाता? यह धरती क्यों नहीं डोलती? न्याय कहाँ है? माता सालों से रोती रही, आप शोक में डूबे रहे, लेकिन मैं ऐसा नहीं करूँगा।"
अदृश्यंती दौड़कर आईं और पुत्र को गले लगाने की कोशिश की। "बेटा, शांत हो जाओ। प्रतिशोध की अग्नि पहले अपने को ही जला डालती है।" लेकिन पराशर ने धीरे से माँ के हाथ हटा दिए। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे—क्रोध के आँसू। उन्होंने आसमान की ओर हाथ उठाकर कहा, "मैं शपथ लेता हूँ—जिस राक्षस जाति ने मेरे पिता का रक्त बहाया, मैं उस पूरी जाति का समूल नाश कर दूँगा। मैं इस ब्रह्मांड से राक्षसों का नामोनिशान मिटा दूँगा। यदि मेरे पिता के संस्कार मुझमें हैं, तो आज से प्रकृति मेरे क्रोध की साक्षी बनेगी।" उस नन्हे बालक के संकल्प से आश्रम के वृक्ष काँप उठे। आकाश में बिजली कड़कने लगी, बादल काले पड़ गए। वशिष्ठ ने देखा—बालक के भीतर का ऋषि अब एक विनाशकारी योद्धा में बदल चुका था।
पराशर ने दादा की ओर देखा और कहा, "तात, मुझे अनुमति दीजिए। मैं ऐसा यज्ञ करूँगा जो सृष्टि ने कभी देखा नहीं, न सुना है। मैं राक्षस-सत्र प्रारंभ करूँगा।" वशिष्ठ निरुत्तर थे। वे समझ गए कि शक्ति मुनि का पुत्र अब शांत होने वाला नहीं। पराशर ने तुरंत अपनी योग शक्ति का आह्वान किया। उस छोटे से बालक ने रेत से वेदी बनाई और मंत्रों का ऐसा उच्चारण शुरू किया कि प्रतिध्वनि तीनों लोकों में गूँज उठी। वातावरण में असह्य गर्मी फैलने लगी। देखते-देखते साधारण अग्नि विशाल ज्वालामुखी-सी हो गई। उसकी तपिश इतनी प्रबल थी कि योजन दूर बैठे राक्षस घबराहट में खड़े हो गए। उन्हें आभास हो गया कि उनकी मृत्यु निकट है।
पराशर की आँखों में अब न ममता थी, न बचपन—केवल प्रतिशोध का ध्येय। उन्होंने हाथों में जल लिया और संकल्प किया। जैसे ही जल भूमि पर गिरा, भीषण गर्जना हुई। अदृश्य शक्ति सक्रिय हो गई। राक्षस, जो कभी ऋषियों को डराते थे, अब चीखते हुए उस अग्नि की ओर खिंचे चले आ रहे थे। अदृश्यंती भयभीत होकर यह दृश्य देख रही थीं। उन्हें लग रहा था कि उनका पुत्र कहीं इस क्रोध में स्वयं को खो न दे। लेकिन पराशर के होंठ निरंतर मंत्र जप रहे थे। उनकी एकाग्रता इतनी प्रबल थी कि देवता भी स्वर्ग से झाँकने लगे। क्या एक पाँच वर्षीय बालक वास्तव में पूरी राक्षस जाति का अंत कर देगा? क्या यह यज्ञ सफल होगा या सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाएगा?
यज्ञ की लपटें अब आकाश को छू रही थीं, उनका रंग गहरा रक्तिम हो गया। हर आहुति के साथ भयानक चीख गूँजती। राक्षस हवा में उड़ते हुए अग्नि में गिरते, कभी पेड़ पकड़कर बचने की कोशिश करते, लेकिन मंत्रों की शक्ति से वृक्ष जड़ से उखड़ जाते और वे भी भस्म हो जाते। यह कोई साधारण प्रतिशोध नहीं था—यह एक बालक द्वारा ब्रह्मांडीय न्याय को अपने हाथ में लेने की चेष्टा थी। देवलोक में इंद्र और अन्य देवता काँपने लगे। उन्हें भय था कि यदि राक्षसों का समूल नाश हो गया तो सृष्टि का संतुलन—अंधकार और प्रकाश का—बिगड़ जाएगा।
तभी हवा अचानक ठंडी पड़ गई। काला धुआँ छंटने लगा। चारों ओर अलौकिक श्वेत प्रकाश फैल गया। महर्षि वशिष्ठ, जो अब तक मौन रहकर सब देख रहे थे, धीरे से आगे बढ़े। उनके साथ दो दिव्य ऋषि थे—महर्षि पुलस्त्य और महर्षि क्रतु, जो राक्षसों के पितामह माने जाते थे। पुलस्त्य की आँखों में करुणा थी, क्रोध नहीं। वशिष्ठ ने पराशर के कंधे पर हाथ रखा। उस स्पर्श में इतनी शांति थी कि पराशर के मंत्र धीमे पड़ गए। वशिष्ठ बोले, "पुत्र पराशर, रुक जाओ। यह विनाश अब समाप्त होना चाहिए। तुमने पिता के प्रति जो श्रद्धा और क्रोध दिखाया, वह सिद्ध करता है कि तुम महान पुत्र हो। लेकिन क्या तुम जानते हो कि तुम किसे दंड दे रहे हो? ये राक्षस केवल निमित्त हैं। तुम्हारे पिता की मृत्यु नियति का हिस्सा थी।"
पराशर ने लाल आँखों से दादा की ओर देखा। बोले, "तात, क्या न्याय मांगना अपराध है? क्या उन राक्षसों को जीवित रहने का अधिकार है?" पुलस्त्य आगे आए। बोले, "हे वत्स, क्रोध वह अग्नि है जो पहले उसे जलाती है जिसमें वह उत्पन्न होती है। तुम्हारे पिता परम ज्ञानी थे। उन्होंने श्राप दिया, लेकिन प्रतिशोध नहीं चाहा। यदि तुम निरपराध राक्षसों को जला रहे हो, जो उस समय वहाँ थे भी नहीं, तो तुममें और उनमें क्या अंतर? क्षमा ही ऋषि का असली शस्त्र है।"
पराशर के हाथ में अगली आहुति के लिए रखी सामग्री थम गई। उनके भीतर महायुद्ध चल रहा था—एक ओर पिता के वध का असहनीय दुख और प्रतिशोध की ज्वाला, दूसरी ओर दादा और पुलस्त्य के ज्ञानपूर्ण वचन। अचानक उन्हें पिता के वे शब्द याद आए, जो उन्होंने स्वप्न में सुने थे—"पुत्र, ज्ञान का प्रकाश फैलाओ, विनाश का नहीं।" क्रोध के अंगारे करुणा के आँसुओं में बदल गए। उन्होंने सामग्री गिरा दी और यज्ञ वेदी के सामने दंडवत प्रणाम किया। बोले, "मैं अज्ञानी था। पीड़ा को धर्म समझ लिया। मैं यह यज्ञ यहीं समाप्त करता हूँ।"
आकाश से पुष्प वर्षा हुई। पुलस्त्य ने पराशर के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया—"पुत्र, तुमने क्रोध को जीत लिया। जो क्रोध जीत लेता है, वही त्रिकालदर्शी बनता है। मैं वरदान देता हूँ—तुम समस्त पुराणों और शास्त्रों के ज्ञाता बनोगे। तुम्हारी बुद्धि दिव्य होगी। तुम विष्णु पुराण जैसे महान ग्रंथ रचोगे। तुम्हारा नाम अमर होगा।" वशिष्ठ की आँखें संतोष से भर आईं। यज्ञ की अग्नि शांत होकर कपूर-सी सुलगने लगी। बच गए राक्षस अदृश्य होकर नमन करने लगे। आश्रम में पक्षियों का कलरव लौट आया। अदृश्यंती ने पुत्र को छाती से लगाया। पराशर को बोध हुआ—हिंसा से अंत संभव है, लेकिन क्षमा से पूरी सृष्टि जीती जा सकती है।
इस क्षण से बालक पराशर महर्षि पराशर बनने की राह पर चल पड़े। उन्होंने वशिष्ठ के चरणों में रहकर वेदों का गहन अध्ययन किया। उनकी ख्याति चारों ओर फैलने लगी। देवगुरु बृहस्पति भी उनके ज्ञान की प्रशंसा करने लगे। लेकिन नियति उन्हें केवल एक ऋषि बनाकर नहीं छोड़ना चाहती थी। उन्हें उस महाशक्ति का पिता बनना था, जो वेदों का विभाजन करेगी।
वर्ष बीतते गए। पराशर युवावस्था में प्रवेश कर चुके थे। उनके चेहरे पर वह तेज था, जिसे साधारण मनुष्य सह नहीं पाते थे। एक दिन तीर्थ यात्रा के दौरान वे यमुना नदी के तट पर पहुँचे। वातावरण शांत और पवित्र था। लेकिन उनकी दिव्य दृष्टि ने भाँप लिया कि आज इतिहास की धारा मोड़ेगी। वे नदी पार करने के लिए नौका की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी नजर पड़ी नौका चलाने वाली कन्या पर—मत्स्यगंधा। उसके शरीर से मछली की तीव्र गंध आती थी, लेकिन आँखें देवी-सी चमक रही थीं। पराशर ने जैसे ही उसकी आँखों में देखा, उन्हें हजारों वर्षों का भविष्य एक क्षण में दिखाई दिया। उन्हें समझ आ गया—यह मिलन संयोग नहीं, नियति का विधान है। इस मिलन से वह महापुरुष जन्म लेगा, जिसे संसार वेदव्यास कहेगा।
पराशर नौका की ओर बढ़े। मत्स्यगंधा संकुचित हो गई। लेकिन ऋषि की दिव्यता ने उसे सुरक्षा का एहसास कराया। नदी के बीच पहुँचकर पराशर बोले, "हे कल्याणी, नक्षत्रों का यह दुर्लभ अमृत योग पुकार रहा है कि आज तुम्हारे गर्भ से एक ऐसा संतान जन्म ले, जो वेदों का उद्धार करे और धर्म की रक्षा करे।" मत्स्यगंधा स्तब्ध। बोलीं, "हे ऋषिवर, मैं साधारण निषाद कन्या हूँ। मेरी दुर्गंध, मेरा कुल—यह कैसे संभव? और दिन का उजाला है, लोग देखेंगे। मेरा कौमार्य और पिता की प्रतिष्ठा?"
पराशर मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में ब्रह्मांड बदलने की शक्ति थी। बोले, "पुत्री, चिंता मत करो। यह तेज लोकलाज से ऊपर है।" उन्होंने मंत्र पढ़कर यमुना के जल को हवा में उछाला। भरी दोपहर में घना कोहरा छा गया। नौका पूरी तरह ओझल। सूर्य की किरणें भी भेद नहीं पा रही थीं। मत्स्यगंधा विस्मित। पराशर ने आशीर्वाद दिया—"आज से तुम्हारी दुर्गंध समाप्त। तुम्हारे अंगों से ऐसी सुगंध फैलेगी जो योजन भर दूर तक जाएगी। संसार तुम्हें योजनगंधा कहेगा। संतान जन्म के बाद भी कौमार्य अक्षुण्ण रहेगा।"
कोहरे के आवरण में द्वीप पर साक्षात विष्णु अंश का अवतरण हुआ। जन्म साधारण नहीं—बालक क्षण भर में पूर्ण विकसित किशोर बन गया। उसका रंग गहरा काला, जैसे वर्षा का बादल। नाम पड़ा कृष्ण द्वैपायन—द्वीप पर जन्म के कारण। पराशर गौरव से भर उठे। व्यास ने पिता के चरण स्पर्श किए। मूक संवाद हुआ—ज्ञान का सागर हृदय से हृदय में प्रवाहित। व्यास बोले, "पिताश्री, उद्देश्य जानता हूँ। तपस्या के लिए आज्ञा।" माता को वचन—"स्मरण पर उपस्थित हो जाऊँगा।" कोहरा छंटा। सत्यवती बनीं। पराशर चिंतित—कलयुग भयानक होगा।
पराशर हिमालय की कंदराओं में। ध्यान से कलयुग दर्शन। मनुष्य की बुद्धि क्षीण—वेद रहस्य भूल जाएगा। राजा प्रजा के रक्षक नहीं, भक्षक बनेंगे। कर और टैक्स के नाम पर रक्त चूसेंगे। न्याय धनवालों के लिए। कुल-चरित्र व्यर्थ—धन से सम्मान। विवाह समझौता, प्रेम स्वार्थ। आयु छोटी—अंत में 20-30 वर्ष में वृद्धावस्था। अन्न पौष्टिकता खोएगा, धरती बंजर, गाय दूध कम। पुत्र पिता का अपमान, शिष्य गुरु की अवहेलना। धर्म के नाम पाखंड, भगवा वस्त्र पेट पालने के लिए। स्त्रियाँ असुरक्षित, परिवार कलह। प्रकृति विरुद्ध—अकाल, प्रलयकारी वर्षा। मनुष्य वासना का गुलाम, कृत्रिम साधनों से सुंदरता, लेकिन विचार मलिन। नदियाँ प्रदूषित, तीर्थ व्यापार। ज्ञानी का उपहास।
पराशर व्याकुल—"हे नारायण, क्या यही नियति? मनुष्य दैवी प्रकाश भूल जाएगा?" लेकिन उन्होंने एक गुण देखा—कलयुग में नाम संकीर्तन और निस्वार्थ दान से मुक्ति। पराशर स्मृति में धर्म सरल। बृहत् पराशर होरा शास्त्र से ज्योतिष मार्गदर्शन। कल्कि अवतार से सत्ययुग।
अंतिम समय। हिमालय शिखर। शिष्य मैत्रेय को विष्णु पुराण। कृषि, वृक्षा आयुर्वेद। शरीर पारभासी। व्यास आए। बोले, "कार्य समाप्त। वेद विभाजन, महाभारत, भागवत।" अंतिम उपदेश—दान यज्ञ, हरि नाम तप। पद्मासन में प्राण सहस्रार। ज्योति पुंज आकाश। दिव्य दुंदुभि, पुष्प वर्षा। पराशर परम तत्व में विलीन।
विरासत अमर—बृहत् पराशर होरा शास्त्र, विष्णु पुराण, पराशर स्मृति। आज भी ज्योतिषी नमन करते। कलयुग में नाम जप सहारा। वे अमर ज्योति। क्रोध से क्षमा, ज्ञान से मार्ग।
कथा कैसी लगी? कमेंट में जय श्री कृष्ण लिखें। लाइक, सब्सक्राइब करें। धन्यवाद। जय श्री कृष्ण!
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