मां भूतेश्वरी

मां अन्नपूर्णा का एक ऐसा गोपनीय और प्रलयंकारी स्वरूप, जिसकी मात्र एक उन्मादी अट्टहास से समूचा ब्रह्मांड विनाश के मुहाने पर आ खड़ा हुआ था। यह रौद्र रूप था पंचमहाभूतों को अपने अधीन रखने वाली—देवी भूतेश्वरी का। कल्पना कीजिए उस दृश्य की, जहां साक्षात देवी महादेव की हथेली पर विराजमान होकर धधक रही हैं। शिव का कर-कमल भस्म हो रहा है, किंतु देवी के मुख पर लेशमात्र भी पीड़ा नहीं, बल्कि एक रोंगटे खड़े कर देने वाली खौफनाक मुस्कान तैर रही है। जगत जननी आदिशक्ति का वह परम उग्र अंश, जिसका आह्वान केवल दैत्यों के समूल नाश के लिए किया गया था। परंतु जब यह शक्ति अपनी सीमाएं लांघ गई, तो स्वयं त्रिदेवों के लिए भी इसे नियंत्रित करना असंभव हो गया। शिव महापुराण के गूढ़ रहस्यों और काशी की लुप्त होती मौखिक परंपराओं में छिपी यह वह कथा है, जिसे सुनकर आज भी रूह कांप उठती है। वह ऐसा कालखंड था जब असुरों के पाशविक अत्याचारों से पृथ्वी त्राहि-त्राहि कर रही थी। अविनाशी नगरी काशी, जहां मृत्यु को भी प्रवेश की अनुमति नहीं, वहां भी एक ऐसी काली और भयावह रात उतरी, जब साक्षात काल के पहिए भी थम गए। दैत्यों का दुस्साहस अपने चरम पर था, और देवगण उनके पैरों तले कुचले जा रहे थे। जब देवताओं के पास कोई विकल्प शेष न रहा, तब उन्होंने त्राहिमाम करते हुए देवाधिदेव महादेव की शरण ली। उसी क्षण, शिव के तेज से मां अन्नपूर्णा का वह गुप्त, विशालकाय और महाविनाशक स्वरूप प्रकट हुआ। उनका वर्ण ऐसा भयानक था, मानो अनंत काल की सबसे घनी अमावस्या ने ही देह धारण कर ली हो। उस अंधकार के समक्ष स्वयं ब्रह्मांड का तेज भी फीका पड़ जाए। उनके भयंकर त्रिनेत्रों से केवल क्रोध नहीं, बल्कि ब्रह्मांड को भस्म कर देने वाली प्रलयाग्नि बरस रही थी। बिखरे हुए केश हवा में इस तरह लहरा रहे थे, जैसे प्रलय की काली आंधियां पूरे आकाश को निगल जाने के लिए आतुर हों। चार भुजाओं में मानो स्वयं महाकाल विराजित थे। प्रथम हस्त में शत्रुओं का मस्तक धड़ से अलग करने वाला खड्ग, द्वितीय में अस्थियों को चूर-चूर कर देने वाला परशु। तृतीय भुजा में पिनाक समान धनुष-बाण और चतुर्थ में रक्त रंजित नरमुंडों की माला सुशोभित थी। कटि पर वस्त्रों के स्थान पर मानव अस्थियों का आवरण था और उनके चरणों के तले अनगिनत पिशाच और भूत-प्रेत उन्माद में नृत्य कर रहे थे। उनकी अट्टहास सुनकर ऐसा प्रतीत होता था मानो अभी आकाश के दो टुकड़े हो जाएंगे। यह जगत का पोषण करने वाली मां अन्नपूर्णा नहीं, बल्कि सृष्टि को निगलने वाली महाप्रलय थीं।
और फिर आरंभ हुआ वह महासंहार! देवी भूतेश्वरी के मुख से बरसती ज्वालाओं ने पलक झपकते ही असुरों की विशाल सेना को राख के ढेर में तब्दील कर दिया। आकाश का रंग ताजे रक्त की भांति लाल हो गया। सूर्य और चंद्र जैसे भयभीत होकर ब्रह्मांड के किसी कोने में छिप गए। धरती ऐसे कांप उठी जैसे पाताल लोक से किसी ने महाविनाश के द्वार खोल दिए हों। काशी के घाटों पर अब शांति नहीं, केवल मृत्यु की चीखें गूंज रही थीं। चारों ओर रक्त की नदियां उफान पर थीं।
देवी अपने ही अट्टहास में मग्न, न जाने कितने ही असुरों को जीवित चबाती जा रही थीं। "तुम्हारा सर्वनाश निश्चित है!" उनकी यह गर्जना पूरे ब्रह्मांड में हाहाकार मचा रही थी। ऐसा दृश्य था मानो स्वयं महाकाल नग्न अवस्था में तांडव कर रहे हों। अंततः असुरों का समूल नाश हुआ। देवताओं को विजय तो मिली, परंतु यह विनाश का अंत नहीं, केवल एक शुरुआत थी। दैत्यों के रक्त का स्वाद चखने के बाद देवी की संहारक भूख शांत नहीं हुई। जब वध के लिए कोई असुर शेष न बचा, तो भूतेश्वरी की लालची और रक्तिम दृष्टियां देवलोक की ओर घूम गईं। और फिर... देवी ने देवगणों को ही अपना ग्रास बनाना आरंभ कर दिया। देवराज इंद्र, सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा और स्वयं जगत के पालनहार श्री हरि नारायण भी यह देखकर जड़वत रह गए। मृत्यु का यह बेलगाम नृत्य देखकर तीनों लोक थर-थर कांपने लगे। जब इस प्रलयंकारी तूफान को रोकने का कोई अस्त्र-शस्त्र काम न आया, तो समस्त देवगण बदहवास होकर संहारकर्ता भगवान पशुपतिनाथ के चरणों में गिर पड़े। "रक्षा करें महादेव! घोर अनर्थ हो गया है! आपकी सृजित शक्ति अब पूर्णतः अनियंत्रित हो चुकी है प्रभु। देवी भूतेश्वरी असुरों के पश्चात अब देवताओं का ही भक्षण कर रही हैं। उनके इस महाक्रोध को शांत करना अब केवल और केवल आपके ही अधीन है। इस त्रिलोक को भस्म होने से बचाइए त्रिलोकीनाथ! त्राहिमाम महादेव... त्राहिमाम!"
महादेव ने अत्यंत शांत और गंभीर स्वर में कहा, "शांत हो जाइए देवराज। यह सत्य है कि शक्ति का यह विकराल रूप मेरी स्वयं की कल्पना से भी परे जा चुका है। परंतु, यदि इसका सृजन मेरे द्वारा हुआ है, तो इस प्रलय को रोकने का उत्तरदायित्व भी मेरा ही है।" उधर, काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर दृश्य रूह कंपा देने वाला था। भस्म रमाए देवी भूतेश्वरी देवताओं पर काल बनकर टूट रही थीं। उनका उन्मुक्त तांडव चीख-चीख कर कह रहा था कि सृष्टि की आयु अब समाप्त होने को है। महाप्रलय दहलीज पर खड़ी थी। कोई अन्य विकल्प न देख, भगवान शिव ने एक योद्धा की भांति नहीं, बल्कि एक रक्षक की भांति अपना प्रथम दांव चला—'महामाया का जाल'। महादेव ने ध्यानस्थ होकर अपने त्रिनेत्र मूंदे और उस माया शक्ति को जाग्रत किया, जो ब्रह्मा की सृष्टि रचना से भी अधिक रहस्यमयी और प्रबल है। पलक झपकते ही काशी के धुएं से भरे आकाश में एक सतरंगी मायाजाल बुन गया। श्मशान की चिताएं अदृश्य हो गईं और वहां एक दिव्य भ्रम-लोक उत्पन्न हो गया। सुंदर अप्सराएं नृत्य करने लगीं, स्वर्ण जड़ित महल उभर आए और गंधर्वों के मधुर संगीत से वातावरण गूंज उठा। उद्देश्य स्पष्ट था—देवी के उग्र मस्तिष्क को शांत करना। देवी भूतेश्वरी को भ्रम हुआ मानो साक्षात स्वर्ग धरती पर उतर आया हो। जैसे ही उन्होंने पहला कदम बढ़ाया, उनके पैर ठिठके। दूसरे कदम पर उनके हाथ अदृश्य पाशों में बंधने लगे। देवगणों की आंखों में आशा की किरण जागी। किंतु... तभी गूंजा वह प्रलयंकारी अट्टहास!
देवी के मुख से काले धुएं का एक भयंकर गुबार छूटा, और पल भर में महादेव का वह अजेय मायाजाल रेत के महल की भांति ढह गया। सारा सौंदर्य राख में और मधुर संगीत मौत की चीखों में तब्दील हो गया। शिव समझ गए, "यह ऊर्जा अब मेरे सामान्य नियंत्रण से बाहर जा चुकी है।" इसके बाद महादेव ने अपना द्वितीय और अत्यंत प्रचंड दांव चला—ब्रह्मांड की सबसे प्राचीन शक्ति, 'पाशुपत ज्योति'। महादेव के हृदय चक्र से एक ऐसी दिव्य नीली ज्वाला प्रस्फुटित हुई, जिसका तेज आकाश में एक साथ उदित हुए लाखों सूर्यों के समान था। वह ज्योति एक महाभंवर का रूप धारण कर भूतेश्वरी को चारों ओर से घेरने लगी। प्रकाश का एक अभेद्य पिंजरा उन्हें जकड़ने लगा। परंतु नियति का खेल अभी बाकी था। महादेव का यह महा-अस्त्र भी विफल सिद्ध हुआ। देवी ने क्रूरता से मुस्कुराते हुए कहा, "अरे! यह तो मेरी ही शक्ति है।" भूतेश्वरी ने केवल एक भयंकर हुंकार भरी, और वह अजेय पाशुपत ज्योति उल्टी दिशा में लौट पड़ी। जो अस्त्र देवी को बांधने गया था, वह स्वयं शिव की ओर पलट गया। इस प्रहार के बाद देवी शांत होने के बजाय दोगुनी उग्र हो उठीं। अब वह केवल देवी नहीं, साक्षात 'महाप्रलय' बन चुकी थीं। जब शिव के दोनों महा-अस्त्र निष्फल हो गए, तब काशी का आकाश और भी अधिक रक्तरंजित हो उठा। देवी भूतेश्वरी का तांडव अपनी चरम सीमा लांघ चुका था। तब भगवान शिव ने एक गहरी, ब्रह्मांडीय श्वास ली। युद्ध का विचार त्याग कर वे परम शांत मुद्रा में आसीन हुए और अपने अंतिम व सबसे गोपनीय अस्त्र का आह्वान किया—'अद्वैत मंत्र'। यह वह महामंत्र था, जिसे जपने का सामर्थ्य न ब्रह्मा में था, न विष्णु में और न ही किसी देव में। यह शिव और शक्ति के पूर्ण एकीकरण का वह परम रहस्य था, जिसका एक-एक अक्षर ब्रह्मांड के समय चक्र को थाम सकता था। जैसे ही शिव ने प्रथम अक्षर का नाद किया, भूतेश्वरी का वह अजेय और विकराल स्वरूप थरथराने लगा। उनके धधकते त्रिनेत्र अचानक धुंधले पड़ने लगे। पैरों तले रौंदे जा रहे पिशाच चीखने लगे। और पहली बार... उनके मुख की वह खौफनाक हंसी रुक गई। ऐसा लगा मानो किसी अदृश्य महाशक्ति ने उनके अस्तित्व की जड़ों पर ही प्रहार कर दिया हो। द्वितीय अक्षर के गुंजायमान होते ही, भूतेश्वरी का अट्टहास एक अत्यंत दर्दनाक चीत्कार में बदल गया। उनके नाग रूपी केश जो प्रलयंकारी आंधी में उड़ रहे थे, वे अचानक पत्थर के समान जड़ हो गए। नरमुंडों की माला से खोपड़ियां टूट-टूट कर बिखरने लगीं। उनके विशाल शरीर पर काले धब्बे उभरने लगे, यद्यपि आंखों की ज्वाला अब भी संघर्ष कर रही थी। तृतीय अक्षर के प्रहार ने साक्षात मृत्यु को भी रुला दिया। भूतेश्वरी की आंखों से जल के स्थान पर रक्त के आंसू बहने लगे। उनका प्रलयंकारी तांडव हमेशा के लिए थम गया और देवी ने घुटने टेक दिए। आज पहली बार उस मुखमंडल पर भय दिखाई दिया, जिससे स्वयं भय भी खौफ खाता था। चतुर्थ अक्षर के नाद के साथ ही, वह विशालकाय श्याम वर्णी शरीर पिघलकर एक विशुद्ध ज्वाला में परिवर्तित होने लगा। उनका विराट अस्तित्व सिमटता गया, सिकुड़ता गया। अंधकार मिट गया और वहां सात रंगों वाली एक अत्यंत दिव्य और पवित्र ज्वाला शेष रह गई। और जैसे ही महादेव ने अंतिम अक्षर का उच्चारण किया, भूतेश्वरी का वह बचा हुआ स्वरूप एक छोटी सी लौ बनकर उड़ा, और सीधे देवाधिदेव महादेव की दाहिनी हथेली पर आकर स्थापित हो गया। उस प्रलयंकारी ज्वाला के ताप से शिव की हथेली सुलग उठी, मांस जलने लगा, और ज्वालाएं चटकने लगीं। किंतु आश्चर्य! वह ज्वाला अब भी हंस रही थी। "मैं तो तुम्हारी ही हूं स्वामी... फिर मुझे मिटा क्यों रहे हो?" महादेव के मुख पर युगों-युगों की पीड़ा छलक आई। उन्होंने अत्यंत भारी स्वर में कहा, "निःसंदेह तुम मेरी ही शक्ति हो। किंतु अब तुम एक अनियंत्रित महाप्रलय बन चुकी हो। अब तेरा मुझमें विलय होना ही इस सृष्टि के कल्याण का एकमात्र मार्ग है।" "हर हर महादेव!" देखते ही देखते, महादेव की हथेली पर धधकती वह ज्वाला धुएं और भस्म में बदलकर हमेशा के लिए शिव में विलीन हो गई। तत्पश्चात, धीरे-धीरे आकाश का रक्तिम रंग साफ होने लगा। रक्त की उफनती नदियां सूखने लगीं। मणिकर्णिका के उस महाश्मशान में एक बार फिर काशी की वह चिर-परिचित शांति लौट आई। परंतु शिव पुराण और प्राचीन श्रुतियां गवाह हैं कि उस एक क्षण में, उस अनियंत्रित ज्वाला को शांत करने और स्वयं में समाहित करने के लिए, महादेव को अपनी एक कल्प (एक पूरे युग) की तपस्या की शक्ति की आहुति देनी पड़ी थी। यही कारण है कि देवी भूतेश्वरी का नाम, उनका रूप और उनका अस्तित्व इतिहास के पन्नों से हमेशा के लिए मिटा दिया गया। ताकि भविष्य में कोई भी हठयोगी या साधक भूलकर भी मां के इस महाविनाशक रूप का आह्वान न कर बैठे। आज यह रोंगटे खड़े कर देने वाली कथा केवल काशी की संकरी गलियों और वहां के कुछ सिद्ध विद्वानों की स्मृतियों में ही शेष है। यह एक ऐसा दुर्लभ रहस्य था जो समय की धूल में कहीं दब गया था, जिसे हमने आपके सामने उजागर करने का प्रयास किया है। यदि इस कथा के वर्णन में या तथ्यों में हमसे अज्ञानवश कोई त्रुटि हुई हो, तो हम क्षमा प्रार्थी हैं। कमेंट करके अवश्य बताएं कि मां के इस अज्ञात और रहस्यमयी स्वरूप के बारे में आपके क्या विचार हैं। ऐसी ही रोंगटे खड़े कर देने वाली कथाओं, हिंदू धर्म के गूढ़ रहस्यों और पुराणों के अनसुने अध्यायों से जुड़े रहने के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें। मिलते हैं एक नए रहस्य और एक नए अध्याय के साथ। तब तक के लिए पूरे भक्ति भाव से बोलिए— 
"ओम पार्वती पते हर हर महादेव!"

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