लोमस ऋषि के साथ इंद्र का अनंत ब्रह्माण्ड दर्शन
एक समय की बात है, स्वर्गलोक की राजधानी अमरावती अपने पूर्ण वैभव पर थी। देवराज इंद्र, जिन्होंने कठोर तपस्या और सौ अश्वमेध यज्ञों के पुण्य के बल पर यह त्रिभुवन का सर्वोच्च पद प्राप्त किया था, अब अपने ऐश्वर्य, पद और शक्ति के गहरे मद (घमंड) में डूब चुके थे।
सिंहासन पर बैठे हुए, अप्सराओं के नृत्य और गंधर्वों के संगीत के बीच, इंद्र के मन में एक विचार आया— "मैं तीनों लोकों का स्वामी हूँ। मेरे पास जो शक्ति है, वह अद्वितीय है। लेकिन यह स्वर्ग का राजमहल अब मेरी महानता के अनुरूप नहीं लगता। यह पुराना और साधारण सा प्रतीत होता है। मेरे रहने के लिए एक ऐसा नया और भव्य प्रासाद (महल) होना चाहिए, जिसकी कल्पना तक किसी ने न की हो!" अहंकार से वशीभूत होकर इंद्र ने तुरंत देवताओं के शिल्पी, भगवान विश्वकर्मा को अपने दरबार में बुलवाया। विश्वकर्मा जी हाथ जोड़कर उपस्थित हुए। इंद्र ने आदेशात्मक स्वर में कहा, "हे शिल्पीराज! एक ऐसे महल का निर्माण करो जो इस पूरे ब्रह्मांड में अनुपम हो। उसमें सोने-चाँदी के खंभे हों, जिनकी चमक से सूर्य भी लजा जाए। दीवारें ऐसे मणि-माणिक्य और हीरों से जड़ी हों कि रात में भी दिन का आभास हो। उसके उद्यान इतने विशाल और सुंदर हों कि साक्षात प्रकृति भी उन्हें देखकर मोहित हो जाए। काम शीघ्र आरंभ करो!" विश्वकर्मा जी ने आज्ञा मानकर दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने अपनी पूरी कला और दिव्य शक्तियों को उस महल के निर्माण में झोंक दिया। लेकिन इंद्र का अहंकार शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा था। हर दिन इंद्र निर्माण स्थल पर आते और कुछ न कुछ नई कमी निकाल देते— "यह गुंबद और ऊँचा होना चाहिए! इन खंभों पर और रत्न जड़ो! यह उद्यान और विस्तृत करो!" विश्वकर्मा जी बुरी तरह थक चुके थे, लेकिन देवराज की तृष्णा और अभिमान का कोई अंत नहीं था। उसी दौरान, तीनों लोकों में विचरण करने वाले, भगवान नारायण के परम भक्त देवर्षि नारद अपनी वीणा बजाते हुए, "नारायण-नारायण" का गान करते हुए स्वर्गलोक पधारे। उन्होंने इंद्र के नए महल का निर्माण कार्य देखा और इंद्र के चेहरे पर झलकते हुए उस भारी अहंकार को भी पढ़ लिया। नारद जी के मन में क्रोध नहीं, बल्कि करुणा जागी। उन्होंने सोचा— "अरे रे! यह देवराज कितने गहरे भ्रम में है। इसे लगता है कि यह सत्ता और यह महल इसके साथ हमेशा रहेंगे। यह भूल गया है कि यह पद केवल पुण्यों का फल है, जो एक दिन समाप्त हो जाएगा। इसे इसके मूल स्वरूप का बोध कराना ही होगा, अन्यथा यह अहंकार इसके पतन का कारण बन जाएगा।"
नारद जी ने तुरंत ध्यान लगाया और तपस्या की प्रतिमूर्ति, महाज्ञानी महर्षि लोमश का स्मरण किया। नारद जी उनके पास पहुँचे और अत्यंत विनम्रता से प्रार्थना की, "हे भगवन्! स्वर्ग के अधिपति इंद्र का अहंकार आकाश छू रहा है। वह अपनी नश्वर सत्ता को शाश्वत मान बैठे हैं। उनके इस मद को चूर करने और उन्हें सत्य का ज्ञान देने के लिए केवल आपकी कृपा ही पर्याप्त है। कृपया अमरावती पधारें।" महर्षि लोमश कोई साधारण ऋषि नहीं थे; वे एक 'अवधूत' कोटि के महापुरुष थे। जो संसार की हर मोह-माया से परे जा चुका हो, उसे अवधूत कहते हैं। उनका स्वरूप अत्यंत विचित्र और दिव्य था। उन्होंने शरीर पर वस्त्र के नाम पर मात्र एक पुरानी सी लंगोटी धारण की हुई थी। एक हाथ में काठ (लकड़ी) का पुराना कमंडल (जिसे साधु-संन्यासी 'कठारी' कहते हैं) था। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि उनके सिर की जटाओं के ऊपर एक पुरानी, टूटी-फूटी, जीर्ण-शीर्ण चटाई बँधी हुई थी—शायद बारिश या धूप से बचने के लिए उन्होंने राह चलते कहीं से उठाकर सिर पर रख ली होगी।
उनके वक्षस्थल (छाती) के पास बालों का एक गोल चक्र सा बना हुआ था। यद्यपि उनका बाहरी आवरण अत्यंत दरिद्र सा था, किंतु उनके मुखमंडल पर कोटि-कोटि सूर्यों का ब्रह्मतेज चमक रहा था। जब महर्षि लोमश अमरावती के उस रत्नों से जड़े, चमकते हुए नए सभा-मंडप में पधारे, तो उनका तेज इतना प्रखर था कि सारा स्वर्गलोक क्षण भर के लिए उनके प्रकाश से ढक गया। उस अवधूत के आते ही, अनजाने में ही, पूरा सभा-मंडप आदर से खड़ा हो गया। इंद्र, जो घमंड में चूर थे, वे भी उस अलौकिक तेज के सामने खिंचे चले आए और अपने रत्नजड़ित सिंहासन से उठकर खड़े हो गए।
इंद्र ने हाथ जोड़कर कुछ संकोच और कुछ आश्चर्य से कहा, "हे भगवन्! आपका स्वर्गलोक में स्वागत है। मैं क्षमा चाहता हूँ, किंतु मैं आपको पहचान नहीं पा रहा हूँ। आपका शुभ नाम क्या है?" महर्षि लोमश ने एक अत्यंत शांत और मंद मुस्कान के साथ कहा, "वत्स इंद्र! देवराज! संसार के लोग मुझे महर्षि लोमश के नाम से पुकारते हैं।" अपना नाम बताने के बाद, अचानक महर्षि लोमश अत्यंत जोर-जोर से हँसने लगे। उनका वह अट्टहास इतना तीव्र, गहरा और दिव्य था कि उसकी गूँज से स्वर्ग के महल की दीवारें तक काँप उठीं। इंद्र पूरी तरह से चौंक गए। देवताओं में सुगबुगाहट होने लगी। इंद्र सोचने लगे— "इतने महान ऋषि, जिनके चेहरे पर इतना अगाध ज्ञान है, वे बिना किसी कारण के इस तरह नहीं हँस सकते। ज्ञानी पुरुषों की हँसी में भी ब्रह्मांड के गहरे रहस्य छिपे होते हैं।"
इंद्र ने दोनों हाथ जोड़कर, अत्यंत विनीत भाव से पूछा, "महाराज! मुझ पर कृपा करें और बताइए कि आपके इस प्रकार हँसने का क्या कारण है? बिना प्रयोजन के हँसना तो मूर्खों का लक्षण है, किंतु आप तो साक्षात ज्ञान के अथाह सागर प्रतीत होते हैं। मुझसे क्या भूल हुई जो आप इस तरह हँस पड़े?" महर्षि लोमश ने अपनी हँसी रोकी, उनकी आँखों में एक गहरी करुणा तैर गई। उन्होंने अपनी उंगली से स्वर्ग के उस चमकते हुए फर्श की ओर इशारा करते हुए कहा, "वत्स! जरा नीचे धरती पर तो अपनी दृष्टि डालो।" इंद्र ने नीचे देखा। वहाँ रत्नों से जड़े फर्श पर चींटियों की एक बहुत लंबी कतार चली जा रही थी। सैकड़ों, हजारों चींटियाँ एक के पीछे एक अनुशासित ढंग से चल रही थीं। उस कतार में सबसे आगे एक चींटी थी, जो थोड़ी अलग लग रही थी। उसकी एक टांग टूट गई थी, जिसके कारण वह ठीक से चल नहीं पा रही थी और खिसक-खिसककर, घिसटते हुए बड़ी मुश्किल से आगे बढ़ रही थी। लोमश जी ने उस लंगड़ी चींटी की ओर इशारा करते हुए हँसकर कहा, "देवराज, देख रहे हो न इस चींटी को? यह जो सबसे आगे खिसक रही है, जिसकी टांग टूटी हुई है... यह कोई साधारण चींटी नहीं है। यह अपने पूर्व जन्मों में ७२ बार इंद्र बन चुकी है!" यह सुनते ही जैसे इंद्र के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उनका सारा रक्त जम सा गया। आँखें फटी की फटी रह गईं। इंद्र हकलाते हुए बोले, "म...महाराज! यह कैसे संभव है? यह आप क्या कह रहे हैं? इंद्र का यह पद कोई साधारण पद नहीं है। सात द्वीपों और सात समुद्रों वाली इस पूरी पृथ्वी पर दिग्विजय प्राप्त करके, बिना किसी बाधा के १०० अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करने वाले महाप्रतापी राजा को ही यह इंद्र पद प्राप्त होता है। यह अत्यंत दुर्लभ है। फिर यह क्षुद्र चींटी ७२ बार इंद्र कैसे बन सकती है?"
लोमश जी ने अत्यंत शांत और गंभीर स्वर में सृष्टि के सबसे बड़े सत्य को उद्घाटित किया: "वत्स! यह संसार एक चक्र है, जो अनवरत घूम रहा है। कर्मों की गति बड़ी गहन है। यह चींटी, जो आज फर्श पर घिसट रही है, इसने भी कभी पृथ्वी पर जन्म लिया था। इसने कठोर तप किए, पूर्ण यज्ञ किए और पुण्यों का पहाड़ खड़ा किया। उन पुण्यों के फलस्वरूप इसे इंद्र का यह भव्य सिंहासन मिला। लेकिन देवराज, पुण्य कोई अक्षय संपत्ति नहीं है। जैसे बैंक में रखा धन खर्च करने से एक दिन समाप्त हो जाता है, वैसे ही स्वर्ग के भोग भोगने से पुण्य क्षीण हो जाते हैं। जब इसके पुण्य समाप्त हुए, तो यह यहाँ से नीचे गिर गई। फिर यह कभी राजा बनी, कभी रंक बनी, कभी कीड़ा बनी, कभी पशु बनी। फिर कभी इसने अच्छे कर्म किए, फिर इंद्र बनी, और पुण्यों के क्षीण होने पर फिर गिर गई। इस प्रकार एक-दो बार नहीं, पूरे बहत्तर (72) बार यह तुम्हारे इसी सिंहासन पर बैठ चुकी है! बहत्तर बार इसने इस ऐश्वर्य को भोगा है, और आज देखो... आज यह कर्मों के फेर में फँसकर एक लंगड़ी चींटी बनकर इस फर्श पर खिसक रही है। देवराज! जिस पद, जिस सत्ता और जिस ऐश्वर्य पर तुम आज इतना अभिमान कर रहे हो, जिसके लिए तुम यह नया महल बनवा रहे हो, वह कितना नश्वर है, इसकी कल्पना भी तुमने की है?"* इंद्र का सारा अहंकार पानी-पानी हो चुका था। उन्हें अपना वह रत्नों का महल अब मिट्टी का ढेर लगने लगा। उनके भीतर जिज्ञासा और वैराग्य ने जन्म ले लिया। उन्होंने महर्षि से एक और प्रश्न किया:
"महाराज! आपके ज्ञान ने मेरे नेत्र खोल दिए हैं। लेकिन मेरे मन में एक और शंका है। आपने अपने सिर की इन पवित्र जटाओं पर यह पुरानी, टूटी-फूटी चटाई क्यों बाँध रखी है? यह कोई सिर ढकने का आभूषण या वस्त्र तो नहीं लगती।" लोमश जी फिर से मुस्कुराए और जो उत्तर दिया, उसने इंद्र को ब्रह्मांड की विशालता का असली पैमाना दिखा दिया। लोमश जी बोले, "देवराज! सच पूछो तो हमारी आयु बहुत ही छोटी है। इतनी छोटी सी तो जिंदगी है कि इसमें पक्की झोपड़ी बनाना, कुटिया छाना, या कोई स्थायी मकान बनाने में समय नष्ट करना मुझे बिल्कुल व्यर्थ लगा। मैंने सोचा, रहने दो, बस धूप और बारिश से बचने के लिए कुछ सिर पर छाया होनी चाहिए, तो रास्ते में यह चटाई मिल गई और मैंने इसे जटाओं पर बाँध लिया। मुझे संतोष हो गया कि हाँ, मेरे सिर पर छत है। इतने से जीवन के लिए महल कौन बनाए?"
इंद्र चकित रह गए। जो व्यक्ति इतने अनादि काल से जीवित प्रतीत हो रहा है, वह अपनी आयु को 'छोटी सी' कह रहा है! इंद्र ने पूछा, "महाराज! यदि आपकी आयु इतनी छोटी है, तो कृपा करके बताइए कि आपकी वास्तविक आयु है कितनी?" लोमश जी ने अपनी छाती पर बने बालों के उस गोल चक्र की ओर इशारा किया और बोले, "वत्स, वर्षों की गणना में तो मुझे अपनी आयु याद भी नहीं है। लेकिन यह जो मेरी छाती पर बालों का एक गुच्छा देख रहे हो, यही मेरी आयु का मापदंड है। जब भी सृष्टि के रचयिता, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी की पूरी आयु समाप्त हो जाती है और उनके शरीर का अंत होता है (महाप्रलय होती है), तब मेरे इस चक्र में से केवल एक बाल टूटकर गिरता है।" इंद्र की साँसें रुकने लगीं। उन्होंने काँपते स्वर में पूछा, "प्रभो... ब्रह्मा जी की आयु कितनी होती है?" लोमश जी ने उस विराट काल-चक्र की गणना समझाई: *"सुनो देवराज! सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चारों युगों को मिलाकर एक 'चतुर्युगी' (महायुग) बनती है। ऐसी ७१ चतुर्युगियों का एक 'मन्वंतर' होता है। एक मन्वंतर में तुम्हारे जैसे १४ इंद्रों का कार्यकाल पूरा हो जाता है। ऐसे १४ मन्वंतरों को मिलाकर ब्रह्मा जी का केवल 'एक दिन' (कल्प) होता है।
उतनी ही बड़ी उनकी 'एक रात' होती है।
ऐसे ३६० दिन और रातों से ब्रह्मा जी का एक वर्ष बनता है। और ऐसे १०० वर्षों की ब्रह्मा जी की पूर्ण आयु होती है! जब ब्रह्मा जी के वे १०० वर्ष पूरे होते हैं और उनका पतन होता है... तब जाकर मेरी छाती का सिर्फ एक रोम (बाल) झड़ता है। देवराज! जिस दिन मेरी छाती के ये सारे बाल झड़ जाएँगे, उस दिन मेरी यह 'छोटी सी' आयु पूरी हो जाएगी और मैं अपने परमपिता परमात्मा के श्रीचरणों में सदा के लिए लीन हो जाऊँगा। अब तुम ही सोचो, इतने से जीवन के लिए मैं घर क्यों बनाऊँ? और तुम... जिसका कार्यकाल केवल एक मन्वंतर (ब्रह्मा जी के दिन का एक छोटा सा हिस्सा) है, तुम इस नश्वर स्वर्ग में स्थायी महल बनाने के लिए विश्वकर्मा को कष्ट दे रहे हो?"* लोमश ऋषि के इन वचनों ने इंद्र के हृदय पर हथौड़े की तरह प्रहार किया। उनके भीतर का 'मैं' (अहंकार) पूरी तरह टूट कर बिखर गया। जिस सिंहासन को वे शाश्वत मानते थे, वह उन्हें पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर लगने लगा।
इंद्र ने उसी क्षण विश्वकर्मा जी को बुलवाया और हाथ जोड़कर कहा, "हे शिल्पीराज! मुझे क्षमा कर दें। अब मुझे किसी नए महल की आवश्यकता नहीं है। पूर्वकाल के इंद्रों ने जो पुराने महल बनवाए हैं, वे ही मेरे लिए पर्याप्त हैं। आप अपने लोक को प्रस्थान करें। अब मैं भी बचे हुए जीवन में इस ऐश्वर्य के मद को छोड़कर केवल भगवान के राम-नाम का जप करूँगा, क्योंकि केवल परमात्मा का नाम ही सत्य और शाश्वत है।" इंद्र दौड़कर महर्षि लोमश के चरणों में गिर पड़े और अपने अपराधों की क्षमा माँगने लगे। गंगा तट पर निवास करने वाले और लगभग ३०० वर्षों की आयु प्राप्त करने वाले महान नागा सिद्ध महात्मा श्री रामदास जी महाराज इस प्रसंग को सुनाते हुए अक्सर एक दोहा कहा करते थे: “एक-एक चींटी बनी अगणित बार सुरेश, रामदास नागा कहे महिमा यह विश्वेश।”
अर्थात्, यह भगवान की माया और कर्मों का ही खेल है कि एक साधारण सी चींटी भी अनगिनत बार 'सुरेश' (देवताओं के ईश यानी इंद्र) बन चुकी है।
यह भौतिक संसार और इसके सर्वोच्च पद भी विकारी हैं, बदलने वाले हैं, नश्वर हैं। स्वर्ग का सुख भी स्थायी नहीं है। लेकिन, जो सत्य कभी पुराना नहीं होता, जो कभी नश्वर नहीं होता, वह है— भगवान का स्वरूप और उनकी भक्ति!
भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी का वह सच्चिदानंद स्वरूप इस भौतिक जगत के नियमों से पूरी तरह परे है। वह नित्य नवीन है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है:
“क्षण-क्षण यत्न नवता उत्पत्ति तदेव रूपं रमणीयताया।”
(जो सुंदरता हर क्षण एक नया रूप धारण करे, हर पल और भी नवीन और ताज़ी प्रतीत हो, वही वास्तविक रमणीयता है।) संसार की चीजें पुरानी होकर अपनी सुंदरता खो देती हैं। महल पुराने हो जाते हैं, शरीर जीर्ण हो जाता है। लेकिन भगवान की सुंदरता? वह तो नित्य-नूतन है। वृंदावन के नित्य निकुंज में एक बार एक गोपी ने श्री राधा रानी जी से कहा— "हे श्यामा जू! आप कितनी भाग्यशाली हैं। हम तो कान्हा की एक झलक पाने के लिए तरसते हैं, और आप तो दिन-रात अपने प्रियतम श्यामसुंदर का आँख भर-भरकर दर्शन करती हैं।"
यह सुनकर श्री राधा रानी के विशाल नेत्रों में प्रेमाश्रु (प्रेम के आँसू) छलक आए। वे गदगद कंठ से बोलीं— "हे सखी! तुम मुझे भाग्यशाली कहती हो? वास्तव में तो तुम सब भाग्यशाली हो, जो दूर से ही सही, कम से कम उनका दर्शन तो कर लेती हो। सच कहूँ सखी? मैंने तो आज तक अपने श्यामसुंदर को ठीक से देखा ही नहीं है!"
गोपी चकित होकर बोली, "यह कैसे संभव है श्यामा जू?"
राधा रानी ने महाभाव में डूबते हुए कहा, "सखी! जब मैं उनकी ओर देखती हूँ, तो उनके श्री अंगों की जो छवि है, उनके एक-एक रोम की जो सुंदरता है, उस पर करोड़ों कामदेव न्यौछावर हो जाते हैं। उनकी वह सुंदरता हर क्षण इतनी तेजी से नई और नवीन होती जाती है कि मेरी दृष्टि उनके जिस अंग पर पड़ती है, वहीं मेरी समाधि लग जाती है। मैं उनके रूप के उस अथाह महासागर में इतनी डूब जाती हूँ कि अपनी दृष्टि वहाँ से हटा ही नहीं पाती। मैं उन्हें पूरा कैसे देखूँ? वह तो हर पल नए हो जाते हैं।"
यही भक्ति का चरम शिखर है, जिसे 'महाभाव' कहते हैं। श्री राधा रानी का अपने प्रियतम के प्रति 'कांत-भाव' (प्रेमिका का भाव) और अयोध्या में श्री भरत लाल जी का प्रभु श्री राम के प्रति 'दास्य-भाव'—ये दोनों ही उस सर्वोच्च महाभाव के उदाहरण हैं, जहाँ संसार की कोई भी नश्वर वस्तु (चाहे वह स्वर्ग का राज ही क्यों न हो) धूल के समान प्रतीत होती है। बोलो वृंदावन बिहारी लाल की जय! जय श्री राधे-श्याम! यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में धन, पद, यौवन या यश का अहंकार सबसे बड़ा भ्रम है। यह सब उस चींटी के सफर के समान ही क्षणभंगुर है। सच्ची और शाश्वत शांति केवल और केवल परमात्मा के श्रीचरणों में स्वयं को समर्पित कर देने में ही है। क्या आप इसी तरह पुराणों से जुड़ी कोई और कथा (जैसे राजा भरत की कथा या जड़भरत का प्रसंग) विस्तार से सुनना चाहेंगे, जो मन को इसी प्रकार वैराग्य और भक्ति की ओर ले जाती हो?
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