भगवान विष्णु को मिला 10 जन्मों का श्राप
ज़रा सोचिए उस अकल्पनीय पल के बारे में, जब साक्षात ब्रह्मांड के पालनहार श्रीहरि विष्णु को भी अपने ही कर्मों का परिणाम सहना पड़ा। एक ऐसा समय जब एक क्रुद्ध ऋषि के भीषण श्राप ने दशावतार की पूरी रूपरेखा ही बदल कर रख दी। और वह दिन, जब भगवान विष्णु की छाती पर किया गया एक प्रहार इस ब्रह्मांड के सबसे बड़े प्रश्न का उत्तर बन गया: 'त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ कौन है?'
आज की इस अद्भुत कथा के प्रमाण हमें भागवत पुराण के दशम स्कंध के 89वें अध्याय में प्राप्त होते हैं। जहाँ महर्षि भृगु त्रिदेवों की परीक्षा लेने निकलते हैं और वैकुंठ पहुँचकर भगवान नारायण के वक्षस्थल पर लात मारते हैं। वहीं दूसरी ओर, पद्म पुराण सहित अन्य ग्रंथ हमें एक अलग ही घटनाक्रम की ओर ले जाते हैं— हिमालय की वादियों में स्थित महर्षि भृगु के आश्रम की ओर। जहाँ अपनी पत्नी काव्यमाता के वध से क्रोधित होकर भृगु मुनि विष्णु जी को पृथ्वी पर बार-बार जन्म लेने और मृत्युलोक के कष्ट सहने का श्राप दे देते हैं। आज हम इन दोनों पौराणिक धाराओं को जोड़कर एक ऐसी सिनेमैटिक कथा बुनेंगे, जिसे आप केवल सुनेंगे नहीं, बल्कि अपनी बंद आँखों से देखेंगे, महसूस करेंगे और भीतर तक रोमांचित हो उठेंगे। कथा में गहराई तक उतरने से पहले एक छोटा सा निवेदन है— यदि आप भगवान विष्णु से जुड़े इस गूढ़ रहस्य को जानना चाहते हैं, जिसे अक्सर कथाओं में छुपा लिया जाता है, तो इस वीडियो को अभी लाइक कर दें। अंत तक हमारे साथ जुड़े रहें, क्योंकि असली रहस्य का पर्दा वहीं उठेगा।
आसमान में अमावस्या जैसी कालिमा छाई है। स्वर्गलोक के द्वार पर बिजली ऐसे कड़क रही है जैसे देवताओं का अस्तित्व ही दांव पर लगा हो। मृत्युलोक की रणभूमि धूल से अटी पड़ी है। टूटे हुए रथ, खंडित अस्त्र-शस्त्र और हताश होकर लौटती देवताओं की सेना। अब असुरों को हराना लगभग नामुमकिन हो गया है, क्योंकि उनके पास एक ऐसी अचूक और रहस्यमयी शक्ति आ चुकी है जिसका कोई तोड़ नहीं— असुरों के गुरु शुक्राचार्य!
सुदूर हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच, कड़ाके की ठंड में एक तपस्वी केवल प्राणवायु के सहारे अडिग खड़ा है। देह पत्थर सी स्थिर है, नेत्र बंद हैं, परंतु चेहरे का तेज ऐसा कि बर्फ भी पिघलकर पानी हो जाए। गुरु शुक्राचार्य का बस एक ही हठ है— "हे महादेव! मुझे वह परम विद्या प्रदान करें जो काल के मुख से भी प्राणों को वापस खींच लाए, ताकि मेरे शिष्य युद्धभूमि में कभी परास्त न हों।"
पुराण बताते हैं कि भगवान शिव उनकी इस घोर तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें 'मृत संजीवनी विद्या' का वरदान दे दिया। यह वह विद्या है जो मरे हुए को भी जीवनदान दे सकती है। और बस, यहीं से सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगता है। देवताओं के प्रहार से असुरों की सेना बार-बार कटकर गिरती है और किसी गुप्त कंदरा में बैठे शुक्राचार्य मृत असुरों के शरीरों पर संजीवनी मंत्र का पाठ करते हैं। मंत्र के प्रभाव से कटे हुए अंग जुड़ जाते हैं, निर्जीव छाती में फिर से धड़कन लौट आती है। देवताओं की जीती हुई बाज़ी पलक झपकते ही हार में बदल जाती। देवता यह भली-भांति समझ जाते हैं कि अब यह रण अस्त्रों का नहीं, बल्कि विद्याओं का रह गया है। जब तक संजीवनी शुक्राचार्य के पास है, स्वर्ग की जीत एक कोरी कल्पना है।
गगनचुंबी देवदार के वृक्ष, कलकल करती पवित्र नदी, कुटियाओं से उठता यज्ञ का पवित्र धुआं और चारों ओर गूंजती वेद मंत्रों की ध्वनि। यह महर्षि भृगु का पावन आश्रम है। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र माने जाने वाले भृगु मुनि अपने शास्त्र चिंतन और गहन ध्यान में मग्न हैं।
अचानक दूर क्षितिज से कुछ धुंधली आकृतियां डगमगाती हुई आती दिखाई देती हैं। ये लहूलुहान, थके-हारे और मृत्यु के कगार पर खड़े असुर हैं, जो आश्रम की चौखट पर आकर गिर पड़ते हैं। उनके कवच छिन्न-भिन्न हैं, शरीर छलनी है, लेकिन आंखों में बचने की आस बाकी है। आश्रम से काव्यमाता बाहर आती हैं। उनकी दृष्टि उन असुरों पर पड़ती है। क्षण भर के लिए उनके मन में देवताओं द्वारा मारे गए असुरों की पीड़ा का भाव आता है, किंतु अगले ही पल उनके भीतर बैठी एक ममतामयी मां जागृत हो उठती है। "यह तपोभूमि है। जो भी इस आश्रम की शरण में आ गया, उसकी रक्षा करना हमारा परम धर्म है।" पुराणों के अनुसार, काव्यमाता (काव्या) गुरु शुक्राचार्य की माता और भृगु ऋषि की अर्धांगिनी हैं। उनके लिए सामने पड़े ये घायल असुर कोई दैत्य नहीं, बल्कि अपनी जान बचाने आए शरणागत हैं। महर्षि भृगु वहां आते हैं और यह दृश्य देखते हैं। वे अत्यंत शांत स्वर में घोषणा करते हैं— "पुत्रों! जब तक तुम मेरे आश्रम की सीमा के भीतर हो, मृत्यु भी तुम्हें छू नहीं पाएगी।" यह महर्षि का कोई साधारण वाक्य नहीं था, बल्कि उनके तपोबल से अभिमंत्रित एक अटल सत्य था। देवराज इंद्र की चिंता और श्रीहरि का धर्मसंकट उधर स्वर्ग में, देवराज इंद्र के सिंहासन के पास हारे हुए देवता सिर झुकाए खड़े हैं। स्वयं इंद्र का मुखमंडल पीला पड़ गया है। देवता युद्ध में जीतते हैं, और अगले ही दिन शुक्राचार्य की विद्या उस जीत को राख कर देती है। निराश इंद्र अन्य देवताओं को लेकर भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ पहुंचते हैं। यह वह स्थान है जहां स्वयं काल भी ठहर जाता है। इंद्र भरे हुए गले से पुकारते हैं— "हे नारायण! शुक्राचार्य की संजीवनी विद्या हमारी हर विजय को निगल रही है। और अब तो असुर अपनी जान बचाने के लिए आपके परम भक्त महर्षि भृगु के आश्रम में जाकर छुप गए हैं। प्रभु, यदि आज आपने कोई मार्ग नहीं निकाला, तो कल स्वर्ग का नामोनिशान मिट जाएगा।" अब विष्णु जी के समक्ष एक विकट धर्मसंकट खड़ा था। एक ओर भृगु आश्रम की पवित्र मर्यादा थी, तो दूसरी ओर सृष्टि में धर्म की स्थापना। नारायण अब जो भी कदम उठाएंगे, उसकी गूंज पूरे ब्रह्मांड में सुनाई देगी। श्रीहरि विष्णु अपने गंभीर और शांत स्वर में कहते हैं— "धर्म की स्थापना के लिए कई बार स्वयं धर्म रक्षक को भी अग्निपथ पर चलना पड़ता है। हे देवराज! जो विधि का विधान है उसे मैं टाल तो नहीं सकता, परंतु इसके परिणामों का भार मैं स्वयं अपने कंधों पर लूंगा।" काव्यमाता का योगबल और सुदर्शन का प्रहार रात का समय है। भृगु आश्रम में अग्निकुंड के समीप बैठे शिष्य वेद पाठ कर रहे हैं। आश्रम के एक कोने में घायल असुर इसे अपनी आखिरी उम्मीद मानकर दुबके बैठे हैं। तभी अचानक घोड़ों की भयानक टापें, रथों का शोर और शंखनाद से दिशाएं गूंज उठती हैं। देव सेना ने पूरे आश्रम को घेर लिया है। इंद्र का रथ आगे बढ़ता है, उनकी आंखों में क्रोध और हठ है। जैसे ही देव सेना आश्रम के भीतर प्रवेश करने का प्रयास करती है, प्रांगण के ठीक बीचों-बीच श्वेत वस्त्र धारण किए एक तेजस्वी स्त्री उनका मार्ग रोक कर खड़ी हो जाती है। यह काव्यमाता हैं। उनके मस्तक पर तपस्या का तेज है और आंखों में अडिग संकल्प। वे अपना हाथ उठाती हैं और योगबल का प्रयोग करते हुए एक मंत्र का उच्चारण करती हैं। देखते ही देखते पूरी देव सेना वहीं जड़ हो जाती है। अश्वों के पैर थम जाते हैं, रथों के पहिए जाम हो जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे स्वयं देवराज इंद्र को किसी अदृश्य शक्ति ने पाश में बांध दिया हो। काव्यमाता कोई सामान्य नारी नहीं थीं। वह एक महान तपस्विनी थीं, जिनके एक-एक शब्द में महायज्ञों का बल, तपस्या की आंच और धर्म की अटूट मर्यादा रची-बसी थी। इंद्र की आंखों में अपने इस भयंकर अपमान की ज्वाला धधकने लगती है। भय और क्रोध से भरे देवता मानसिक रूप से भगवान विष्णु की स्तुति करने लगते हैं— "हे प्रभु! रक्षा करें! यदि काव्य माता ने क्रोध में आकर हमें कोई श्राप दे दिया, तो हमारा अस्तित्व ही भस्म हो जाएगा। हमें इस बंधन से मुक्त करें।"
वैकुंठ में भगवान विष्णु अपनी आंखें मूंद लेते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो संपूर्ण ब्रह्मांड का वजन उनके परम पावन हृदय पर आ गया हो। सृष्टि के रक्षक के जीवन में ऐसे क्षण विरले ही आते हैं, जब हर रास्ता अधूरा और पीड़ादायक लगता है। वे जानते हैं कि वे जो भी करेंगे, उससे किसी न किसी का हृदय अवश्य टूटेगा। नारायण अत्यंत धीमी गति से अपना सुदर्शन चक्र धारण करते हैं। अंतरिक्ष में परिक्रमा करता वह अग्नि का पहिया साक्षात काल के चक्र के समान प्रतीत होता है। चक्र तीव्र गति से भृगु आश्रम की ओर बढ़ने लगता है। सामने काल को आता देख कर भी काव्यमाता अपने स्थान से एक इंच भी नहीं डिगतीं। उनके मुख पर रत्ती भर भी भय नहीं है, है तो बस अपना कर्तव्य निभाने का दृढ़ निश्चय। वे अत्यंत शांत स्वर में कहती हैं— "हे नारायण! यदि आज धर्म की रक्षा की वेदी पर आपको मेरी बलि चढ़ानी है, तो यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता होगी। परंतु यह सदैव स्मरण रखिएगा प्रभु, कि आपको अपने इस कर्म का फल एक न एक दिन अवश्य भुगतना पड़ेगा।" अंतरिक्ष में एक भयानक चमक उठती है, पल भर का सन्नाटा छाता है, और अगले ही क्षण काव्यमाता का मस्तक उनके धड़ से अलग होकर धरती पर गिर पड़ता है।
उनका निष्प्राण शरीर अविश्वसनीय रूप से बिना गिरे सीधा खड़ा रहता है। मानो धर्म पर आघात तो हुआ हो, परंतु वह अभी भी पराजित नहीं हुआ है। भृगु का क्रोध और नारायण को श्राप उधर महर्षि भृगु नदी तट से संध्या वंदन करके कमंडल थामे आश्रम की ओर लौट रहे हैं। जैसे ही वे पगडंडी मुड़ते हैं, उन्हें आकाश में उठता हुआ धुआं, खंडित रथ और राख होती कुटियाएं दिखाई देती हैं। उनके कदमों की गति तीव्र हो जाती है। आश्रम के प्रांगण में प्रवेश करते ही जो दृश्य वे देखते हैं, वह उनके होश उड़ा देता है। चारों ओर असुरों की लाशें, देवताओं के टूटे हुए अस्त्र और ठीक बीचों-बीच उनकी अपनी अर्धांगिनी का सिर कटा हुआ शरीर, जो अब भी सीधा खड़ा है। भृगु के हाथों से कमंडल छूटकर गिर पड़ता है। जो ऋषि जीवन भर शांति और तपस्या का प्रतीक रहा, वह एक ही पल में क्रोध के धधकते हुए ज्वालामुखी में बदल जाता है। भृगु की लाल आंखें आकाश की ओर उठती हैं। भगवान विष्णु अपने चतुर्भुज दिव्य रूप में वहां प्रकट होते हैं। नारायण के मुख पर कोई सफाई नहीं है, कोई तर्क नहीं है, बस एक मौन स्वीकृति है— 'हां, यह कर्म मैंने किया है, और इसका जो भी दंड होगा, वह मुझे स्वीकार है।' महर्षि भृगु की आंखों से अश्रु बह रहे हैं किंतु उनकी वाणी से अग्नि बरस रही है। "नारायण! तुमने मेरे आश्रम में आए शरणागतों पर प्रहार किया है। तुमने एक पतिव्रता, एक निरपराध ऋषि पत्नी की हत्या की है जो मात्र अपने धर्म का पालन कर रही थी। तुम भले ही वैकुंठ के अधिपति हो, परंतु आज तुम भी कर्मफल के इस चक्र से बच नहीं पाओगे।" पुराणों का वर्णन है कि अपनी पत्नी के वध के इस घोर शोक में महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु को एक भयंकर श्राप दे दिया। "मैं तुम्हें श्राप देता हूँ नारायण! तुम्हें इस मृत्युलोक (पृथ्वी) पर बार-बार जन्म लेना होगा। साधारण मनुष्यों की भांति तुम्हें भी जन्म और मृत्यु के चक्र की पीड़ा सहनी होगी। तुम वियोग सहोगे, अन्याय का दंश झेलोगे।" भृगु के ये शब्द पूरे ब्रह्मांड को कँपा देते हैं— "तुम जन्म-मरण के पाश में बंध जाओगे। तुम्हें अनेक अवतार धारण करने होंगे। जहाँ तुम स्वयं को सर्वशक्तिमान होते हुए भी वनवास की धूल फांकोगे, युद्ध करोगे और अन्याय की पीड़ा को अपने कर्मफल के रूप में ग्रहण करोगे।" यह मात्र एक श्राप नहीं था; यह तीनों लोकों की नियति तय करने वाली एक भीषण गर्जना थी। श्राप देने के पश्चात भृगु मुनि बुरी तरह टूट जाते हैं। वे अपनी मृत पत्नी के शरीर के समीप घुटनों के बल बैठते हैं, कमंडल से अभिमंत्रित जल निकालते हैं और संजीवनी विद्या के अत्यंत गुप्त मंत्रों का जाप करते हैं। धीरे-धीरे चमत्कार होता है, काव्यमाता का कटा हुआ मस्तक धड़ से जुड़ जाता है और उनके शरीर में पुनः प्राण लौट आते हैं। किंतु भृगु के हृदय में लगी अग्नि शांत नहीं होती। भगवान विष्णु के कृत्य से जो गहरा आघात उन्हें लगा था, वह अब श्राप का रूप लेकर ब्रह्मांड के भविष्य में हमेशा के लिए दर्ज हो चुका है। यहाँ हमारी प्रथम कथा— देव-असुर का वह भीषण संग्राम, शुक्राचार्य की संजीवनी विद्या, भृगु आश्रम की वह घटना, काव्यमाता का वध और अंततः श्रीहरि को मिला वह ऐतिहासिक श्राप— अपने चरम पर पहुँचती है। त्रिदेवों की परीक्षा: महायज्ञ का संकट अब हम समय के चक्र को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं और चलते हैं भागवत पुराण के दशम स्कंध की कथा की ओर। जहाँ महर्षि भृगु एक बार फिर से एक अत्यंत महत्वपूर्ण यात्रा पर निकलने वाले हैं। उद्देश्य है— 'त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में सबसे श्रेष्ठ कौन है?'
सरस्वती नदी के पावन तट पर एक विशाल और भव्य यज्ञ का आयोजन किया गया है। सैकड़ों सिद्ध ऋषि-मुनि वहां उपस्थित हैं। यज्ञ कुंड से उठती हुई पवित्र ज्वालाएं आकाश को छू रही हैं। परंतु सभी ऋषियों के मन में एक ही द्वंद्व चल रहा है— इस महान यज्ञ की अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पूर्णाहुति त्रिदेवों में से किसे समर्पित की जाए? ब्रह्मा जी को, महादेव को, या फिर भगवान विष्णु को? उत्तर किसी को नहीं पता था। अचानक वहां उपस्थित समस्त ऋषि समाज की नज़रें महर्षि भृगु पर जाकर ठहर जाती हैं। "हे महर्षि! आप त्रिकालदर्शी हैं। आप ही जाइए और त्रिदेवों के स्वभाव और उनके धैर्य की परीक्षा लेकर आइए। आज आप जो तय करेंगे, आने वाले युगों तक संपूर्ण मानव जाति उसी निर्णय को प्रमाण मानेगी।" भृगु मुनि इस कार्य के लिए तैयार हो जाते हैं। उनकी आंखों में एक अजीब सी चमक है। कहीं न कहीं उनके मन की गहराइयों में उस पुराने श्राप और अपनी पत्नी के वध की टीस अब भी हल्की-हल्की सुलग रही है।
ब्रह्मलोक और कैलाश की यात्रा सबसे पहले महर्षि भृगु ब्रह्मलोक पहुंचते हैं। वहां का वातावरण अत्यंत दिव्य है। सुंदर सरोवर, गूंजते हुए वेद मंत्र और बीच में विराजमान सृष्टि के रचयिता, चार मुखों वाले भगवान ब्रह्मा जो अपने कार्य में लीन हैं। भृगु मुनि ब्रह्मा जी के अहंकार को परखने के लिए जानबूझकर उन्हें प्रणाम नहीं करते और सीधे उनकी सभा के मध्य जाकर धृष्टतापूर्वक खड़े हो जाते हैं। यह देखकर ब्रह्मा जी की त्यौरियां चढ़ जाती हैं। उनकी आंखों में कुछ पलों के लिए भयंकर क्रोध छा जाता है। उनके मन में विचार आता है कि 'यह मेरा ही मानस पुत्र है, और आज भरी सभा में बिना प्रणाम किए मेरे सामने तन कर खड़ा है।' परंतु अगले ही पल ब्रह्मा जी अपने विवेक से उस क्रोध को पी जाते हैं और स्वयं को शांत कर लेते हैं। भृगु यह सब सूक्ष्मता से देख रहे होते हैं। वे समझ जाते हैं कि 'यहां अहंकार का वास तो है, परंतु उस पर संयम भी है।' बिना एक भी शब्द कहे भृगु मुनि वहां से मुड़ जाते हैं। उनका अगला पड़ाव है— बर्फीली चोटियों वाला दुर्गम कैलाश पर्वत। महादेव गहरी समाधि में लीन हैं और उनके समीप ही माता पार्वती विराजमान हैं। भृगु वहां पहुंचते हैं और इस बार महादेव के धैर्य को तोड़ने के लिए, वे जानबूझकर मन ही मन भगवान शिव के स्वरूप, उनके शरीर पर लगी भस्म और उनके पहने हुए गज चर्म (हाथी की खाल) को लेकर अत्यंत अपमानजनक और तिरस्कारपूर्ण बातें सोचने लगते हैं।
क्षण भर में शिव जी का तीसरा नेत्र फड़कने लगता है, क्रोध की अग्नि से उनका त्रिशूल ऊपर उठता है। किंतु ठीक उसी समय माता पार्वती का कोमल हाथ महादेव के हाथ को थाम लेता है। शिव का वह उबलता हुआ क्रोध, पार्वती के स्पर्श से करुणा में बदल जाता है। भृगु मुनि मन ही मन विचार करते हैं कि 'यहां क्रोध तो बहुत जल्दी आता है, किंतु प्रेम और वात्सल्य उसे तुरंत शांत भी कर देते हैं।' परंतु महर्षि की यह खोज अभी पूरी नहीं हुई थी।
वैकुंठ में श्रीहरि की परीक्षा और क्षमाशीलता अब भृगु मुनि पहुंचते हैं भगवान विष्णु के परम धाम— वैकुंठ! यह लोक दिव्य और स्वर्णिम प्रकाश से जगमगा रहा है। क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर श्रीहरि विष्णु विश्राम कर रहे हैं और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही हैं। महर्षि भृगु बिना कोई सूचना दिए, सीधे वैकुंठ के गर्भगृह में प्रवेश कर जाते हैं। वे देखते हैं कि विष्णु जी योगनिद्रा में हैं और उनका मस्तक माता लक्ष्मी की गोद में रखा है। भृगु कुछ देर वहीं खड़े होकर प्रतीक्षा करते हैं। फिर उनके मन में विचार आता है— "यदि ये वास्तव में पूरे ब्रह्मांड के पालनहार हैं, तो इन्हें तो यह पता होना चाहिए कि इनके द्वार पर एक अतिथि खड़ा है।" अचानक भृगु मुनि का पुराना क्रोध जाग उठता है। वे तेजी से आगे बढ़ते हैं और अपने पैर से पूरी ताकत के साथ भगवान विष्णु के वक्षस्थल (छाती) पर एक जोरदार लात मारते हैं! यह दृश्य देखकर माता लक्ष्मी के नेत्र फटे के फटे रह जाते हैं। भगवान विष्णु का वह वक्षस्थल, जो स्वयं माता लक्ष्मी का परम निवास स्थान है, आज एक ऋषि द्वारा बुरी तरह अपमानित कर दिया गया था। प्रहार होते ही भगवान विष्णु की आंखें खुल जाती हैं। परंतु आश्चर्य! उनके मुखमंडल पर क्रोध की एक हल्की सी लकीर तक नहीं है। वे तुरंत अपनी शय्या से उठते हैं और झुककर महर्षि भृगु के दोनों चरण अपने हाथों में पकड़ लेते हैं। अत्यंत विनम्रता से श्रीहरि कहते हैं— "हे ऋषिवर! मुझे क्षमा करें! आपके ये कोमल चरण मेरी पत्थर जैसी कठोर छाती से टकरा गए। कहीं आपके पैरों में चोट तो नहीं आई? मैं निद्रा में था, मैंने ध्यान नहीं दिया। यह मेरी बहुत बड़ी भूल है। कृपा कर आप आसन ग्रहण करें और विश्राम करें।"
भागवत पुराण का यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि सर्वशक्तिमान होते हुए भी भगवान विष्णु ने भृगु मुनि से क्षमा मांगी। वे उनके पैरों को सहलाते रहे, यह सोचकर कि कहीं उनके कठोर वक्ष के कारण मुनि को कष्ट न पहुंचा हो। भगवान का यह व्यवहार देखकर महर्षि भृगु भीतर तक हिल जाते हैं। वे सोचते हैं कि 'जिस व्यक्ति के भीतर राई के दाने के बराबर भी अहंकार होता, वह इस घोर अपमान पर मुझे भस्म कर देता। परंतु जो संपूर्ण जगत का स्वामी होकर भी स्वयं को इतना तुच्छ मान सकता है, वास्तव में वही इस ब्रह्मांड में सबसे महान है।'
भृगु के चेहरे पर एक परम शांति और संतोष का भाव छा जाता है। वे कहते हैं— "मैं उस विशाल ऋषि सभा में जाकर यह घोषित करूंगा कि त्रिदेवों में सबसे श्रेष्ठ वही हैं, जिन्होंने मेरे इतने कठोर प्रहार के बाद भी स्वयं के अपमान की परवाह न करके, केवल मेरे कष्ट की चिंता की।" कुछ अन्य पौराणिक ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि इस घटना से माता लक्ष्मी अत्यंत आहत हुई थीं। अपने निवास स्थान (विष्णु के वक्ष) के अपमान से क्षुब्ध होकर उन्होंने भृगु मुनि और उनके वंशजों को दरिद्रता (धनहीनता) का श्राप दे दिया था। कई विद्वान यह भी मानते हैं कि माता लक्ष्मी के इस क्रोध और वियोग की यही सूक्ष्म रेखा आगे चलकर भगवान विष्णु के अवतारों में वियोग और पीड़ा का मुख्य कारण बनी। जहां-जहां लक्ष्मी जी उनके साथ नहीं थीं, वहां विष्णु जी को अवतार रूप में एक साधारण मनुष्य की भांति भूख, प्यास और भारी जीवन संघर्ष का सामना करना पड़ा।
श्राप और लीला का अद्भुत संगम अब ये दोनों अद्भुत कथाएं एक ही बिंदु पर आकर मिल जाती हैं। एक तरफ है काव्यमाता का वह दुखद वध, भृगु ऋषि का वह भयंकर क्रोध और भगवान विष्णु को मिला वह कठोर श्राप— कि उन्हें बार-बार इस मृत्युलोक में जन्म लेना होगा और जन्म-मरण का अथाह कष्ट सहना होगा।
और दूसरी तरफ है सरस्वती नदी के तट पर हुआ वह महायज्ञ, भृगु मुनि द्वारा ली गई त्रिदेवों की वह अनोखी परीक्षा, विष्णु जी की छाती पर किया गया वह प्रहार और भगवान की वह असीम क्षमाशीलता व विनम्रता— जिसके कारण पूरे ऋषि समाज ने एक स्वर में उन्हें त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ घोषित किया। हमारी प्राचीन कथावाचन परंपरा इन दोनों घटनाओं को जोड़कर एक बहुत ही सुंदर और गहरा संदेश देती है: जब परमेश्वर स्वयं धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए अपने ही भक्तों के श्राप का बोझ अपने शीश पर धारण करते हैं और कर्मों के बंधन में बंधना स्वीकार करते हैं, तभी वे इस धरती पर मनुष्यों के बीच 'अवतार' के रूप में प्रकट होते हैं।
इस पूरी लीला का एक छोर हमें भागवत पुराण के दशम स्कंध में मिलता है, जहां भृगु मुनि त्रिदेवों की परीक्षा लेकर भगवान विष्णु के क्षमाशील और करुणामयी स्वरूप को दुनिया के सामने लाते हैं। वहीं दूसरा छोर पद्म पुराण में है, जहां काव्यमाता के वध के कारण महर्षि भृगु नारायण को धरती पर अवतार लेने का श्राप देते हैं।
और इसका तीसरा और सबसे रहस्यमयी छोर हमारे संतों और भक्तिकाल की उन सूक्ष्म व्याख्याओं में छिपा है, जो हमें यह समझाती हैं कि विष्णु जी के दशावतार केवल उनकी शक्तियों का प्रदर्शन नहीं हैं, बल्कि यह ईश्वर का स्वयं को एक साधारण मनुष्य की सीमाओं में बांध लेने का परम दिव्य और करुणामयी निर्णय है। धर्मग्रंथों ने घटनाएं दर्ज कीं— भृगु का वह प्रलयंकारी क्रोध, काव्य माता का वह बलिदान, त्रिदेवों की वह कठोर परीक्षा और नारायण की वह असीम क्षमा। बाद में हमारे संतों और ज्ञानी कथावाचकों ने इन सभी सूत्रों को एक धागे में पिरोकर हमें यह गूढ़ रहस्य समझाया कि: दशावतार केवल परमेश्वर की महिमा का गान नहीं है, बल्कि यह ईश्वर द्वारा अपने ही श्राप को, अपनी ही एक सुंदर लीला में बदल देने का चमत्कार है। जिस घटना को हम मनुष्य 'श्राप' मानते हैं, भगवान मुस्कुराकर उसी को अपनी 'लीला' का नाम दे देते हैं। यदि दशावतार और महर्षि भृगु की यह अद्भुत कथा आपके हृदय को गहराई तक छू गई हो, तो कमेंट बॉक्स में 'हरि ओम' अवश्य लिखें। हम आपसे जल्द ही मिलेंगे भगवान की एक और ऐसी ही रहस्यमयी लीला के साथ।
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