राजा भोज

भारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ नाम ऐसे दर्ज हैं, जिनकी चमक सदियों की धूल भी फीकी नहीं कर सकी। यह वीर गाथा है मालवा की उस पावन और रणबांकुरी धरती की, जहां के किलों की प्राचीरें आज भी शूरवीरों के शौर्य की गवाही देती हैं। यह उस महान सम्राट की कहानी है, जिनकी म्यान से जब तलवार बाहर आती थी, तो बड़े-बड़े साम्राज्यों की नींव हिल जाती थी; और जब उनके हाथों में कलम होती थी, तो युग के सर्वश्रेष्ठ विद्वान भी नतमस्तक होकर ज्ञान ग्रहण करते थे। हम बात कर रहे हैं परमार वंश के मुकुटमणि, महाप्रतापी राजा भोज की। उनका राजसिंहासन केवल वैभव का प्रतीक नहीं था, बल्कि वह कांटों से भरा एक ऐसा मार्ग था जिसे स्वयं उनके अपनों ने ही बिछाया था। आखिर कौन थे राजा भोज? क्या वे महज़ एक अजेय योद्धा थे, या एक ऐसे परमहंस विद्वान जिनकी मेधा का लोहा पूरी दुनिया मानती थी? और सदियों से हमारी जुबान पर रटी उस मशहूर कहावत— *"कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली"* —का वास्तविक रहस्य क्या है? जब आप इस कहावत का असली और ऐतिहासिक सच जानेंगे, तो आश्चर्य से भर उठेंगे। आइए, इस वृत्तांत में हम राजा भोज के जन्म से लेकर उनके महाप्रयाण तक, अपनों के षड्यंत्र से लेकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना तक, और रणभूमि की हुंकार से लेकर स्थापत्य कला के चमत्कारों तक की पूरी यात्रा तय करते हैं। दसवीं सदी का अंतिम कालखंड चल रहा था। मध्य भारत का मालवा क्षेत्र राजनीति, युद्ध कौशल और सांस्कृतिक चेतना का एक प्रमुख केंद्र बन चुका था। यहां परमार वंश की सत्ता थी और धार नगरी उनकी राजधानी हुआ करती थी। इसी राजवंश में सन 980 ईसवी के आस-पास राजा सिंधुराज और रानी सावित्री के घर एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया— 'भोज'। उस समय शायद ही किसी ने यह कल्पना की होगी कि यह शिशु भविष्य में पूरे आर्यावर्त का भाग्य विधाता बनेगा। बालक भोज की प्रारंभिक शिक्षा किसी भी अन्य राजकुमार की तरह ही शुरू हुई। उन्हें वेद-पुराण, शास्त्र, शस्त्र विद्या, कूटनीति, राजनीति और कला में निपुण किया जा रहा था। बाल्यकाल से ही उनकी असाधारण प्रतिभा सबको चकित कर देती थी। किंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। सन 991 ईसवी के आसपास, जब बालक भोज की आयु मात्र 11 वर्ष की थी, उनके पिता राजा सिंधुराज का आकस्मिक निधन हो गया। सत्ता का शून्य भरने के लिए भोज के चाचा, मुंज, मालवा के सिंहासन पर विराजमान हुए। मुंज एक अत्यंत महत्वाकांक्षी और शक्तिशाली शासक थे। समय बीतने के साथ मुंज के मन में यह असुरक्षा और भय पनपने लगा कि जब भोज बड़ा होगा, तो जनता और दरबारी उसी को अपना असली राजा मानेंगे। सत्ता के इसी लालच ने मुंज को अंधा कर दिया और उन्होंने अपने ही भतीजे की हत्या का खौफनाक षड्यंत्र रचा। मुंज ने अपने सबसे भरोसेमंद सेनापति वत्सराज को यह गुप्त आदेश दिया कि वह बालक भोज को घने जंगल में ले जाकर मौत के घाट उतार दे। आदेश का पालन करते हुए वत्सराज भोज को वन की ओर ले गया। परंतु मेधावी भोज अपने चाचा की मंशा को भांप चुके थे। मृत्यु को सामने देख उन्होंने विचलित होने के बजाय एक नुकीले कांटे से अपनी ही जांघ चीरी और बहते हुए रक्त से एक वटवृक्ष के पत्ते पर संस्कृत में एक मार्मिक श्लोक लिख दिया। भोज ने वह पत्ता वत्सराज को थमाते हुए कहा, "यह मेरे चाचा मुंज को दे देना।" जब वत्सराज ने वह श्लोक पढ़ा, तो वह कांप उठा। उसने बिना भोज को नुकसान पहुंचाए वह श्लोक राजा मुंज के सामने प्रस्तुत कर दिया। इतिहास में यह स्पष्ट नहीं है कि उस श्लोक के सटीक शब्द क्या थे, लेकिन माना जाता है कि उसमें जीवन की नश्वरता और सत्ता के अहंकार पर ऐसा गहरा प्रहार था कि राजा मुंज फूट-फूट कर रोने लगे। उनका हृदय परिवर्तन हो गया और उन्होंने अपने पाप का प्रायश्चित करते हुए भोज को वापस दरबार में ससम्मान बुलाया और अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। परंतु, एक महान शासक बनने की अग्निपरीक्षा तो अभी बस शुरू ही हुई थी। सन 1010 ईसवी के आसपास राजा भोज ने मालवा की बागडोर पूर्ण रूप से अपने हाथों में ले ली। लोककथाएं बताती हैं कि वे अत्यंत दयालु और न्याय के साक्षात रूप थे। अपनी प्रजा के वास्तविक दुख-दर्द को समझने के लिए वे अक्सर रात के अंधेरे में भेष बदलकर नगर भ्रमण किया करते थे। एक रात्रि भ्रमण के दौरान, राजा भोज एक जर्जर कुटिया के समीप से गुजरे। वहां एक वृद्ध और दरिद्र ब्राह्मण दंपति चिंता में डूबे हुए थे। ब्राह्मण अपनी पत्नी से कह रहा था कि अब उसका शरीर क्षीण हो चुका है, वह यजमानों के घर जाकर अनुष्ठान कराने में असमर्थ है, और उनका कोई पुत्र भी नहीं है जो बुढ़ापे का सहारा बने। पत्नी के पूछने पर कि उनका गुजारा कैसे होगा, ब्राह्मण ने भारी मन से कहा कि अब तो केवल राजा भोज या ईश्वर ही कुछ कर सकते हैं। अगले दिन जब वह ब्राह्मण दरबार में पहुंचा, तो सर्वज्ञाता राजा भोज ने बिना कुछ पूछे उसे 100 स्वर्ण मुद्राएं दान कर दीं। ब्राह्मण फूला नहीं समाया। उसने घर लौटकर अपनी पत्नी को यह संपत्ति दिखाई और दोनों ने उसे एक लकड़ी के संदूक में सुरक्षित रख दिया। लेकिन अगली सुबह वे मुद्राएं रहस्यमयी ढंग से गायब हो गईं।
घबराया हुआ ब्राह्मण फिर दरबार पहुंचा। राजा ने उसे पुनः 100 स्वर्ण मुद्राएं दीं। इस बार ब्राह्मण ने संदूक में मजबूत ताला जड़ दिया। लेकिन आधी रात को अचानक राजा भोज ब्राह्मण के घर पहुंचे और राज्य पर एक कल्पित संकट का हवाला देकर मुद्राएं वापस मांग लीं। सीधे-सादे ब्राह्मण ने राजा को मुद्राएं लौटा दीं। सुबह पत्नी को जब यह बात पता चली, तो उसने कहा कि यह कोई बहरूपिया होगा, क्योंकि रात में कोई राजा हमारे घर क्यों आएगा? ब्राह्मण ने यह बात राजा भोज को बताई। भोज भी हैरान रह गए, क्योंकि वह रात में ब्राह्मण के घर गए ही नहीं थे। उन्होंने तीसरी बार मुद्राएं दीं और यह ठान लिया कि वे खुद इस रहस्य से पर्दा उठाएंगे।
उस रात भेष बदलकर राजा भोज कुटिया के बाहर छिप गए। कुछ देर बाद, उन्होंने देखा कि बिल्कुल उनके जैसा ही दिखने वाला एक व्यक्ति कुटिया की ओर बढ़ रहा है। राजा ने झपटकर उसे पकड़ लिया और उसकी पहचान पूछी। तब उस स्वरूप ने अपना असली रूप दिखाया और कहा, "राजन! मैं 'भाग्य' हूं। इस ब्राह्मण के पूर्व जन्म के कर्म ऐसे हैं कि इसके भाग्य में धन का सुख नहीं है। मैं ही इसके घर से धन ले जाता हूं।" यह सुनकर दयालु राजा भोज का हृदय पसीज गया। उन्होंने भाग्य से हाथ जोड़कर प्रार्थना की, "हे भाग्य देवता, इस वृद्ध के दुर्भाग्य का सारा दंड आप मुझे दे दें, पर इसे यह संपत्ति भोगने दें।" राजा के इस परम त्याग से प्रसन्न होकर भाग्य ने तथास्तु कहा और अंतर्ध्यान हो गए। भाग्य से किए गए उस वादे का परिणाम राजा भोज को शीघ्र ही भुगतना पड़ा। एक बार आखेट (शिकार) के दौरान राजा भोज का अश्व बेकाबू हो गया। सेना मीलों पीछे छूट गई और अश्व एक गहरी खाई के पास जाकर झटके से रुक गया। राजा भोज उछलकर उस भयंकर खाई में गिर गए और बुरी तरह लहूलुहान हो गए। तभी वहां से 'गंगू' नाम का एक साधारण तेली (तेल निकालने वाला) अपनी बैलगाड़ी लेकर गुजर रहा था। उसने एक अनजान व्यक्ति को मृत्यु शय्या पर पड़ा देखा। गंगू ने उसे अपनी गाड़ी में लादा और घर ले जाकर उसकी खूब सेवा-सुश्रुषा की। जब राजा भोज को होश आया, तो अत्यधिक चोट के कारण वे अपनी स्मृति खो चुके थे, या शायद अज्ञात राज्य में होने के कारण उन्होंने अपनी पहचान छुपाना ही उचित समझा। गंगू तेली ने राजा को अपने कोल्हू पर बैल की जगह काम पर लगा दिया। चक्रवर्ती सम्राट अब एक साधारण मजदूर की तरह कोल्हू चलाने लगे। लेकिन प्रतिभा कभी छुपती नहीं है। काम करते हुए राजा भोज इतने मधुर और शास्त्रोक्त स्वर में गायन करते थे कि वहां से गुजरने वाले लोग सम्मोहित होकर रुक जाते। गंगू के तेल की बिक्री कई गुना बढ़ गई। उसी दौरान, उस राज्य के शासक राजा सिद्धराज, जो स्वयं संगीत के महान पारखी थे, उन्होंने अपनी रूपवती कन्या के विवाह के लिए एक स्वयंवर और भव्य संगीत प्रतियोगिता का आयोजन किया। यह खबर जब गंगू तेली तक पहुंची, तो उसने अपने इस सुरीले सेवक को अच्छे वस्त्र पहनाकर राजमहल भेज दिया। सभा में बड़े-बड़े धुरंधर संगीतज्ञ मौजूद थे, लेकिन जब भोज ने अपना कंठ खोला, तो सारा दरबार जड़वत रह गया। राजकुमारी तुरंत उन पर मोहित हो गई और उसने अपने पिता से उसी सेवक से विवाह करने की हठ पकड़ ली। राजा सिद्धराज क्रोधित हुए कि एक राजकुमारी का विवाह एक साधारण नौकर से कैसे हो सकता है? राजकुमारी ने कहा, "पिताश्री, ये कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। आप विद्वानों से इनकी परीक्षा लें।" सभा में धर्मदेव, कर्मदेव, तपदेव और पुण्यदेव नामक चार प्रकांड विद्वान उपस्थित थे। राजा सिद्धराज ने एक-एक करके उनसे पूछा, "इस पूरे आर्यावर्त में सर्वश्रेष्ठ, सबसे धार्मिक और पुण्यवान राजा कौन है?" चारों ने एक स्वर में उत्तर दिया— "धार नगरी के अधिपति, महाकाल के भक्त, सम्राट राजा भोज।"
विद्वानों का उत्तर सुनते ही राजा भोज का खोया हुआ आत्मविश्वास और स्मृति लौट आई। उन्होंने भरी सभा में सिंह गर्जना करते हुए कहा, "महाराज! मैं ही मालवा नरेश भोज हूं!" सभी अवाक रह गए। सिद्धराज ने कहा, "यह कैसी धृष्टता है? एक मामूली सेवक खुद को सम्राट बता रहा है!" तब राजा भोज ने नम्रता से कहा, "यह भाग्य की विडंबना है महाराज। भाग्य एक पल में राजा को रंक और रंक को राजा बना सकता है। यह मेरे कर्मों का ही फल था कि मैं गंगू तेली के कोल्हू पर काम कर रहा था।"
सत्य की पुष्टि होने पर राजा सिद्धराज ने अपनी कन्या का विवाह भोज से कर दिया। जब यह बात पूरे साम्राज्य में फैली कि एक तेली ने भारत के सबसे प्रतापी सम्राट से अपना कोल्हू चलवाया है, तो लोगों ने आश्चर्य में कहना शुरू कर दिया— *"कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली!" किंतु मित्रों, उपरोक्त कथाएं केवल किंवदंतियां हैं, जो सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जा रही हैं। परमार वंश के इस महान राजपूत सम्राट का वास्तविक इतिहास इन कथाओं से कहीं अधिक विराट, शौर्यपूर्ण और अचंभित करने वाला है। सन 1010 में जब भोज ने मालवा का सिंहासन पूरी तरह संभाला, तो उनका प्रथम लक्ष्य अपने पिता सिंधुराज की पराजय का प्रतिशोध लेना था। उनके पिता को चालुक्य वंश के हाथों भारी अपमान का सामना करना पड़ा था। राजा भोज ने उतावलापन नहीं दिखाया। उन्होंने वर्षों तक अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाई, अजेय चक्रव्यूह रचे और अंततः चालुक्य नरेश जयसिंह पर भीषण आक्रमण कर दिया। दोनों सेनाओं के बीच भयंकर संग्राम हुआ। भोज ने अपने युद्ध कौशल से चालुक्यों को पीछे हटने पर विवश कर दिया और अपनी सीमा का अभूतपूर्व विस्तार किया। इसी कालखंड में राजा भोज ने त्रिपुरी (वर्तमान मध्य प्रदेश) के शक्तिशाली कलचुरी वंश पर भी प्रहार किया और उनके कई क्षेत्रों को मालवा में मिला लिया। सन 1010 से 1030 ईसवी का समय राजा भोज के साम्राज्य के चरम उत्कर्ष का स्वर्ण युग माना जाता है। मालवा की सीमाएं राजस्थान, कोंकण और पश्चिमी भारत के सुदूर कोनों तक फैल गईं। उनके नाम मात्र से शत्रु राजाओं के पसीने छूट जाते थे और वे बिना लड़े ही उनकी अधीनता स्वीकार कर लेते थे।
### धर्म रक्षक: विदेशी आक्रांताओं पर भीषण प्रहार
ग्यारहवीं शताब्दी का वह दौर भारत के लिए अत्यंत उथल-पुथल भरा था। सन 1025 ईसवी में गजनी के क्रूर लुटेरे महमूद गजनवी ने गुजरात के पवित्र सोमनाथ मंदिर पर हमला किया। उसने न केवल महादेव के मंदिर को खंडित किया, बल्कि अपार धन लूटा और निर्दोष श्रद्धालुओं के रक्त की नदियां बहा दीं। जब यह खौफनाक खबर राजा भोज तक पहुंची, तो उनका रक्त खौल उठा। उन्होंने तुरंत एक विशाल हिंदू गठबंधन तैयार किया और गजनवी की लौटती हुई सेना को घेरने की योजना बनाई। राजा भोज के भीषण क्रोध और उनकी विशाल सेना की भनक मात्र से महमूद गजनवी इतना भयभीत हो गया कि उसने सीधा रास्ता छोड़ दिया और अपनी जान बचाने के लिए थार के जानलेवा रेगिस्तान का रास्ता चुना, जहां उसकी आधी से ज्यादा सेना भूख और प्यास से तड़प कर मर गई। इसी शौर्य परंपरा की सबसे बड़ी गूंज सन 1034 ईसवी के बहराइच युद्ध में सुनाई देती है। महमूद गजनवी का भांजा, सालार मसूद, एक टिड्डी दल जैसी विशाल सेना लेकर उत्तर भारत को रौंदने आ रहा था। तब राजा भोज ने पासी राजवंश के महान योद्धा राजा सुहेलदेव के साथ मिलकर एक ऐसा विध्वंसक युद्ध लड़ा, जिसमें सालार मसूद की पूरी सेना गाजर-मूली की तरह काट दी गई। उस युद्ध में सालार मसूद मारा गया और विदेशी आक्रमणकारियों को ऐसा कड़ा सबक मिला कि कई दशकों तक भारत की ओर आंख उठाने की किसी की हिम्मत नहीं हुई। इतिहास में ऐसे योद्धा बहुत हुए हैं जिन्होंने रणभूमि जीती, लेकिन राजा भोज जैसा शायद ही कोई दूसरा शासक हो, जो एक अजेय योद्धा होने के साथ-साथ एक महान वैज्ञानिक, वास्तुकार और साहित्यकार भी था।
इतिहासकार मानते हैं कि राजा भोज ने विभिन्न विषयों पर लगभग 84 महान ग्रंथों की रचना की थी। उनके द्वारा रचित 'समरांगण सूत्रधार' भारतीय वास्तुकला और इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा विश्वकोश है। इस ग्रंथ में न केवल नगर निर्माण और भव्य मंदिरों के वास्तु का वर्णन है, बल्कि इसमें यांत्रिक उपकरणों (मशीनों) और हवा में उड़ने वाले विमानों तक की परिकल्पना की गई है। इसके अतिरिक्त उन्होंने 'युक्ति कल्पतरु' जैसे ग्रंथ लिखे, जो प्रशासन और समुद्री जहाज निर्माण की उन्नत तकनीक समझाते हैं। राजा भोज केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं थे। उनकी इंजीनियरिंग का सबसे जीवंत प्रमाण है मध्य प्रदेश स्थित 'भोजपुर का शिव मंदिर'। यह विशाल और भव्य मंदिर अपने आप में स्थापत्य कला का चमत्कार है। यहां स्थापित शिवलिंग इतना विशाल है कि इसे 'पूर्व का सोमनाथ' कहा जाता है। हालांकि कुछ ऐतिहासिक और प्राकृतिक कारणों से यह मंदिर पूरी तरह बन नहीं पाया, लेकिन इसका अकल्पनीय ढांचा आज भी दुनिया भर के इंजीनियरों को हैरान कर देता है। इतना ही नहीं, राजा भोज जल प्रबंधन के बहुत बड़े दूरदर्शी थे। उन्होंने भोपाल (उस समय का भोजपाल) में एक अत्यंत विशाल कृत्रिम झील का निर्माण करवाया, जिसे आज 'भोजताल' या अपर लेक कहा जाता है। बिना किसी आधुनिक मशीनरी के, 11वीं सदी में इतनी विशाल झील का निर्माण करना उनकी वैज्ञानिक और प्रशासनिक कुशाग्रता का एक जीता-जागता उदाहरण है। अब आते हैं उस रहस्य पर जिसने राजा भोज के नाम को एक लोक कहावत में बदल दिया। हम अक्सर सुनते हैं— *"कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली।"* वास्तव में, जब इतिहास की गहराई में शोध किया गया, तो यह स्पष्ट हुआ कि यह कहावत मूल रूप से कुछ और ही थी। इसका वास्तविक और शुद्ध स्वरूप था— *mकहां राजा भोज, कहां गांगेय-तैलंग।" इस पंक्ति में गांगेय या तैलंग किसी साधारण तेल बेचने वाले का नाम नहीं है। 'गांगेय' का अर्थ है मध्य भारत के कलचुरी (छेदी) वंश के बेहद पराक्रमी राजा 'गांगेयदेव'। तैलंग' का संदर्भ दक्कन के चालुक्य वंश के शक्तिशाली राजा 'जयसिंह तैलंग' से था। यह कहावत राजा भोज के अतुलनीय प्रताप को दर्शाने के लिए गढ़ी गई थी। इसका अर्थ यह था कि राजा भोज का साम्राज्य और उनका व्यक्तित्व इतना विराट है कि उस युग के दो सबसे बड़े और शक्तिशाली शासक (राजा गांगेयदेव और राजा जयसिंह तैलंग) भी उनके सामने बौने साबित होते हैं। किंतु समय के थपेड़ों और लोकभाषा के बदलाव के कारण 'गांगेय-तैलंग' जैसे भारी-भरकम शब्द अपभ्रंश होकर धीरे-धीरे आम जनता की जुबान पर 'गंगू तेली' बन गए। और इस तरह, तीन महान राजाओं की तुलना की यह ऐतिहासिक पंक्ति, एक राजा और एक आम आदमी के बीच की तुलना बनकर रह गई। महाकाल की शरण में सम्राट हर उदय का एक अस्त निश्चित है। 11वीं शताब्दी का मध्य आते-आते राजा भोज का वह युवा जोश अब वृद्धावस्था में बदल रहा था। दशकों तक लगातार लड़े गए युद्धों और साम्राज्य की सुरक्षा की चिंता ने उनके शरीर को थका दिया था। भोज के बढ़ते वर्चस्व से उनके दुश्मन ईर्ष्या की आग में जल रहे थे। जब उन्हें लगा कि राजा भोज अकेले नहीं हराए जा सकते, तो एक खतरनाक गठबंधन तैयार हुआ। पश्चिम से गुजरात के सोलंकी (चालुक्य) शासक भीम प्रथम और पूर्व से छेदी वंश के राजा कर्ण ने हाथ मिला लिया। दोनों ने मिलकर मालवा की राजधानी धार पर दो तरफा भयंकर आक्रमण कर दिया। यह कोई साधारण युद्ध नहीं था। राजा भोज अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर थे और एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी शारीरिक क्षमता जवाब दे चुकी थी, फिर भी मालवा की सेना अपने बूढ़े शेर की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दे रही थी। इसी संकटकालीन और युद्ध की विभीषिका के बीच, सन 1055 ईसवी के आसपास, भारत के इस महानतम सम्राट ने अपनी आंखें हमेशा के लिए मूंद लीं। राजा भोज के निधन का समाचार मालवा ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए एक वज्रपात था। धार नगरी पर शत्रुओं ने अधिकार कर लिया। तत्कालीन विद्वानों ने रुदन करते हुए लिखा था कि महाज्ञानी राजा भोज के जाने से साक्षात माता सरस्वती निराश्रित हो गई हैं (अद्य धारा निराधारा निरालंबा सरस्वती)। राजा भोज आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब तक मालवा की मिट्टी में सुंगध है, जब तक ग्रंथों में ज्ञान है और जब तक शिव के मंदिरों में शंख की ध्वनि गूंजती रहेगी, 'सम्राट राजा भोज' का नाम भारतीय इतिहास के आकाश में एक ध्रुव तारे की भांति चमकता रहेगा।

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